सच तो यह है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह खुद इस बात के एक ज्वलंत उदाहरण हैं कि राजनीति से बाहर का आदमी सरकार में कैसे आकर वहां फिट हो जाता है। 1991 में जब देश में भारी आर्थिक संकट चल रहा था, तो उस समय प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने मनमोहन सिंह को राजनैतिक क्षेत्र से बाहर से लाकर सरकार में मुख्यमंत्री बना दिया था और आज वे प्रधानमंत्री बने हुए हैं। इसके अलावा कांग्रेस मंत्री बनने की योग्यता रखने वाले सांसदों के अभाव की बात नहीं कर सकती, क्योंकि उसे यह सवाल उस समय उठाना चाहिए था, जब लोकसभा और राज्य सभा के लिए टिकट बांटे जा रहे थे।
मंत्रिमंडल में फेरबदल के बाद प्रधानमंत्री ने साफ कर दिया है कि उनकी टीम अब पूरी हो गई है और इसी टीम के साथ वे अगले लोकसभा चुनाव, जो 2014 में होने वाले हैं, का सामना करेंगे। फेरबदल के पहले लोगों का घ्यान मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी पर केन्द्रित था और वे देख रहे थे कि दोनों किस तरह का फेरबदल करते हैं और उनके सामने जो समस्याएं हैं, उनके प्रति उस फेरबदल में किस तरह का रवैया दिखाते हें। सच तो यह है कि केन्द्र सरकार एक के बाद एक संकट का सामना कर रही है। एक के बाद एक घोटाले सामने आ रहे हैं। कीमतें आसमान छू रही हैं। सुप्रीम कोर्ट प्रो एक्टिव हो गई है। भारी भ्रष्टाचार के कारण विदेशी निवेशक भारत में निवेश करने में झिझक रहे हैं। ऐसे माहौल में प्रधानमंत्री अपने मंत्रिमंडल में फेरबदल के द्वारा किस प्रकार का संकेत देना चाहते हैं, इस पर लोगों का घ्यान टिका हुआ था। लोग यह देखना चाह रहे थे कि प्रधानमंत्री अक्षम मंत्रियों को अपनी टीम से हटाते हैं या नहीं। वे यह भी देखना चाहते थें कि भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे मंत्रियों को श्री सिंह बाहर का रास्ता दिखाते हैं या नहीं। फेरबदल के बाद लोगों ने देखा कि उनके सवाल का जवाब नहीं में मिला है।
पिछले जनवरी महीने में जब प्रधानमंत्री ने मंत्रिमंडल का एक छोटा सा विस्तार किया था, तो कहा था कि बजट सत्र के बाद वे एक भारी फेरबदल करेंगे, पर वैसा कुछ नहीं हुआ। प्रधानमंत्री के किसी कदम में कोई न कोई विशेष अर्थ होना चाहिए। सरकार की विश्वसनीयता बहुत गिरी हुई थी, फेरबदल में प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार की गिरी विश्वसनीयता को फिर से बहाल करने की कोई कोशिश तक नहीं की है। अक्षम मंत्रियों को नहीं हटाया गया है और भ्रष्ट मंत्रियों को बाहर का रास्ता नहीं दिखाया गया है। मंत्रियों की औसत उम्र 65 साल है। यह साफ है कि प्रधानमंत्री कोई भारी बदलाव नही करना चाहते हैं।
इस बदलाव का राजनैतिक निहितार्थ क्या है? पहला अर्थ तो यह है कि प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय लोकदल जैसी सहयोगी पार्टियों को संकेत दे दिया है कि उनके लिए आने वाले दिनों में भी मंत्रिमंडल में सामने आने की कोई संभावना नहीं है। मंत्रिमंडल का आकार बहुत ही बड़ा है और उसके बावजूद कई मंत्री एक से ज्यादा मंत्रालय संभाल रहे हैं। दूसरा निहितार्थ यह है कि राहुल गांधी के लोगों की सरकार में संख्या बढ़ती जा रही है। तीसरा निहितार्थ यह है कि कांग्रेस पार्टी का यूपीए पर नियंत्रण बरकरार है। डीएमके ने अपनी तरफ से दो मंत्रियों के नाम नहीं सुझाए, तो उनके हिस्से के मंत्रालयों को अभी भी उनके लिए सुरक्षित रखा गया है।
उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं। उसका ध्यान रखते हुए बेनी प्रसाद वर्मा को कैबिनेट में शामिल कर लिया गया है और राजीव शुक्ला को मंत्रिपरिषद में शामिल कर लिया गया है। चुनाव तो गुजरात, उत्तराखंड और पंजाब में भी होने वाले हैं, लेकिन मंत्रिमंडल में हुए इस फेरबदल में इन राज्यों की उपेक्षा कर दी गई है। हां, तमिलनाडु की जयंति नटराजन को अवश्य एक महत्वपूर्ण मंत्रालय का जिम्मा दे दिया गया है। यदि कुछ शब्दों में कहा जाय, तो प्रधानमंत्री ने इस फेरबदल से यह संदेश देना चाहा है कि वर्तमान स्थिति से वे बेहद संतुष्ट हैं, जबकि दूसरी ओर पूरा देश इससे असंतुष्ट दिखाई दे रहा है। (संवाद)
मंत्रिमंडल में फेरबदल से योग्यता की कमी का आभास
छवि बेहतर करने का मौका प्रधानमंत्री ने गंवा दिया
कल्याणी शंकर - 2011-07-15 09:18
मंत्रिमंडल में फेरबदल के एक दिन पहले मैंने सरकार के एक उच्च सूत्र से पूछा कि इसमें देर क्यों हो रही है, तो उस सूत्र ने बताया कि देर होने का कारण यह है कि सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को मंत्री बनने की योग्यता रखने वाले लोग ही नहीं मिल पा रहे हैं। उसने मुझसे पूछा कि आप दस ऐसे लोगों के नाम बताएं, जो मंत्री बनने की योग्यता रखते हों। मैंने कहा कि यदि प्रधानमंत्री को ऐसे लोग पार्टी के अंदर नहीं मिल रहे हैं, तो उन्हें बाजार में ऐसे लोगों को ढ़ूंढ़ना चाहिए।