1 जुलाई के तेलंगना क्षेत्र के कांग्रेस नेताओं की बैठक से इस्तीफे का स्वर निकला था। पूरा माहौल कुछ कर गुजरने के पक्ष में था। आंध्रपदेश के प्रभारी गुलाम नबी आजाद लगातार संकट को टालने के लिए प्रयासरत रहे। आजाद ने इनसे लगातार इस्तीफा न देने की अपील की, लेकिन ये नहीं माने। लेकिन इस विफल्ता का ठिकरा अकेले आजाद के सिर फोड़ना उचित नहीं होगा। गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने भी सासंदों एवं विधायकों से इस्तीफा न देने की अपील की थी। 1 जुलाई को जब तेलांगना के कांग्रेसी सांसदों विधायकों व नेताओं की बैठक में सामूहिक इस्तीफे पर विचार की खबर आई, कांग्रेस के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पत्रकारों से बातचीत मंे कहा कि आंध्र कांग्रेस में कोई संकट नहीं है। पार्टी में ऐसे वक्तव्यों से निपटनने के लिए आंतरिक प्रणाली है। प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बोत्सा सत्यनारायण सांसदों, विधायकों एवं मंत्रियों से मिलकर यह अनुरोध किया वे इस्तीफे के निर्णय पर पुनर्विचार करें। मुख्यमंत्री किरण रेड्डी ने भी मंत्रियों और नेताओं को मनाने का प्रयास किया। 2 जुलाई को तेलंगना जर्नलिस्ट्स फोरम द्वारा प्रेस से मिलिए कार्यक्रम में राज्य सभा सांसद के. केशव राव से जब इस्तीफे के फलितार्थों पर प्रश्न किया गया तो उन्होंने कहा कि अकेले इस्तीफा अलग तेलंगना राज्य के लक्ष्य तक हमें नहीं ले जाएगा किंतु इसके बाद हम आंदोलन में सक्रिय भागीदारी कर सकते हैं।

यह पूरी कांग्रेस पार्टी की विफलता है। तेलंगना के जन प्रतिनिधि एवं नेता अपनी मंशा और तेवर लगातार प्रदर्शित कर रहे थे। यह इनका दबाव ही था कि 9 दिसंबर 2009 को गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने बयान दिया कि केन्द्र पृथक तेलंगना राज्य के गठन की प्रक्रिया आरंभ करेगा। तेलंगना के नेता यही कह रहे हैं कि केन्द्र घोषणा को अमल में लाने की प्रक्रिया आरंभ करे। किंतु उसके 14 दिनों बाद 23 दिसंबर 2009 को चिदम्बरम ने ही यह बयान दिया कि इस मुद्दे पर और अधिक बातचीत एवं सलाह मशविरा जरूरी है। आजाद ने 1 जुलाई को दिल्ली आकर बातचीत करने की जब अपील की तो नेताओं ने कहा कि हमारा पिछले महीने दिल्ली जाना अंतिम था। अब तब तक दिल्ली बातचीत करने नहीं जाएंगे जब तक कि केन्द्र अलग तेलंगना राज्य के गठन पर सहमति न व्यक्त कर दे। उसी दिन स्पष्ट हो गया कि मामला केन्द्र एवं कांग्रेस आलाकमान के हाथ से निकल चुका है।

स्पष्टतः संकट के लिए बहुत हद तक कांग्रेस एवं केन्द्र सरकार तथा कुछ हद तक दूसरे दल भी जिम्मेवार हैं। संप्रग एक के दौरान कांगेस ने तेलंगना राष्ट्र समिति से समर्थन के लिए तेलंगना पर ना और हां के बीच की रणनीति अपनाई तथा प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता में एक समिति बना दी। लंबे समय तक रुख स्पष्ट न करने के कारण तेलांगना राष्ट्र समिति ने सरकार से समर्थन वापस लिया तथा के. चन्द्रशेखर राव मंत्रिमंडल से अलग हो गए। उसके बाद संप्रग द्वितीय में सरकार ने श्रीकृष्णा समिति का गठन किया। इसने छह विकल्प सुझाए-1. आधं्रपदेश की एकता बनाए रखी जाए एवं तेलंगना क्षेत्र के सशक्तीकरण के लिए संवैधानिक एवं अन्य वैधानिक उपाय किए जाएं, 2. अलग राज्य बना दिया जाए, 3.यथास्थिति बनाए रखा जाए, 4.राज्य को सीमाआंध्र एवं तेलांगना में बांट दिया जाए और दोनों की राजधानी अलग-अलग हो तथा हैदराबाद को संघ क्षेत्र बना दिया जाए, 5. रायाला, तेलांगना एवं तटीय आंध्र क्षेत्र में बांट दिया जाए तथा हैदराबाद रायला एवं तेलंगना का भाग हो, 6. सीमांध्र एवं तेलांगना में बांटा जाए तथा हैदरबााद मेट्रोपोलिस का विस्तार कर इसे पृथक संघ क्षेत्र बना दिया जाए। समिति ने स्वयं कहा कि अंतिम चार विकल्प व्यावहारिक नहीं हैं। राज्य को एकीकृत रखने को सर्वश्रेश्ठ उपाय तथा विकल्प दो यानी अलग राज्य को इससे निपटने का दूसरा बेहतर विकल्प बताया।

कांग्रेस ने पुनः इस पर अपनी राय व्यक्त नहीं की। अगर वह समिति के पहले विकल्प को सर्वश्रेष्ठ बताने को आधार बनाकर दलों के बीच सहमति बनाने तथा उस दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करती तो शायद स्थिति थोड़ी अलग होती। उसने अपना मत व्यक्त किए बिना सभी दलों से विचार-विमर्श की रणनीति अपनाई। कांग्रेस तेलंगना राज्य के पक्ष में नहीं थी, लेकिन स्पष्ट मत व्यक्त करने की बजाय उसने व्यामोह का रवैया अपनाया। इस कारण तेलांगना समर्थकों में संदेश गया कि यदि दबाव बनाया जाए तो सरकार अलग तेलांगना पर सहमत हो जाएगी, इसलिए वे लगातार जन जागरण एवं आंदोलन करते रहे। भाजपा ने समर्थन व्यक्त कर दिया और इसके पक्ष में लगातार आवाज उठाई। आज पूरे तेलांगना क्षेत्र में इसके समर्थन में इतना उग्र वातावरण है कि कोई नेता इसके विरूद्ध जाने का साहस नहीं कर सकता। तेलांगना राज्य के कट्टर विरोधी तेलुगू देशम् के विधायकों का इस्तीफा इसका प्रमाण है। स्थानीय कांग्रेस के नेताओं के सामने पृथक राज्य का समर्थन या अपना जनाधार खोने की संभावना में से एक को चुनना था और उन्होेेेंने पहले विकल्प का चयन किया।

आज कांग्रेस के नेता पी चिदम्बरम की यह दलील स्वीकारने को तैयार नहीं हैं कि अलग-अलग पक्षों के लोगों से बातचीत और राय जानने का सिलसिला समाप्त नहीं हुआ है। स्थानीय पार्टी ईकाई करो या मरो की बात कर रही है। केन्द्र के सामने अंतिम निर्णय की आपात स्थिति पैदा हो गई है। इन इस्तीफों से राजनीतिक और संवैधानिक संकट की संभावना उत्पन्न हो चुकी है। 294 सदस्यों वाली आंध्र विधानसभा में कांग्रेस-155 एवं प्रजाराज्यम् के 17 विधायकों के साथ किरण रेड्डी सरकार को 172 का समर्थन है। विधायकों का इस्तीफा मंजूर हो जाए तो विधानसभा में उपस्थित सदस्यों में कांग्रेस का बहुमत बना रहेगा, लेकिन इतने विधायकों के बिना विधानसभा का कायम रहना प्रहसन जैसा होगा। लोकसभा सांसद इस्तीफा वापस नहीं लेते तो यह मनमोहन सरकार के लिए बड़ा झटका होगा। इस समय इस्तीफा देने वाले नेता कांग्रेस में रहकर संघर्ष की बात कर रहे हैं, पर उनका यही नजरिया बना रहेगा आवश्यक नहीं। जगन रेड्डी के विद्रोह के बाद कांग्रेस के अंदर पूरे आंध्रप्रदेश में हलचल है। कांग्रेस एवं केन्द्र सरकार दलीय हित की दृष्टि से विचार करे तो ज्यादा विकल्प नहीं है। किंतु तेलंगना राज्य के गठन की प्रक्रिया आरंभ करने के साथ दर्जन भर राज्यों की मांग का आंदोलन तेज होगा। यानी यह भानुमति का पिटारा साबित होगा। सरकार एवं राजनीतिक दलों को इस संकट के बाद राज्य पुनर्गठन की एक सुसंगत नीति पर विचार अवश्य करना चाहिए, पर लगता नहीं कि कांग्रेस ऐसा करेगी। वैसे किसी पार्टी के जन प्रतिनिधियों के ऐसे रवैये का समर्थन नहीं किया जा सकता। इस प्रकार अपनी मांग के लिए दबाव डालने से गलत परंपरा की नींव पड़ेगी एवं देश को इसका दुष्परिणाम आगे भुगतना होगा। (सवाद)