कांग्रेस केन्द्र के भ्रष्टाचार को लेकर पहले से ही सांसत में है। दिल्ली और केरल के भ्रष्टाचार के मामलों ने उसे नया सिरदर्द देना शुरू कर दिया है। कांग्रेस के लिए आज बड़ी समस्या निर्णय लेने की है। उसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी विदेश में अपना इलाज करवा रही हैं। वह पार्टी ेके लिए कोई निर्णय करने की स्थिति में फिलहाल नहीं है। अपनी अनुपस्थिति में पार्टी का काम चलाने के लिए उन्होंने 4 सदस्यों की एक समिति बना दी है, लेकिन उस समिति के एक महत्वपूर्ण सदस्य राहुल गांधी खुद सोनिया गांधी के साथ विदेश में ही हैं। देश में बचे कांग्रेस की उस समिति के 3 सदस्य शीला दीक्षित और ओमान चांडी को हटाने के मसले पर निर्णय नहीं ले सकते। और शीला वे श्री चांडी अपने आप मुख्यमंत्री की गद्दी छोड़ने से रहे।

शीला दीक्षित के इस्तीफे का मसला कैग की रिपोर्ट आने के बाद आ खड़ा हुआ है। उसमें सुश्री दीक्षित को भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। कैग की रिपोर्ट के पहले प्रधानमंत्री द्वारा गठित शुंगलू समिति ने भी शीला दीक्षित को राष्ट्रमंडल खेलों में हुए भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार बताया था। ओमन चांडी का मामला बहुत पुराना है। वह 1992 के साल से ताल्लुकात रखता है। उस समय वे केरल के वित्त मंत्री हुआ करते थे और उस समय पामोलिन आयात में घोटाला था। उस घोटाले के कारण ही पिछले दिनों सीवीसी थॉमस को अपनी गद्दी छोड़नी पड़ी थी। अब उसी घोटाले की जद में श्री चांडी आ गए हैं और एक अदालत ने उस घोटाले में उनकी संलिप्तता की जांच के आदेश दे दिए हैं। वहां सवाल यह खड़ा हो गया है कि चांडी की सरकार खुद चांडी की जांच करने में किस तरह सक्षम हो सकती है। यही कारण है कि विपक्ष उनसे इस्तीफा मांग रहा है।

दिल्ली में भाजपा शीला दीक्षित की सरकार के पीछे पड़ी हुई है। भ्रष्टाचार के आरोप के कारण ही कर्नाटक में यदुरप्पा की भाजपा सरकार को इस्तीफा देना पड़ा था। यदुरप्पा की लोकप्रियता के कारण ही भाजपा को पहली बार दक्षिण भारत में अपनी सरकार बनाने का मौका मिला था। अभी भी यदुरप्पा वहां भाजपा के सबसे लोकप्रिय नेता हैं और विधानसभा में भाजपा विधायकों का बहुमत भी उनके साथ है। इसके बावजूद उन्हें गद्दी छोड़ना पड़ा, क्योंकि लोकायुक्त ने उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले पाए। उनके इस्तीफे के लिए कांग्रेस उन पर दबाव डाल रही थी। अब बारी भाजपा की है और वह कांग्रेस को दिल्ली की शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए संसद के अंदर और बाहर दोनों जगह जबर्दस्त दबाव बना रही है। दूसरी तरफ कांग्रेस और खुद शीला दीक्षित इस्तीफे से साफ इनकार कर रही है।

कैग ने शीला दीक्षित को राष्ट्रमंडल खेलों के भ्रष्टाचार के मामले में लिप्त पाया है। उसके रिपोर्ट का निष्कर्ष यही है। रिपोर्ट लिखने के पहले कैग ने दिल्ली सरकार को सफाई का मौका दिया था। दिल्ली सरकार ने सफाई भी दी, लेकिन कैग को लगा कि उसकी सफाई मे दम नहीं है। लिहाजा शीला दीक्षित के भ्रष्टाचार में शामिल होने की रिपोर्ट आ गई। अब कंांग्रेसी कैग की रिपोर्ट को झूठ का पुलिंदा बता रहे हैं और कह रहे हैं कि स्थापित प्रक्रिया के तहत ही कैग रिपोर्ट पर कार्रवाई होगी। उसका कहना है कि पहले वह रिपोर्ट पीएसी के पास जाएगी। वहां उस पर विचार होगा और उस पर पीएसी की रिपोर्ट आने के बाद ही कोई कार्रवाई होगी। सवाल उठता है कि कैग की रिपोर्ट के मामले में दोहरे मानदंड कैसे हो सकते हैं? गौरतलब है कि कैग की रिपोर्ट आने के बाद ही ए राजा को मंत्री पद से हटाया गया था और आज वे जेल में हैं। उनके मामले में तो पीएसी की रिपोर्ट आने का इंतजार नहीं किया गया। तो फिर शीला दीक्षित के मामले में पीएसी का हवाला देकर उन्हें बचाने की कोशिश कांग्रेस कैसे कर सकती है? अपने समर्थक दल के नेताओं और अपनी पार्टी के नेताओं के मामले में दुहरा मानदंड कांग्रेस कैसे अपना सकती है?

अन्ना हजारें के भ्रष्टाचार के खिलाफ छिड़े आंदोलन के कारण शीला दीक्षित को उनके पद से हटाने की मांग लगातार तेज होती जा रही है। इसलिए कांग्रेस को शीला दीक्षित को हटाने के लिए जल्द निर्णय लेना चाहिए, कैग की रिपोर्ट का मजाक उड़ाने से काम नहीं चलेगा। वैसे भी राष्ट्रमंडल खेलों में हुआ भ्रष्टाचार जग जाहिर है।

उसी भ्रष्टाचार के मामले में सुरेश कलमाड़ी पर मुकदमा चल रहा है और वह जेल में हैं। कांग्रेस आदर्श घोटाले में अशोक चौहान की सरकार को हटा चुकी है। ए राजा कैग रिपोर्ट आने के बाद ही हटाए गए थे और वे आज जेल में हैं। 2 जी स्कैम में करुणानिधि की बेटी कनीमोझी जेल में है। तो फिर सवाल उठता है कि कांग्रेस को शीला दीक्षित से मोह क्यों है? उन्हें बचाने के लिए दोहरा मानदंड क्यों? (सवाद)