एक साल के अंदर ही कांग्रेस और राहुल गांधी को उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव का सामना करना है। अगले साल ही गुजरात सहित कुछ अन्य राज्यों के चुनाव भी होने वाले हैं। उत्तर प्रदेश में तो राहुल गांधी की निजी प्रतिष्ठा और कांग्रेस का भविष्य ही दाव पर लगा हुआ है। श्री गांधी वहां कांग्रेस के पांव जमाने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं। वैसे माहौल में उन्हें संभल संभल कर बयान देने चाहिए, लेकिन भुवनेश्वर में उन्होंने जो कुछ कहा उससे उनकी सोच और समझ के बारे में देश भर में गलत संदेश जाएगा और उनके विरोधी उन्हें एक अगंभीर और गैर जिम्मेदार नेता के रूप में जनता के सामने पेश करेंगे।

भुवनेश्वर में की गई बयानबाजी के बाद उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने बिना समय गंवाए राहुल गांधी के उस बयान को गैर जिम्मेदाराना बता भी दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि सभी आतंकी हमले रोकना उनकी पार्टी की सरकार के वश में नहीं है। तथ्यात्मक रूप से सही होने के बाद भी इस तरह का बयान देना किसी भी रूप में उचित नहीं माना जा सकता। बयान देने का समय तो और भी अटपटा है। यदि शांत माहौल में इस तरह का बयान दिया जाता, तो बात कुछ और थी। पर यह बयान उस समय आया है जब मुंबई में तीन बम विस्फोटों में दर्जनों लोग मारे गए हैं और 100 से ज्यादा घायल हुए हैं। इस तरह के बयान जले पर नमक छिड़कने का काम तो करते ही हैं, खुफिया तथा सुरक्षा एजेंसियों में काम कर रहे लोगों में भी लापरवाही का भाव पैदा कर सकता है। आतंक के खिलाफ सक्रिय सुरक्षा और खुफिया तंत्र भी यदि यह मान ले कि यदि एक दो आतंकी घटनाएं घटना स्वाभाविक ही हैं, तो फिर उनसे ऐसी ऐसी भूलें होने लगेंगी कि आतंकी घटनाओं की एक श्रृंखला बनने लगेगी।

राहुल गांधी के उस गैर जिम्मेदाराना बयान के बाद कांग्रेस के अन्य नेताओं ने उनके बचाव में जो कुछ भी कहा है, वे भी अत्यंत ही आपत्तिजनक हैं। कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने तो आतंकवादियों की मौत को उनकी शहादत तक कह डाला। उन्होंने कहा कि आतंकी एक बार शहीद होते हैं, जबकि सुरक्षा बलों को बार बार २शहीद होना पड़ता है। देश के खिलाफ काम करते मारे गए आतंकवादी अब कांग्रेस की नजर में शहीद हैं। इससे ज्यादा हास्यास्पद और क्या हो सकता है?

राहुल गांधी के गॉड फादर की छवि पा रहे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने तो भारत की तुलना पाकिस्तान से कर दी। उन्होंने कह डाला कि भारत मुंबई में जिस तरह की घटना घटी है, उस तरह की घटना तो पाकिस्तान में हर सप्ताह होती है। इससे बड़ा बकवास और कुछ नहीं हो सकता? भ्रष्टाचार के मामलों में जेल में बंद सुरेश कलमाड़ी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद से हटे अशोक चौहान को उन्होंने बेदाग होने का प्रमाणप़त्र कुछ समय पहले ही दिया था। एक के बाद एक बेतुकी बातें करने के बाद उन्होंने अब पाकिस्तान से भारत की तुलना कर डाली। वे भूल गए कि भारत भारत है और पाकिस्ताप पाकिस्तान है। भारत एक सफल लोकतंत्र है, जबकि पाकिस्तान एक विफल व्यवस्था, जिसका एक बार विभाजन भी हो चुका है। पाकिस्तान विश्व व्यापी आतंकवाद का केन्द्र बिन्दु है, जो दुनिया भर के जेहादी आतंकवादियों को दार्शनिक दिशा निर्देश देता है। वह एक ऐसा हिंसक समाज है, जो भारत विरोधी आग मंे जलते जलते अब खुद को जला रहा है। भारत के खिलाफ आतंकवाद को प्रश्रय देते देते पाकिस्तान ने अपनी कई पीढ़ि़यों को आतंकवादी बना डाला है और उसका संगीत अब खुद सुनने के लिए अभिशप्त हो गया है। जहां आतंक की धुन तैयार करके बजाई जाती हो, वहां के लोग तो और भी स्पष्ट तरीके से उस धुन को सुनते हैं। यही पाकिस्तान के साथ हो रहा है। इसलिए प्रत्येक सप्ताह क्या, यदि प्रत्येक दिन भी वहां आतंकी हमले होते हैं, तो वह अस्वाभाविक नहीं माना जा सकता। आज पाकिस्तान एक ऐसा देश बन गया हे, जिसके भविष्य सुरक्षित होने के बारे में दावे के साथ कोई कुछ नहीं कहा जा सकता। वैसे देश के साथ भारत की तुलना करना बेहद ही खतरनाक है।

राहुल गांधी ने भुवनेश्वर के अपने बयान में यह भी कहा कि अफगानिस्तान और इराक में भी हमले होते हैं और वहां भारत की अपेक्षा ज्यादा होते हैं। यह तुलना भी बेमानी है। भारत न तो इराक है और न ही अफगानिस्तान। वे दोनों देश विदेशी सैनिकों के कब्जे में हैं। अमेरिका और नाटो के अन्य देशों के सैनिको की सहायता से उन दोनों देशों की सरकारे चल रही हैं। सख् कहा जाए, तो वे दोनों देश संप्रभु देश हैं ही नहीं। इसलिए भारत की तुलना उन दोनोे देशों से करना भारत का अपमान है।

राहुल ने आतंकवादी हमले के बाद भारत की की तुलना अमेरिका से कर डाली और कहा कि हमले वहां भी होते हैं। सच्चाई यह है कि 2001 में हुए हमले के बाद अमेरिका में कोई हमला हुआ ही नहीं। इराक और अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना पर हो रहे हमले से मुंबई पर हुए हमले की तुलना करना भी हास्यास्पद है। उन दोनों देशों मंे गृहयुद्ध चल रहा है। अमेरिकी सेना उस गृहयुदृध में एक पक्ष का साथ दे रही है। इसलिए दूसरा पक्ष उस पर हमला कर रहा है। क्या राहुल यह कहना चाहते हैं कि भारत में भी गृहयुद्ध चल रहा है?

रामदेव के रामलीला मैदान प्रकरण के बाद कांग्रेस नेताओं की आक्रामकता कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। उन्हें लग रहा है कि आक्रामक होकर विरोधियों का मुह बंद किया जा सकता है और उसकी आड़ में अपनी सरकारों की विफलताओं को भी ढका जा सकता है। यही कारण है कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए लोकपाल के मसले पर भी कांग्रेस आक्रामक रुख अपना रही है और काले धन के मामले पर भी पी चिदंबरम और कपिल सिबल जैसे दागी मंत्रियों को सरकार में रखकर भी प्रधानमंत्री अपनी आक्रामकता का परिचय ही दे रहे हैं। लेकिन सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि 2 जी स्पेक्ट्रम मामले की जेपीसी मांग का आक्रामक विरोध करने के बाद उसने क्या हासिल किया। (संवाद)