इस दर्ज को पाने के लिए भारत पिछले बहुत समय से प्रयास कर रहा था। अब जब वह यह दर्जा पा चुका है, तो वह अपनी मानवशक्ति और अपने अनुभवों का इस्तेमाल कर इस इलाके में प्राकृतिक संसाधनों की खोज में शामिल हो जाना चाहता है। भारत के पास ध्रुवीय इलाके में शोध की वैज्ञानिक क्षमता उपलब्ध है। इस क्षमता का वह यहां इस्तेमाल करना चाहेगा।
भारतीय विशेषज्ञ मध्यावधि और दीर्घावधि कार्यनीति बना रहे हैं। हाइड्रोकार्बन की खोज पर भारत विशेष तौर पर अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहता है। पहले से पांच देश इस इलाके में इस तरह की खोज पर काम कर रहे हैं। वे हैं- अमेरिका, रूस, कनाडा, नाॅर्वे और डेनमार्क।
सूत्रों के अनुसार भारत को लगता है कि सहयोग और सहभागिता के लिए रूस सबसे ज्यादा उपयुक्त देश है। पर उसके साथ सहयोग करने के लिए उसे राजनैतिक स्तर पर ठोस निर्णय लेने होंगे। वह निर्णय रूस के उस दावे का समर्थन करने का होगा, जिसके तहत रूस मानता है कि लोमोनोसोव रिज और मेंदेलीव रिज उसकी संप्रभुता के दायरे में आता है। रूस को समथ्रन करने के बाद भारत उस इलाके में अपनी पहुंच बनाने में कामयाब हो जाएगा और वह उत्तरी सागर के रास्ते का भी इस्तेमाल करने के योग्य हो जाएगा।
आर्कटिक सागर की बर्फ तेजी से पिघल रही है। इसके पिघलने के साथ ही दुनिया के अनेक देशों की दिलचस्पी इस इलाके के प्राकृतिक संसाधनों की खोज में बढ़ गई है। हालांकि भारत का वहां एक शोध स्टेशन पिछले 2008 से ही है, लेकिन चीन हमसे बहुत आगे निकल चुका है। उसका एक जहाज उस इलाके में पहुंच गया है। सच तो यह है कि अपना जहाज भेजने वाला पहला एशियाई देश चीन बन गया है। अब उसकी नजर छोटे रास्ते पर है।
भारतीय विशेषज्ञों का कहना है कि आर्कटिक ऊर्जा के संभावित स्रोतो का एक महत्वपूर्ण हब साबित होने वाला है। रूस आकर्टिक परिषद का सदस्य हे और वह वहां पहले से ही अनेक प्रकार के शोध कार्यों में लगा हुआ है। उसने शोध के द्वारा यह साबित किया है आर्कटिक सागर का एक हिस्सा उसका ही विस्तार है। उसने अनेक प्रकार के डेटा प्राप्त किए हैं और अपनी सीमा को पारिभाषित करने की कोशिश में लगा हुआ है। उसके वैज्ञानिकों ने पत्थरों के 22 हजार सैंपल इकट्ठा किए हैं।
रूस ने संयुक्त राष्ट्र संघ में आवेदन कर रखा है और इस आवेदन में उसने मांग की है कि लोमोनोव शेल्फ को उसके हिस्से के रूप मंे मान्यता प्रदान कर दी जाए। संयुक्त राष्ट्र संघ में रूस इस मसले पर भारत का सहयोग चाहता है। भारत यदि रूस की सहायता करता है, तो वह बहुत फायदे में रहेगा। पहली बात तो यह है कि भारत और रूस के बीच पहले से ही दोस्ती रही है और एक समय दोनों के बीच गहरा तालमेल हुआ करता था। यदि इस मसले पर भारत रूस का साथ दे देता है तो उसे रूस अपना रास्ता दे देगा और इस तरह चीन पे आर्कटिक महासागर में भारत से जो बढ़त ले रखी है, उसकी भरपाई भी वह कर पाएगा।(संवाद)
आर्कटिक महासागर में शोध कार्य की ओर बढ़ रहा है भारत
रूस के साथ इसके लिए हो सकता है सहयोग
नित्य चक्रबर्ती - 2013-06-15 15:15
नई दिल्ली: आर्कटिक परिषद की पिछले 15 मई को एक बैठक हुई। उस बैठक में भारत को उस परिषद में ऑब्जर्वर का दर्जा मिला। यह दर्जा प्राप्त कर भारत आर्कटिक महासागर में शोध और संधान की दिशा में कदम उठाने को तत्पर हो गया है। भारत के साथ साथ चीन, इटली, जापान, दक्षिण अफ्रीका और सिंगापुर को भी इस परिषद ने ऑब्जर्वर का दर्जा प्रदान कर रखा है।