शारीरिक रुप से अधिक क्षमतावान होने के कारण बाल और वृद्ध, बीमार या अधेड़, सभी उनकी ओर ही आशा भरी निगाहों से देखते हैं। इन युवाओं के मन-मस्तिष्क पर अधिक उम्र के लोग, विशेषकर शिक्षाविद और समाजशास्त्री अपने-अपने तरह से नक्काशी करने में लगे रहते हैं। कुछ लोग तो अपनी सीमाओं का अतिक्रमण कर बोल देते हैं कि आज का युवा वर्ग भटक गया है। वे भूल जाते हैं कि आज भी सारे कार्य जिनमें शारीरिक क्षमता की आवश्यकता होती है वे युवा वर्ग ही कर रहे हैं - चाहे वह विनिर्माण या अवसंरचना का क्षेत्र हो या सीमा की सुरक्षा का, आपातकालीन राहत कार्य हो या अपनी जान पर खेलकर लोगों को बचाने का। हां, युवा वर्ग की एक बड़ी संख्या भटकी हुई है, जिनके मूल में उनके मन-मस्तिष्क में की गयी हानिकारक नक्काशियां ही हैं, जिनकी जिम्मेदारी भी उन्हें ही स्वीकार करनी चाहिए जिन्होंने ऐसी शिक्षा दी और अपने हानिकारक प्रभाव छोड़े। परन्तु यह समय दोषारोपण के खेल का नहीं, बल्कि कुछ कर गुजरने का है, वह भी युवाओं द्वारा स्वयं।

अनेक युवा सही दिशा में पहले से ही सतत् प्रयत्नशील हैं। अनेक युवा समयानुसार गलत काम भी कर लेते हैं और सही भी। परन्तु अनेक युवा ऐसे हैं जो ज्ञान के अभाव में गलत रास्ते पर ही चलते रहते हैं तथा अपना विनाश स्वयं सुनिश्चित कर लेते हैं। जो युवा सही दिशा में चल रहे हैं वे भी अनेक बार विभ्रम के शिकार होकर अपना विनाश स्वयं कर लेते हैं। ऐसी स्थिति सब पर लागू होती है। महाभारत काल में अर्जुन को भी इसका भ्रम हो गया था परन्तु उन्होंने युद्ध के मैदान में ही कृष्ण से पूछ लिया - हे कृष्ण, जिस ज्ञान की बात आप कर रहे हैं वह प्राप्त हो भी जाये तो उसके बाद क्या होगा? कृष्ण ने उत्तर दिया - जब ज्ञान हो जाता है तो व्यक्ति स्वयं अपना विनाश नहीं करता।

युवा वर्ग स्वयं में देखे कि क्या वह स्वयं अपना विनाश कर रहा है? यदि इसका उत्तर हां में है तो वह तत्काल इसपर लगाम कस दे।

परन्तु जिन युवाओं को यह नहीं मालूम कि वह स्वयं अपना विनाश कर रहे हैं या नहीं उन्हें श्रीमद् भगवद गीता की इस उक्ति को ध्यान में रखना चाहिए कि कुछ कार्य प्रारम्भ में अमृत के समान होते हैं परन्तु परिणाम में विष के समान, और कुछ कार्य वैसे होते हैं जो प्रारम्भ में विष के समान लगते हैं परन्तु परिणाम में अमृत के समान होते हैं। अर्थात् जिसका परिणाम दुखदायी होता वे सभी कार्य विनाशकारी हैं, जिन्हें करते हुए व्यक्ति स्वयं का नाश कर लेता है। यदि फिर भी कोई संशय रह जाये जो युवा को किसी ज्ञानवान व्यक्ति से पूछना चाहिए कि वह जो कार्य कर रहा है वह स्वयं का नाश करने वाला है या नहीं। यदि विद्वानों के बीच उस मुद्दे पर मतभेद हो तो उसे किसी सात्विक व्यक्ति की खोज करनी चाहिए क्योंकि उसका स्वाभाविक रूझान ही उस विकट समय में सही दिशा होती है।

युवाओं में अनेक युवा वैसे हैं जो किन्हीं कारणों से शारीरिक रुप से कमजोर होते हैं। ऐसे युवाओं में से कुछ के लिए स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि पहले जाकर "फुटबॉल खेलो"। उनका आशय यह था कि शारीरिक रुप से स्वस्थ तथा शक्तिशाली युवा ही कुछ कर सकता है।

वास्तव में स्वास्थ्य जीवन के विकास की पहली शर्त है। विख्यात प्राचीन वैद्य महर्षि चरक ने तो कहा था कि यदि व्यक्ति स्वस्थ नहीं है तो वह जीवन के चारों पुरुषार्थों - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – में से किसी को भी हासिल नहीं कर सकता। उपनिषदों में अनेक स्थानों पर स्वास्थ्य को ब्रह्म तक कहा गया। स्वामी विवेकानंद इस तथ्य के महत्व को जानते थे। इसलिए उन्होंने भी स्वास्थ्य को महत्वपूर्ण माना तथा पहले स्वस्थ बनने की सलाह दी।

जो युवा इंद्रियों की दासता के कारण अपने ही स्वास्थ्य का नाश कर अपना नाश कर लेते हैं उनके प्रति हमारे अग्रजों की चिंता उचित है। जिन सुखों की तलाश में व्यसनों का सहारा लेकर क्षणिक सुख प्राप्त करने का उपक्रम करने वाले युवा अंतत: काम और अर्थ का सुख भी भोग पाने की स्थिति में नहीं रह जाते, धर्म तथा मोक्ष की तो बात ही दूर।

जो युवा इन तथ्यों को जानते हैं परन्तु वे इनके अनुकूल आचरण नहीं कर पाते उनके लिए भी स्वामी विवेकानंद के दिशा-निर्देशन स्पष्ट हैं। इन सब पर विजय पाने के लिए वह कर्म योग, ज्ञान योग, तथा ध्यान योग का अभ्यास करने की सलाह देते हैं।

अपने प्रवचनों में वह बार-बार कहते हैं - उठो, जागो, और तब तक चलते रहो जब तक अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच जाओ।

परन्तु वह जागना किसे कहते हैं? यदि जाग जाये तो फिर उठकर किस प्रकार चलना होता है ताकि वांछित लक्ष्य हासिल किया जा सके?

स्वामी विवेकानंद के सम्पूर्ण प्रवचनों से एक ही बात स्पष्ट होती है कि जब मनुष्य को यह ज्ञान हो जाता है कि संसार में जो भी अस्तित्व है वे अनेक नहीं बल्कि एक ही है। इसे ही वह अद्वैत कहते हैं। अर्थात् यदि आप किसी का अहित करते हैं तो वास्तव में आप स्वयं का अहित करते हैं क्योंकि दूसरा तो कोई है ही नहीं। उनके सम्पूर्ण ज्ञान का सार ही यही है जिसे व्यक्ति स्वयं देख सकता है। आप समस्त जीव जन्तुओं, वनस्पतियों आदि जीवजगत का नष्ट कर किस प्रकार अपने ही नाश का इंतजाम कर रहे हैं और किस प्रकार स्वयं को संकट में डालते रहे हैं यह जग जाहिर है। इस तरह स्वयं को नष्ट नहीं करने का भाव उत्पन्न होना ही मनुष्य का जागना है।

परन्तु जागने मात्र से काम नहीं चल सकता। उसके लिए कर्म आवश्यक है। कर्म के बिना तो व्यक्ति का शरीर भी ठीक ढंग से नहीं चल सकता। इसलिए सभी विद्वान कर्म पर ही सर्वाधिक जोर डालते हैं। परन्तु कर्म क्या है इसपर विद्वानों में भी संदेह उत्पन्न हो जाता है। इसे स्पष्ट करते हुए स्वयं व्यास के सम्पूर्ण वांड.मय दो बातें लिखी गयी हैं - परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीड़नम। अर्थात् जिस कर्म से किसी का उपकार होता हो वह पुण्य है, तथा किसी को पीड़ा होती हो वह पाप है। इसलिए किसी को पीड़ित कर सुख प्राप्त करने कि लिए किये गये सभी कार्य गलत हैं। यहां कहीं कोई संदेह नहीं। स्वामी विवेकानंद के अद्वैत के अनुसार चूंकि दूसरा कोई है ही नहीं, इसलिए किसी को भी पीड़ित करना स्वयं को ही पीड़ित करना है।

कर्म के मामले में श्रीमद्भग्वद गीता का निर्देश है - ज्ञानदग्ध कुरु कर्माणि। अर्थात् अपने समस्त कर्मों को ज्ञान की अग्नि से शुद्ध करो। फिर इस प्रकार शुद्ध किये गये कर्मों के बारे में कहा गया - योगस्थ कुरु कर्माणि, अर्थात् अपने कर्मों को योगस्थ कर दो। कर्मों को योगस्थ कैसे किया जाता है? शान्ति पाठ के समय कहा जाता है - ऊं सह नौ भवतु, सह नौ भुनक्तु, सह वीर्यं करवावहै ...। अर्थात् मस्तिष्क तथा शरीर दोनों का तालमेल और सह अस्तित्व बना रहे, दोनों एक साथ आनंद का लाभ उठायें, और दोनों उसे प्राप्त करने के लिए एक साथ तालमेल से कर्म में प्रवृत्त हों। मस्तिष्क तथा शरीर का योग यही है जो अलग-अलग होते हुए भी मानव शरीर के रुप में एक हैं। उन लोगों का बुरा हाल देखिये जिनके शरीर और मस्तिष्क योगस्थ नहीं हैं। शरीर की दिशा अलग और मन की दिशा अलग होने की पीड़ा से कौन रू-ब-रू नहीं हुआ है। दोनों का योगस्थ होना आवश्यक है। उसी प्रकार हमारे कर्मों का समाज के साथ योगस्थ होना आवश्यक है। क्योंकि सभी एक हैं, जिनमें वही एकमात्र जीवब्रह्म का वास है। इसलिए किसी के छोटा या बड़ा होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। इसलिए, जाति, धर्म या किसी भी अन्य प्रकार से किया जाने वाला भेदभाव का कोई अर्थ ही नहीं है। स्वामी विवेकानंद ने भेदभाव पर दिये गये अपने प्रवचन में इसे स्पष्ट किया था। यह समझ लेना चाहिए कि सारे कर्म योगस्थ कर दिये जायें ताकि पर्यावरण, पारिस्थितिकी, या समाज के साथ टकराव नहीं बल्कि तालमेल बना रहे। इसी में सुख है क्योंकि जो कुछ है वह अद्वैत ही तो है।

स्वामी जी जब कर्म पर जोर देते हैं जो हमेशा यही प्रतिध्वनित होता है कि कर्म ही यज्ञ है, वही कर्म यज्ञ है और वही यज्ञ कर्म। गीता में भी स्पष्ट कहा गया है - यज्ञकर्म समुद्भवम्। अर्थात् यज्ञ कर्म से उत्पन्न होते हैं। जिसे इसका ज्ञान है, वही ज्ञानी है। वह यदि डाक्टरी पढ़ता है तो इसलिए नहीं कि वह अत्यधिक धन कमाये, बल्कि इसलिए कि बीमार लोगों की सर्वोत्तम सेवा कर सके। इस तरह वह एक ही साथ अपने कर्म का फल भी पाता है, धन भी और यज्ञ का फल भी। उसकी पढ़ाई ही उसके लिए यज्ञ बन जाता है। परन्तु जो केवल धन के लिए पढ़ता है उसे यज्ञ का फल प्राप्त नहीं होता। इसलिए कर्मों को यज्ञ की तरह करने के दोहरे लाभ होते हैं, तथा धन तो कर्म का ही सह-उत्पाद है।

सभी ओर इस बात के प्रमाण बिखरे पड़े हैं कि इस संसार में कर्म का फल अवश्य ही मिलता है। जैसे हम खाना खाते हैं तो पेट अवश्य ही भरता है। जो व्यक्ति पेट भरने की चिंता में डूबा रहता है उसे खाने का आनन्द भी नहीं मिलता। फल तो सुनिश्चित है। पेट भरेगा ही। आप खाना तो खा लें। अर्थात् फल की चिंता में डूबकर कर्म में केन्द्रित ध्यान को अन्यत्र लगाने से तो भटकाव ही होगा। इसलिए युवा शत-प्रतिशत ध्यान अपने कर्म पर ही लगाये। वाह्य वस्तुओं और व्यक्तियों के आकर्षण या बहकावे में भटकें नहीं।

पर पीड़ा से सुख प्राप्त नहीं करने तथा कर्मों को ज्ञान की अग्नि में तपाकर उन्हें योगस्थ करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है - स्वयं के लिए भी और जिसे आप अन्य समझते हों उनके लिए भी। परन्तु ध्यान स्वामी जी के अद्वैत पर ध्यान रखें - यहां कुछ भी अन्य या दो नहीं हैं। सब एक हैं, सब अद्वैत है।