इस प्रथम पड़ाव के समय ही भारतीय अध्ययनदृष्टि का प्रश्न सर्वप्रथम माता-पिता के समक्ष उपस्थित होता है। आज भारतीय माता-पिताओं में से अधिकांश की अध्ययनदृष्टि वह नहीं है जिसे हम भारतीय अध्ययनदृष्टि के रुप में केवल अनुष्ठानों के रुप में ही मंत्रों के भीतर छुपाकर तथा संभालकर रखते आ रहे हैं, परन्तु उन्हें स्पष्ट रुप से नहीं जान पाते क्योंकि 'मंत्रों' को ही रहस्यमय समझकर केवल उन्हें बड़बड़ाने का काम ही किया जाता है।

वाल्मीकि रचित रामायण में स्पष्ट रुप से एक स्थान पर मंत्रणा से मंत्र और मंत्री की उत्पत्ति का संकेत किया गया है। अर्थात् मंत्री वह है जो मंत्रणा देता है, तथा जो कथ्य या सलाह है वही मंत्र है। संभवत: पारम्परिक लोक भाषा में व्यवहृत मुहावरा 'गुरु मंत्र' का प्रयोग सभी ने सुना होगा। एक व्यक्ति दूसरे से अनुरोध करता है कि मुझे भी कुछ गुरु मंत्र दे दें जिससे कि मेरा कल्याण हो जाये। स्पष्ट रुप से मंत्र कुछ महत्वपूर्ण कथ्य या सलाह हैं जिन्हें जीवन में लागू कर व्यक्ति अपना कल्याण कर सकता है।

भारतीय अध्ययन की अन्तर्दृष्टि इन्हीं मंत्रों और शब्दों में सुरक्षित हैं जिनके प्रति हमारे अज्ञानी रह जाने के कारण हमें यह दुर्दशा देखनी और झेलनी पड़ रही है।

भारतीय अध्ययनदृष्टि को उपनयन संस्कार से समझना प्रारम्भ करना चाहिए। उपनयन का अर्थ है समीप ले जाना। किसके समीप ले जाना? गुरु के। क्यों ले जाना? दूसरे जन्म के लिए।

पहला जन्म माता-पिता देते हैं। शरीर का अस्तित्व केवल पार्थिव है तब तक जब तक कि ज्ञान प्राप्ति के माध्यम से उसका दूसरा जन्म नहीं हो जाता। दूसरे जन्म के साथ ही व्यक्ति अपने पार्थिव अस्तित्व , अर्थात् ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों की दासता से मुक्त हो जाता है। अर्थात् वह अब पार्थिव मात्र नहीं है। उसका दूसरा जन्म हो गया। वह अब बुद्धि तथा विवेक से अपने सभी कार्य करने की क्षमता प्राप्त कर चुका, तथा इन्द्रियों की दासता से मुक्त हो गया। भारतीय अध्ययनदृष्टि का यही लक्ष्य है। आपके अध्ययन के विषय ज्ञान-विज्ञान जो भी हों, परन्तु लक्ष्य केवल यही है। व्यक्ति बुद्धि तथा विवेक से कार्य करने की क्षमता प्राप्त करे तथा स्वयं अपना नाश न करे। इसके बाद इसी लक्ष्य से अनेक शाखाएं तथा प्रशाखाएं निकलती चली जाती हैं।

भारत के स्वतंत्र होने तक देश में गुरुकुल चलते रहे हैं जिनमें से अनेक का राष्ट्रीयकरण स्वतंत्र भारत में हुआ। उस समय तक की परम्परा थी कि जब माता-पिता अपनी संतानें शिष्य के रुप में गुरु के समर्पित करते थे तब गुरु संकल्प लेकर बालक से एक मंत्र कहा कहते थे जिसका अर्थ है -

मैं तेरे हृदय को अपने हृदय में लेता हूं, तेरे चित्त को अपने चित्त में लेता हूं, मेरे वचन से एकमना हो जाओ, मैं तुम्हारी शिक्षा का भार ग्रहण करता हूं।

यह है बालक को दोबारा जन्म देने का गुरु का संकल्प।

पुन: आचार्य शिष्य को इस तरह सम्भालकर रखता है जैसे मां अपने गर्भ में अपने शिशु को संभालकर रखती है। इसी कारण शिष्य को अन्तेवासी भी कहा गया, न कि गुरुकुल परिसर में रहने के कारण।

यदि शिक्षाक्षेत्र की पुनर्संरचना करनी हो तो शिक्षकों को इसी भाव से आचरण करना अनिवार्य होगा। उन्हें अपने शिष्यों की जिम्मेदारी लेनी होगी वह भी स्वयं। आज दोषारोपण का सिलसिला चल पड़ा है तथा शिक्षक माता-पिता पर बोझ डालते रहते हैं तथा उनपर दोषारोपण से भी बाज नहीं आते। आज के शिक्षकों को एक मूलभूत बात समझ में नहीं आती कि कोई भी माता-पिता अपनी संतानों को उनके पास इसलिए भेजता है क्योंकि वे अब उसे स्वयं ज्ञान देकर दूसरा जन्म नहीं दे सकते। यह काम तो शिक्षक को ही करना है।

आज के शिक्षक अपने शिष्यों को केवल वही ज्ञान देते हैं जो पाठ्यक्रमों में लिखा होता है। पाठ्यक्रमों पर विवाद और उसे बनाये जाने के पीछे की मंशा चर्चा के अलग विषय हैं। परन्तु भारतीय अध्ययनदृष्टि में यज्ञोपवीत के तीन सूत्र तीन उद्देश्यों की ओर हमेशा ध्यान रखने के लिए पहनाये जाता थे।
पहला सूत्र इस बात को याद दिलाता है कि उसपर ऋषि ऋण है। ऋषि वे थे जिन्होंने सामाज के कल्याण के लिए नि:स्वार्थ भाव से चिंतन तथा अध्ययन किया एवं अपने ज्ञान से ज्ञान के एकत्रित भंडार में योगदान किया। आज हमारे मुख पर जो भी मुस्कान है वह इन्हीं के ज्ञान के कारण संभव हो सका है। इसलिए उन ऋषियों-मनीषियों का ऋण व्यक्ति पर है तथा उससे मुक्ति तभी मिलेगी जब व्यक्ति उनके ही तरह कठिन परिश्रम कर ज्ञानार्जन करे और उसे नि:स्वार्थ भाव से लोगों के कल्याण में लगावे। वह अभियंता, वैज्ञानिक, अधिवक्ता, चिकित्सक, शिक्षक आदि सभी का जीवन निरर्थक हो यदि उन्होंने अपने ज्ञान को लोगों के कल्याण में नहीं लगाया। वह तो ऋषि ऋण में ही जन्म लेता है और ऋणी रहकर ही मर जाता है। ऐसे व्यक्ति का जीवन निष्फल है।
दूसरा सूत्र पितृ ऋण का है, अर्थात् पूर्वजों के ऋण का, जिन्होंने अपने कर्म से हमारा कल्याण किया है और जिनके कारण हमारा अस्तित्व बना है और जो भी खुशी हमारे चेहरों पर है, वह उन्हीं के कारण है। यह ऋण धर्मपूर्वक गृहस्थाश्रम में रहकर समाप्त किया जाता है। सारे संसार का पालन पोषण ये गृहस्थ ही करते हैं, यहां तक कि ये ही साधु-संतों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, विद्याध्यन करने वाले छात्रों, रोगियों के लिए अस्पतालों, धर्मशालाओं और न जानें कितने कार्य करते हुए इस सामाजिक व्यवस्था को रहने लायक बनाने के लिए अनवरत यत्न करते रहते हैं। यदि गृहस्थ न रहें तो शायद ही हमारा अस्तित्व बच पायेगा। अपने अस्तित्व, पहले जन्म और दूसरे जन्म, दोनों के लिए ही नहीं बल्कि अनेकानेक प्रकार से हम अपने पूर्वजों के ऋणी हैं। इससे मुक्ति तभी संभव है जब हम नि:स्वार्थ भाव से सबको कल्याण के लिए धर्मपूर्वक काम करते हैं।
तीसरा सूत्र देव ऋण का है। हम विश्वे देवा की भी अर्चना करते हैं तथा अन्य देवों की भी जिनके कारण हमारा अस्तित्व बचा है और जो भी प्रसन्नता आज हमें प्राप्त है, उनके कारण ही है। ये विश्व के देवता कौन है? वे जो उन कार्यों को करते हैं जिनके कारण दूसरों का अस्तित्व बना रहता है। अर्थात् दूसरों के जीवन की निरन्तरता को कायम रखने के लिए काम करने वाले लोग विश्व के देवता हैं। सर्वशक्तिमान् सर्वव्यापी ईश्वर के भी हम ऋणी हैं। ऐसे देव ऋण से मुक्ति तभी मिलती है जब हम निष्काम भाव से वैसा कार्य करें कि लोग कहें कि वह तो देवता तुल्य हैं। यही तो मानव का देवत्व है। इसे प्राप्त किये बिना इस ऋण से मुक्ति कहां।

शिक्षा के तीन उद्देश्यों को निरन्तर जनेऊ के तीन सूत्रों में याद रखा जाता है। यदि शिक्षा के ये तीन उद्देश्य नहीं हैं तो वे अभारतीय अध्ययन दृष्टि हैं।

इन उद्देश्यों को प्राप्त करने की प्रक्रिया में सबसे पहले इस शरीर पर ध्यान दिया जाता है क्योंकि यही साधन है जिससे सभी कर्म करते हुए मानव जीवन का लक्ष्य प्राप्त करना है जो मूलत: तीन उपर्युक्त सूत्र ही हैं। शिष्य के संकल्पों में सत्य पर अडिग रहना एक महत्वपूर्ण संकल्प होता है। जब तक शिक्षा समाप्त न हो जाये तब तक ब्रह्मचर्य पालन का संकल्प दूसरा सबसे महत्वपूर्ण संकल्प है ताकि सम्पूर्ण ध्यान शिक्षा पर ही लगा रहे।

संकल्प के समय ही आचार्य शिष्य की अंजलि में तीन बार जल डालते थे और शिष्य को उस जल को पृथ्वी पर बिखेरना होता था और बताया जाता था कि जो ज्ञान वह प्राप्त करे उसे सम्पूर्ण पृथ्वी में फैलाये। पुन: शिष्य को सूर्य दर्शन कराकर मंत्रों में बताया जाता था कि वह सूर्य की तरह हो तथा उसका जीवन उन्हीं के भांति अचूक नियमों से निर्धारित हो तथा निरन्तरता बनी रहे।

उसके बाद गुरु शिष्य को माता-पिता से लेकर अपने अधीन कर लेता है, वह भी उसके कल्याण की पूरी जिम्मेदारी के साथ।

क्या हम भारतीय शिक्षाक्षेत्र की पुनर्संरचना इसी भाव के साथ, सभी बालक-बालिकाओं के लिए एक समान भावना रखते हुए कर सकते हैं। अलग-अलग परिवारों से आये शिष्यों के प्रति आचार्यों की नयी व्यवस्था के भेदभाव क्या प्रारम्भिक शिक्षा स्तर से ही समाप्त किये जा सकते हैं? संभव है - यदि इच्छाशक्ति हो तो।