एक त्रिपक्षीय सहमति पत्र पर हस्ताक्ष्र होने जा रहा है। पश्चिम बंगाल सरकार, केन्द्र सरकार और गोरखा जन्मुक्ति मोर्चा के बीच यह सहमति हो रही है। इसके तहत उत्तर बंगाल के इलाके को और भी स्वायत्तता दी जाएगी। और बात सिर्फ गोरखांे तक ही सीमित नहीं है, अब तो माओवादी भी कह रहे हैं कि वे मुख्यमंत्री के साथ बातचीत के लिए तैयार हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि गोरखा जन्मुक्ति मोर्चा के साथ सहमति करके मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उस जटिल समस्या के हल के लिए कुछ समय पा सकेंगी। आज केन्द्र सरकार की जो हालत है, उसे देखकर कोई भी कह सकता है कि वह ममता बनर्जी की उपेक्षा नहीं कर सकती। ममता अलग गोरखालैंड की मांग पर कभी भी राजी नहीं हो सकती, इसलिए अलग गोरखालैंड महज एक सपना ही रहेगा। इस बात को गोरखा नेता बिमल गुरंग और रोशन गिरी अच्छी तरह समझते हैं।

दूसरी तरफ माओवादियों की स्थिति थोड़ी अलग है। वे गोरखा आंदोलनकारियों की अपेक्षा ज्यादा मजबूत हैं। वे केन्द्र और राज्य सरकारों के खिलाफ हथियार का इस्तेमाल करते रहे हैं। देश के 120 जिलों में उन्होंने अपनी विशेष पहचान बना ली है। जब भी राजनैतिक सौदेबाजी की बात आएगी, तो माओवादी अपने आपको गोरखा आंदोलनकारियों की अपेक्षा बहुत ज्यादा मजबूत पाएंगे।

पश्चिम बंगाल में माओवादियों के लिए यह सभव नहीं है कि वे अपनी जड़ों को उस हद तक यहां जमा पाएं, जिस हद तक उन्होंने छत्तीसबगढ़ और आंध्र प्रदेश व उड़ीसा के कुछ जिलों में जमा रखी हैं। अविभाजित मिदनापुर, बांकुरा और पुरुलिया जिलों में आदिवासियों का कुल आबादी में अनुपात बहुत ज्यादा नहीं है। अन्य राज्यों के आदिवाासी बहुल जिलों की तुलना में यह कम है। इसके अलावा सच यह भी है कि वाम मोर्चा सरकार ने भले ही उन आदिवासी इलाकों में विकास के काम नहीं किए थे, पर वहां आदिवासियों का शोषण उस तरह नहीं होता, जिस तरह से दूसरे राज्यों में हो रहा है। यह वाम मोर्चा सरकार ने सुनिश्चित करा दिया था।

सवाल उठता है कि इसके बाद भी वाम मोर्चे की सरकार ने आदिवासियों का समर्थन क्यों खो दिया? तो इसका जवाब यह है कि पंचायतों में हो रहे भ्रष्टाचार ने वाम दलों का काम तमाम कर दिया। प्रशासन भी आदिवासियों को सुरक्षा एवं राहत पहुंचाने में भ्रष्टाचार के कारण विफल रहा।

और यहीं ममता बनर्जी सबसे ज्यादा सतर्क दिखाई दे रही हैं। वाम मोर्चा के नेताओं ने तो उत्तरी बंगाल व आदिवासी इलाकों में उस समय जाना ही बंद कर दिया था, जब वहां माहौल अशांत होने लगा था। अशांत इलाकेां के थानों से तो पूलिस तक को वापस बुला लिया गया था। ऐसा तो अंग्रेजों के जमाने में भी कभी नहीं हुआ था।

ममता बनर्जी उत्तर और दक्षिण बंगाल के इन इलाकों में विपक्ष की नेता के रूप में भी अशांति के दौर में जाया करती थीं। उस समय भी वे वहां सभाएं करती थीं और वायदा करती थीं कि जब उनकी सरकार आएगी, तो वे उनके लिए क्या क्या करेंगी। विपक्ष में रहकर भी उन्होंने उन ताकतों के साथ संवाद स्थापित कर रखा था, जिनका सामना करने के लिए भी वाम मोर्चा का नेता डर के मारे तैयार नहीं होते थे।

अब सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी अपने संपर्काें के द्वारा वहां के लोगों की नब्ज को समझने में सफल हो रही हैं और बातचीत के द्वारा अशांत लोगों को शांत करने के प्रयास में लगी हुई हैं। दक्षिण बंगाल में उनकी सभाओं में काफी भीड़ हुआ करती थीं और आने वाले दिनों में जब उनकी वहां की फिर से यात्रा होगी, तो फिर उसी तरह का जन सैलाब उमड़ेगा। (संवाद)