मुख्यमंत्री ने संसद का सत्र शुरू होने के पहले प्रधानमंत्री और केन्द्रीय वित्तमंत्री पर निशाना साधा और 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले मे उन दोनों की संलिप्तता पर सफाई मांगी। गौरतलब है कि 2 जी घोटाले में गिरफ्तार ए राजा ने प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री दोनों को भी उस घोटाले के लिए जिम्मेदार बता दिया है और उसके बाद विपक्ष ने वित्तमंत्री के साथ प्रधानमंत्री को भी सीधे तौर पर ललकारना शुरू कर दिया है।

अब मुख्यमंत्री जयललिता भी विपक्ष के सुर में सुर मिलाकर केन्द्र सरकार पर हमले बोल रही है। सत्ता में आने के बाद वह एकाएक केन्द्र सरकार के खिलाफ आक्रामक नहीं हुई है। उनकी यह विलंबित आक्रामकमता का संदेश यही है कि वह केन्द्र सरकार से अब निराश होने लगी है। उसे केन्द्र से उम्मीद थी कि राज्य को वह वित्तीय सहायता करेगा। चुनाव के पहले जयललिता ने अनेक वायदे किए थे और उन्हें पूरा करने के लिए सरकार के पास पया्रप्त वित्तीय संसाधन नहीं हैं। इसलिए उसे केन्द्र की सहायता चाहिए। पर केंन्द्र उसकी सहायता के लिए सामने नहीं आ रहा। इसके अलावा श्रीलंकाई तमिलों के मुद्दों पर भी जयललिता को केन्द्र सरकार से निराशा हाथ लग रही है।

केन्द्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम के खिलाफ तो मुख्यमंत्री पहले से ही आक्रामक रही हैं। सत्ता में आने के तुरंत बाद उन्होंने पी चिदंबरम का मुद्दा उठाया था। मुख्यमंत्री बनने के बाद दिल्ली की अपनी पहली यात्रा के दौरान ही उन्होंने कहा था कि पी चिदंबरम लोकसभा चुनाव हार गए थे और उन्होंने गलत तरीके से जीत का प्रमाण पत्र हासिल कर लिया था। उस अनियमितता का मामला अभी भी अदालत में चल रहा है। गौरतलब हैं कि अपने लोकसभा क्षेत्र से पी चिदंबरम पहले पराजित घोषित कर दिए गए थे। उनकी हार की खबर मीडिया तक में आ गई थी, लेकिन उसके कुछ समय बाद उन्हें जीत का प्रमाण पत्र दे दिया गया। उन्होंने जयललिता की पार्टी के उम्मीदवार ने ही पराजित किया था।

यही कारण है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद अपनी पहली दिल्ली यात्रा में ही उन्होंने पी चिदंबरम से इस्तीफा मांगा और प्रधानमंत्री से भी अनुरोध किया कि वे अपने मंत्रिमंडल से पी चिदंबरम को हटा दें। अब तो वे पी चिदंबरम पर 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में शामिल होने के लिए भी उनके खिलाफ आवाज बुलंद कर रही है।

केन्द्र सरकार के खिलाफ आक्रामक होते हुए उन्होंने यहां तक कह दिया है कि 2014 के पहले भी लोकसभा चुनाव के बारे में हमें सोचना चाहिए। जया की महत्वाकांक्षा प्रधानमंत्री बनने की भी है। केन्द्र सरकार के खिलाफ उनकी यह आक्रामकता का राज यह भी है। वह राष्ट्रीय राजनीति में भी अपनी दखल बढ़ाना चाहती हैं।

केन्द्र के साथ साथ उन्होंने डीएमके के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया है। अनेक डीएमके नेताओं को भूमि घोटाले में गिरफ्तार किया गया है। करुणानिधि के बेटे स्टालिन को भी कुछ समय के लिए गिरफ्तार किया गया था। उस समय वे पुलिस द्वारा अन्य डीएमके नेताओं की गिरफ्तारी में अवरोध पैदा कर रहे थे। करुणानिधि की पुत्र बहु और केन्द्रीय रसायन मंत्री अलगिरी की पत्नी के खिलाफ भी जमीन घोटाले का मामला चलाया जा रहा है।

जयललिता सरकार द्वारा डीएमके के नेताओं के खिलाफ की जा रही कार्रवाई का विरोध करते हुए करुणानिधि ने उसे बदले की राजनैतिक कार्रवाई बताई है, तो जयललिता कह रही हैं कि डीएमके नेताओं द्वारा अवैध जमीन कब्जे की शिकायतें पहले से ही आ रही थीं, लेकिन पूर्ववर्ती सरकार उन शिकायतों पर काम नहीं कर रही थी, जबकि उनकी सरकार इस तरह के गैरकानूनी कब्जों और घोटालों के खिलाफ गंभीर रुख अपनाती है।

डीएमके नेताओं के खिलाफ की जा रही कार्रवाई के विरोध में करुणानिधि एकाएक सक्रिय हो गए हैं। हार के बाद उनमें तथा उनकी पार्टी के नेताओं में जड़ता का जो भाव आ गया था, वह अब टूटने लगा है। (संवाद)