अकाली दल और भाजपा के मोर्चे की इस हालत को समझने के लिए कोई विशेष दिमाग की जरूरत नहीं है। उनका पतन साफ दिखाई पड़ रहा है और समय बीतने के साथ साथ उसकी स्थिति और भी कमजोर होती जा रही है। गौरतलब है कि अगले साल फरवरी महीने में पंजाब विधानसभा का आमचुनाव होना है।

मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल इसी विधानसभा के कार्यकाल के दौरान अपने बेटे सुखबीर सिंह बादल को अपने पद पर बैठा देना चाहते थे। वे चाहते थे कि अगला चुनाव तो उनके नेतृत्व में अकाली दल लड़े, पर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उस समय उनके बंेटे सुखबीर सिंह बादल बैठे हों। पर अपने बेटे के मुख्यमंत्री बनने का सपना विधानसभा के इस कार्यकाल में वे पूरा न कर सके।

इसके दो कारण हैं। पहला कारण तो भतीजे मनप्रीत हैं। वे कुछ समय पहले बादल सरकार में वित्तमंत्री हुआ करते थे। उनका सुखबीर के साथ तकरार हो गया। उन्हें वित्तमंत्री के पद से हटा दिया गया और उन्होंने अकाली दल से भी अपने आपको बाहर कर लिया। दल से बाहर होने के बाद उन्होंने पंजाब पीपुल्स पार्टी का गठन कर लिया है।

अब बाप बेटे को डर लग रहा है कि कहीं सुखबीर के मुख्यमंत्री बनने के बाद अन्य अकाली दल के नेता भी पाटी्र से बाहर न भागें। मनप्रीत की पार्टी उन्हें जगह देने के लिए तैयार बैठी है। सच तो यह है कि अनेक असंतुष्ट अकाली नेता मनप्रीत की पार्टी में शामिल भी हो चुके हैं।

सुखबीर को मुख्यमंत्री नहीं बनाने का एक दूसरा कारण कैप्टन अमरिन्दर सिंह का प्रदेश कांग्रेस कमिटी का अध्यक्ष बन जाना है। श्री बादल को लगा कि उनके सामने उनका बेटा कमजोर साबित हो जाएगा, इसलिए उन्होनंे उनका सामना करने का जिम्मा अपने ऊपर ही ले रखा है।

सुखबीर को मुख्यमंत्री नहीं बनाने के पीछे अकाली दल की यह कमजोरी ही काम रही थी। पिछला चुनाव उसने भाजपा के साथ गठबंधन करके जीता था, पर अब उसे साफ दिखाई दे रहा है कि भाजपा राज्य में कमजोर हो गई है। अब वह पिछले चुनाव की जीत को दुहरा नहीं सकती और उसके कारण अकाली दल के उम्मीदवारों को भी पिछले चुनाव जैसा अतिरिक्त समर्थन नहीं मिल सकेगा।

यही कारण है कि अकाली दल ने अन्य दलों के साथ भी गठबंधन करने के रास्ते खोल दिए हैं। पंजाब में बसपा का कुछ जनाधार है। दल ने अपने मोर्चे में बसपा को लाने की भी कोशिश की, लेकिन बसपा ने उसके साथ किसी प्रकार का समझौता अथवा तालमेल से इनकार कर दिया है।

भाजपा के कारण अकाली दल को पिछले चुनावों ेमें शहरों ेमें भी अच्छा समर्थन मिला था, पर इस बार शहरी मतदाता अकाली दल और भाजपा दोनों के खिलाफ हो गए लगते हैं। इसका कारण यह है कि प्रकाश सिंह बादल की सरकार ने अपने वर्तमान कार्यकाल में गांवों को बहुत महत्व दिया। उन्हें अनेक सुविधाएं दी गईं और उनकी सुविधाओं का बोझ शहरी लोगों पर डाल दिया गया। यही कारण है कि इस बार शहरी मतदाताओं का मूड सत्तारूढ़ मोर्चे के खिलाफ है।

यदि अकाली दल को अभी कुछ राहत मिल रही है, तो वह कैप्टन अमरेन्दर सिंह के रवैये के कारण मिल रही है। कैप्टन सिंह आम कार्यकर्त्ताओं से दूर रहना पसंद करते हैं। जब उन्हें इस बार प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया था, तो उन्होंने कहा था कि वे अब कार्यकर्त्ताओं के साथ ज्यादा समय बिताना पसंद करेंगे, लेकिन वैसा वे कुछ कर नहीं रहे हैं।

सच कहा जाए, तो मनप्रीत की पार्टी अकाली दल ही नहीं, बल्कि कांग्रेस के चुनावी आकलन को भी गड़बड़ा सकती है। वाम दलों के साथ मनप्रीत की पार्टी ने मोर्चेबंदी कर ली है। अकाली दल से खफा लोगों को उनका मोर्चा एक मंच उपलब्ध करा रहा है, जो कांग्रेस के हितों के खिलाफ भी जा सकता है। ऐसी स्थिति भी आ सकती है कि चुनाव के बाद न तो कांग्रेस को बहुमत मिले और न ही अकाली दल और भाजपा मोर्चे को। (संवाद)