जयललिता की सत्ता पर लगा यह ब्रेक शिक्षा से ताल्लुक रखता है। पिछले मुख्यमंत्री करुणानिधि ने जाते जाते स्कूली शिक्षा की एक समरूप प्रणाली विकसित करने की कोशिश की थी और इसके लिए एक कानून भी बनाया था, जिसे 2011-12 के शैक्षिक सत्र से लागू होना था।
लेकिन मुख्यमंत्री जयललिता ने शिक्षा की इस नई प्रणाली को अमल में आने से रोकना चाहा। वह पिछली सरकार के अनेक निर्णयों को एक के बाद एक बदल रही हैं। उसी क्रम में उन्होंने शिक्षा जगत से जुड़े इस निर्णय को भी बदलने की कोशिश की। विधानसभा में प्राप्त भारी बहुमत के बूते इसे बदलना उन्हें कठिन भी नहीं लग रहा था, क्योंकि किसी भी कानून को कानूनी तरीके से समाप्त तो किया ही जा सकता है।
पर मामला यहां बच्चों की शिक्षा का था। करोड़ों बच्चों की शिक्षा यहां दांव पर लगी हुई थी। जयललिता के सत्ता में आने के पहले ही शिक्षा का नया सत्र प्रारंभ हो गया था और वह नई व्यवस्था लागू हो गई थी। नई प्रणाली के तहत करोड़ों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी थीं और जुलाई महीने मंे स्कूलों के खुलने के बाद वे बच्चों के बीच बंटने को तैयार भी थीं।
इसमें कोई शक नहीं कि चुनावों में करुणानिधि को भारी झटका लगा, लेकिन उस हार के पहले उन्होंने जो शिक्षा की प्रणाली तैयार की थी और जो पाठ्यक्रम तैयार किए गए थे, उनमें यह ध्यान रखा गया था कि खुद उनका महिमामंडन नहीं हो, ताकि अगर सरकार बदल भी गई तो उसमें छेड़ छाड़ करने की कोशिश नई सरकार नहीं करे। पर नई सरकार को लगा कि वे पाठ्यक्रम सही नहीं हैं और उन्हें बदल दिया जाना चाहिए।
जब मामला अदालत में गया तो सरकार ने कहा कि उसने नई प्रणाली को समाप्त नहीं किया है, बल्कि कानून में संशोधन के द्वारा उसे स्थगित कर दिया गया है। स्थगन की इस अवधि में विशेषज्ञ लोगों द्वारा उसकी जांच कराई जाएगी और अंतिम फैसला उसके बाद ही लिया जाएगा। पर अदालत ने साफ साफ कहा कि इससे संबंधित कानून में संशोधन का विधानसभा का फैसला असंवैधानिक है, क्योंकि वह कानून अमल में आ चुका था, भले ही उसका क्रियान्वयन आंशिक तौर पर हुआ हो। यह कहते हुए उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के फैसले पर रोक लगा दी। अब राज्य सरकार उच्च न्यायालय के उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जा रही है।
अदालत ने कहा कि सरकार उन पुस्तकों को 22 जुलाई के पहले छात्रों के बीच वितरित करवा दे ताकि शिक्षक पढ़ाई का काम शुरू कर सकें। राज्य सरकार ने अनुरोध किया कि सुप्रीम कोर्ट तक मामला ले जाने तक उव्व न्यायालय अपने फैसले के अमल को स्थगित रखने की इजाजत दे। पर उच्च न्यायालय ने सरकार के इस अनुरोध को ठुकरा दिया।
राज्य की राजनैतिक पार्टियों ने सरकार से अनुरोध किया है कि वह उच्च न्यायालय के फैसले को स्वीकार कर ले और सुप्रीम कोर्ट में अपील नहीं करे। उन पार्टियों में चुनाव के समय जयललिता की पार्टनर रही सीपीआई और सीपीएम भी शामिल हें। ये नहीं चाहतीं कि प्रदेश में शिक्षा के माहौल में अनिश्चितता रहे और पढ़ाई का काम रुका रहे, पर मुख्यमंत्री जयललिता आसानी से हार मानने वाली सख्शियत नहीं हैं और वह इस मामले को सुप्रीम कोर्ट मे ले जा रही हैं। (संवाद)
जयललिता की सत्ता पर न्यायपालिका का अंकुश
शिक्षा के क्षेत्र में मनमानी नहीं कर पाई मुख्यमंत्री
एस सेतुरमण - 2011-07-27 09:03
चेन्नईः सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री जयललिता ने एक के बाद एक निर्णय लेने शुरू कर दिए। शुरुआती दो महीने तो ठीकठाक रहा, लेकिन उसके बाद न्यायपालिका ने उनके एक निर्णय पर ब्रेक लगाकर उन्हें अहसास दिला दिया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मुख्यमंत्री जो चाहे, वह सभी काम नहीं कर सकता। उसे नियम कायदों और कानूनों के मुताबिक ही चलना होता है।