बसपा से नेताओं की भगदड़ मच रही है। उन्हें लग रहा है कि लोगों का मूड सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ होता जा रहा है और चुनाव में दुबारा जीतना इसके लिए संभव नहीं होगा। इसका कारण यह है कि पिछले कुछ महीनों से राज्य का राजनैतिक वातावरण एकाएक मायावती और उनकी पार्टी के लिए बहुत ही प्रतिकूल हो गया है। अदालतें भूमि अधिग्रहण के उसके निर्णयों को एक के बाद एक पलटती जा रही है। राज्य में किसानों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है। बलात्कार और हत्या की खबरें मीडिया में भरी हुई हैं। स्वास्थ्य विभाग में घोटाला और अनेक डाक्टरों की हत्याओं से माहौल गमगीन हो गया है। भ्रष्टाचार के अनेक किस्से लोगों के बीच तैर रहे हैं।
इस तरह के माहौल में बसपा नेताओं का विश्वास भी डगमगाने लगा है और उनमें से अनेक अब अपने भविष्य को सुरक्षित करने के लिए पार्टी छोड़कर दूसरा मुकाम तलाशने लगे हैं। और छोड़ने वाले ज्यादातर समाजवादी पार्टी की ओर मुखातिब हो रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि बसपा का विकल्प राज्य मे ंसपा ही है।
विधायकों में पहल बाराबांकी के विधायक फरीद महफूज किदवई ने की। उन्होंने बसपा छोड़कर सपा का दामन थाम लिया। पार्टी छोड़़ने का कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि बसपा मे उनका दम घुट रहा था। वे मुख्यमंत्री से मिल पाने में भी सक्षम नहीं थे। वे अपने क्षेत्र का काम भी सरकार से करा पाने में समर्थ नहीं हो पा रहे थे।
फरीद का कहना है कि बसपा के अधिकाश विधायकों का यही हाल है। मुख्यमंत्री किसी को भी मिलने का समय नहीं देती। इसके अलावा सरकार और पार्टी के शीर्ष से अफसरों को यह आदेश मिला है कि वे विधायकों और सांसदों की पैरवी सिफारिशों को नहीं सुनें। इसके कारण विधायक अपने क्षेत्र में किसी का भी काम नहीं करवा पाते हैं, क्योकि अफसर उनकी सुनते ही नहीं हैं।
मुख्यमंत्री मायावती को उस समय भी झटका लगा, जब अंबेडकर नगर जिले के जलालपुर विधायक शेर बहादुर ने पार्टी छोड़ दी और सपा की सदस्यता प्राप्त कर ली। उसके पहले बसपा नेता मुरादाबाद से विधायक राजीव चन्ना ने अपने समर्थकों के साथ पार्टी छोड़ दी थी और वे सपा में शामिल हो गए थे। विधानसभा में विपक्ष के नेता शिवपाल सिंह यादव और प्रदेश सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की उपस्थिति में बिजनोर के प्रखंड प्रमुख अबरार अहमद भी सपा में शामिल हो गए। मोहनलालगंज से बसपा के नेता अश्विनी मिश्र और राजीव शुक्ल भी पार्टी छोड़कर समाजवादी पार्टी मे उसी समय शामिल हुए थे।
बसपा के नेताओं का पार्टी में आने पर स्वागत करते हुए शिवपाल सिंह यादव ने कहा कि मायावती सरकार के भ्रष्टाचार ने बसपा नेताओं को पार्टी छोड़कर सपा में आने को मजबूर किया है।
समाजवादी पार्टी को उस समय एक बड़ी सफलता मिली, जब राज्य के पूर्व महाधिवक्ता एसएमए काजमी ने पार्टी में फिर से वापसी की। श्री काजमी को मायावती सरकार ने अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष बना रखा था। श्री काजमी ने पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव की प्रशंसा करते हुए कहा कि वे उनका बहुत सम्मान करते हैं और मानते हैं कि उन्होंनंे अल्पसंख्यकों के लिए बहुत कुछ किया। उन्होंने कहा कि उन्होंने पार्टी द्वारा कल्याण सिंह से हाथ मिलाने के कारण ही पार्टी छोड़ी थी, क्योंकि हम कल्याण सिंह को बाबरी मस्जिद के विध्वंस के लिए जिम्मेदार मानते हैं। सपा ने अब कल्याण सिंह से संबंध तोड़ लिया है, इसलिए अब उन्हे ंसमाजवादी पार्टी से कोई शिकायत नहीं है। बसपा के बारे में बात करते हुए श्री काजमी ने कहा कि उसमें मुस्लिम नेताओं का कोई सम्मान नहीं है, और उनके साथ बंधुआ मजदूरों जैसा सलूक किया जाता है।
अभी कुछ दिन पहले ही नसीमुद्दीन सिद्दकी के भाई ने सपा के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव से मुलाकात की। गौरतलग है कि नसीमुद्दीन सिद्दकी मायवती सरकार में मंत्री हैं और उन्हें अनेक महत्वपूर्ण मंत्रालय मिले हुए हैं। उनका मायवती के बाद इस सरकार में सबसे मजबूत मंत्री माना जाता है। उनके भाई की अखिलेश यादव से मुलाकात के बाद मायावती के कान खड़े हो गए हैं।
पिछले फरवरी महीने में जब समाजवादी पार्टी का गोरखपुर सम्मेलन हुआ था, तो उस समय बसपा सांसद ब्रजेश पाठक के छोटे भाई राजेश ने भी समाजवादी पार्टी की सदस्यता हासिल कर ली थी। लेकिन उसके बाद ब्रजेश पाठक पर मायावती का दबाव पड़ने लगा और उस दबाव के नीचे राजेश को सपा छोड़कर बसपा में आना पड़ा था।
सच तो यह है समाजवादी पार्टी के दरवाजे पर अनेक लोग दस्तक दे रहे हैं। वे पार्टी में शामिल होना चाहते हैं और इसके कारण बसपा ही नहीं, बल्कि भाजपा और कांग्रेस के अंदर भी दहशत का माहौल बना हुआ है। (संवाद)
बसपा नेताओं का पार्टी से भगदड़ शुरू
अधिकांश नेता समाजवादी पार्टी का रुख कर रहे हैं
प्रदीप कपूर - 2011-08-02 11:53
लखनऊः जैसे जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं, समाजवादी पार्टी मजबूत होती जा रही है। बसपा को छोड़ने वाले अधिकांश नेता समाजवादी पार्टी में ही शामिल हो रहे हैं, क्योंकि उन्हें लग रहा है कि सपा में शामिल होकर ही वे अपना भविष्य सुरक्षित कर पाएंगे। दूसरे शब्दों में कहें, तो बसपा को छोड़ने वाले उन नेताओं को लगता है कि सपा ही बसपा को चुनावी शिकस्त दे सकती है।