परिषद का कहना है कि कश्मीरी छात्र राष्ट्र विरोधी हें। उनका कहना है कि वे शेक्षिक संस्थाओं के माहौल को खराब कर रहे हैं। वे बताते हैं कि भोपाल के बारकातुल्लाह विश्वविद्यालय के 400 स्नातकोत्तर छात्रों में कश्मीर घाटी के छात्रों की संख्या 175 है। उनका यह भी कहना है कि कश्मीर के विस्थापितों के लिए प्रवेश के विशेष प्रावधान किए गए थे और उन विशेष प्रावधानों को घाटी के उन छात्रों द्वारा दुरुपयोग किया जा रहा है, जो वास्तव में विस्थापित नहीं हैं।
अब कश्मीरियों को प्रवेश लेने से रोकने के लिए राज्य सरकार ने प्रवेश की नीति में ही बदलाव कर दिया है। पहले प्रवेश नीति से संबंधित नियमन में कश्मीरी छात्र की बात की जाती थी अब नियमन को बदलकर उसकी जगह विस्थापित कश्मीरी छात्र कर दिया गया है, जिसका मतलब कश्मीरी पंडित होता है। इसके कारण कश्मीरी छात्रों के लिए प्रवेश का द्वार लगभग बंद हो चुका है। इसके अलावा मौखिक रूप से विश्वविद्यालयों के रजिस्ट्रारों को कहा गया है कि कश्मीरी छात्रों का नामांकन करें ही नहीं। यह गुप्त और मौखिक संदेश किसी तरह मीडिया में लीक हो गया है।
गौरतलब है कि राज्य सरकार ने कश्मीर की हिंसा से विस्थापित परिवारों के छात्रों के लिए यहां के विश्वविद्यालयों में प्रवेश के विशेष प्रावधान किए थे। शायद सरकार की मंशा कश्मीरी पंडितों के परिवारों को ही लाभ पहुंचाने की थी, लेकिन जाति अथवा सांप्रदायिका आधार का उल्लेख करते हुए नियम नहीं बनाए जा सकते थे, इसलिए विस्थापित छात्रों का उल्लेख किया गया। कश्मीर में हो रही हिंसा से वहां के पंडित समुदाय के लोग ही नहीं, बल्कि मुस्लिम समुदाय के लोग भी प्रभावित हो रहे हैं। इसलिए इस कोटे के तहत मुस्लिम छात्र भी लाभ उठा रहे थे। पर विद्यार्थी परिषद को यह स्वीकार नहीं हुआ कि कश्मीरी पंडितों को फायदा पहुंचाने के लिए बने नियम का फायदा कश्मीर के मुसलमान भी उठाएं। इसलिए यह सब किया जा रहा है।
इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इसकी आलोचना की और कहा कि कश्मीर के छात्रों को नामांकन से वंचित किया जा रहा है और उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है। मुख्यमंत्री अब्दुल्ला का जवाब देते हुए मध्यप्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा का कहना है कि कश्मीरी छात्रों के साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जा रहा। उनको भी वही सुविधाएं प्राप्त हैं, जो अन्य राज्यों के छात्रों को प्राप्त है।
श्री शर्मा का कहना है कि यह राज्य सरकार की नीति है कि हम पहले अपने राज्यों के छात्रों को प्रवेश देते हैं। उनसे स्ािान रिक्त रहने के बाद अन्य राज्यों के छात्रों को प्रवेश दिया जाता है। ऐसा करते समय किसी राज्य को न तो वरीयता दी जाती है और न ही किसी राज्य के साथ कोई भेदभाव किया जाता है। उन्होंने कहा कि राज्य स्थित वे संस्थान, जिन्हें केन्द्र सरकार की सहायता मिलती है, 80 फीसदी सीटें राज्य के छात्रों और 20 फीसदी सीटें अन्य राज्यों के छात्रों से भरते हैं। ऐसा करते समय किसी भी राज्य के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाता।
लंेकिन मामला उतना सरल नहीं है, जितना मध्यप्रदेश के शिक्षा मंत्री कह रहे हैं। दूसरे राज्यों के छात्रों के साथ तरह तरह से भेदभाव किया जाता है। प्रवेश के समय पिछले संस्थान से चरित्र प्रमाण पत्र पाना तो स्वीकार्य है ही दूसरे राज्यों के छात्रों का पुलिस सत्यापन तक करवाया जाता है। (संवाद)
कश्मीरियों के नामांकन को रोक रही है भाजपा सरकार
मघ्य प्रदेश के कॉलेज में नीतियां विद्यार्थी परिषद के प्रभाव में
एल एस हरदेनिया - 2011-07-15 09:01
भोपालः मध्यप्रदेश के कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों में कश्मीरी छात्रों के प्रवेश का मसला विवादों में पड़ गया है। प्रदेश के शिक्षा संस्थानों में राज्य सरकार ने कश्मीरी छा़त्रों के नामांकन को लगभग असंभव बना दिया है। यह कदम अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के इशारे पर उठाया गया है। गौरतलब है कि परिषद भाजपा की विद्यार्थी शाखा है।