इसका पता तब लगा, जब राहुल गांधी ने केन्द्र सरकार को सजायाफ्ता सांसदों और विधायकों को बचाने वाले अध्यादेश को वापस लेने के लिए बाध्य कर दिया। इसके लिए उन्होंने आक्रामक रूप से इस मामले में दखलंदाजी की और उसके बाद तो चुनावी युद्ध का परिदृश्य ही बदल सा गया है। लगता है कि जब यह अध्यादेश लाया गया, तो राहुल गांधी को लगा कि अब पीछे रहने से काम नहीं चलेगा, बल्कि सामने आकर ही चुनौतियों का सामना करना होगा और उन्होने वैसा ही किया।

हो सकता है कि नरेन्द्र मोदी की ताबड़तोड़ आक्रामक चुनाव प्रचार ने राहुल को वैसा करने के लिए बाध्य कर दिया। शायद उन्हें लगा कि कांग्रेस नरेन्द्र मोदी के लिए मैदान खुला छोड़ रही है और उनकी भाषा में उन्हें जवाब नहीं मिल रहा है। कांग्रेस के पास कोई ऐसा व्यक्तित्व भी नहीं दिखाई पड़ रहा था, जो मोदी के आक्रमणों का सामना करे और उन्हें उन्हीं की भाषा मे जवाब दे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बहुत ही कोमल भाषा का इस्तेमाल अपने भाषणों में करते हैं। वे मोदी की भाषा का मुकाबला कर ही नहीं सकते। सोनिया गांधी लिखा हुआ भाषण पढ़ती हैं। लिखे हुए को पढ़कर भी मोदी का मुकाबला नहीं किया जा सकता। वैसी हालत में कांग्रेस के पास राहुल गांधी के अलावा और कोई दूसरा ऐसा है ही नहीं, जो मोदी का सामना कर सके।

राहुल गांधी के पास उनकी भाषा है। हिंदी पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे धाराप्रवाह बोल सकते हैं। उन्हें लिखकर पढ़ने की भी जरूरत नहीं। भाषा के मुहावरे को भी वे समझते हैं और उनका सटीक इस्तेमाल करना जानते हैं। लोगों को लोगों की भाषा में ही संबोधित करने का उनका अपना अनुभव बहुत समृद्ध हो गया है। वे अपने भाषणों के दौरान शब्दों के साथ खेल सकते हैं। जाहिर है, उन्हें लगा कि वे ही नरेन्द्र मोदी को चुनौती दे सकते हैं और बिना कांग्रेस द्वारा घोषणा किए जाने के उन्होंनंे लोकसभा चुनाव को मोदी बनाम राहुल बना दिया है।

हालांकि अभी भी राहुल गांधी कभी कभी बहक जाते हैं। ऐसा उन्होंने उस समय किया था, जब उन्होंने कहा था कि गरीबी एक मन की दशा है। वे उस समय भी बहक गए से लगते थे कि जब वे कह रहे थे कि दलितों को अपनी स्थिति से उबरने के लिए जुपिटर ग्रह यानी बृहस्पति ग्रह की पलायन गति पानेी पड़ती है।

हालांकि उन दोनों मामलों में राहुल की खिल्ली उड़ी, लेकिन उससे यह तो जाहिर हो गया कि वे देश की समस्याओं के साथ जूझने का प्रयास कर रहे हैं। अध्यादेश के खिलाफ बोलते हुए जिस भाषा का उन्होंने इस्तेमाल किया, भद्रजन उसे भी सही नहीं मानमे हैं, लेकिन आम आदमी शायद उस तरह की आक्रामकता को पसंद करता है। हालांकि बाद में खुद राहुल ने उस तरह की भाषा के इस्तेमाल के लिए प्रधानमंत्री के सामने सफाई पेश की, लेकिन उन्होंने इसके साथ यह भी स्पष्ट कर दिया कि जो अक्षम्य है, उसकी रक्षा नहीं कर सकते।

बहुत संभव है कि राहुल उसी तरह के कुछ और कठोर बयान जारी करें। पार्टियों को सूचना के अधिकार कानून से बाहर करने वाला एक विधेयक संसद के सामने विचाराधीन है। यदि उस मसले पर भी राहुल ने आक्रामक रुख अपनाया, तो उनकी लोगों के बीच विश्वसनीयता और भी बढ़ेगी। हो सकता है कि उनकी इस बात के लिए आलोचना हो कि देश के ज्वलंत मुद्दों पर 10 सालों तक चुप्पी लगाए रखने के बाद वे बोलने लगे हैं, लेकिन फिर भी यह तो कहा ही जा सकता है कि देर आयद दुरुस्त आयद। ऐसा करके वे नरेन्द्र मोदी के हाथ से चुनाव अभियान की पहल को छीन सकते हैं।

नरेन्द्र मोदी कांग्रेस पर भ्रष्टाचार और वंशवाद के आरोप लगा रहे हैं। कांग्रेस के पास उनके इस आरोपों की काट नहीं दिखाई पड़ती। ऐसी हालत में राहुल गांधी का भ्रष्टाचार के खिलाफ दिखाई गई आक्रामकता मोदी की आक्रामकता को कुंद कर सकती है। ऐसा होने के बाद मोदी और भाजपा को अपनी रणनीति बदलने के लिए बाध्य होना पड़ सकता है।(संवाद)