इंटक के नियंत्रण वाले ब्रह्मोस स्टाफ एसोसिएशन और ऐटक के नियंत्रण वाले ब्रह्मोस कर्मचारी संघ ने एक याचिका दायर के केरल सरकार के उस निर्णय को हाई कोर्ट में चुनौती दे रखी थी। याचिका में कहा गया था कि 2010 को जारी किया गया राज्य सरकार का वह आदेश अवैध था।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि सिर्फ सरकारी कंपनियों को ही ट्रेड यूनियन एक्ट के दायरे से बाहर रखा जा सकता है और कानून के अनुसार उसी कंपनी को सरकारी कंपनी कहा जा सकता है, जिसमें सरकार का शेयर 51 फीसदी या उससे ज्यादा हो।

बाल्ट एक संयुक्त उपक्रम है और इसमें भारत सरकार के साथ साथ रूस की सरकार की भी भागीदारी है। इसमें भारत की केन्द्रीय सरकार का साढ़े 50 फीसदी शेयर है, जो 51 फीसदी से कम है। यही कारण है कि यह ट्रेड यूनियन एक्ट के तहत सरकारी कंपनी की परिभाषा में नहीं आता है।

दूसरी तरफ केन्द्र सरकार का कहना था कि श्रमिक संगठनों ने 2007 में हुई एक सहमति में यह प्रतिबद्धता जाहिर की थी कि वे ट्रेड यूनियन की गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे। उन्होंने एक मजदूर कल्याण समिति का भी गठन किया था, जिसके तहत उनकी मांगों को हल किया जाना था।

राज्य सरकार का कहना था कि यदि बाल्ट जैसे फर्म में मजदूर संगठनों की गतिविधियों को चलाने की इजाजत दी गई, तो इसे देश की रक्षा तैयारियां प्रभावित होंगी, जो देश हित में नहीं है।

इसके बाद ही मजदूर संगठनों को अदालत की शरण में जाना पड़ा। वहां उन्होंने सरकार के उस आदेश की वैधानिकता को ही चुनौती दे डाली। बाल्ट और केरल हाइटेक इंडस्ट्रीज लिमिटेड के कर्मचारियों के बीच 2007 में हुए समझौते भी कानून की दृष्टि में खरे नहीं उतरे, क्योंकि उसका समय दिसंबर 2012 में ही समाप्त हो गया था। ऐसा मजदूर संगठनों का मानना था।

मजदूर संगठनों के अनुसार यदि यह मान भी लिया जाय कि वह सहमति अभी भी जिंदा है, तब भी वह मजदूर संगठन गतिविधियों को रोक नहीं सकती, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का एक आदेश है कि कोई मजदूर कल्याण कमिटी ट्रेड यूनियन का स्थान नहीं ले सकती।

अदालत के आदेश की सराहना करते हुए केरल ऐटक के महासचिव कनम राजेन्द्रन ने कहा कि इस आदेश ने ऐटक के दावे को सही साबित किया है कि कोई भी निजी कंपनी रजिस्टेªशन आॅफ ट्रेड यूनियन एक्ट के दायरे से बाहर नहीं मानी जा सकती।

हाई कोर्ट के फैसले के बाद अब गंेद राज्य सरकार के पाले में है। कोर्ट ने उसे आदेश दिया है कि ट्रेड यूनियन गतिविधियों को चलाने के लिए राज्य सरकार सही निर्णय लागू करे और उससे संबंधित आदेश जारी करे। राज्य सरकार के श्रम मंत्री ने तेजी से कदम आगे भी बढ़ाए हैं। अब चूंकि हाई कोर्ट का आदेश आ गया है, इसलिए राज्य सरकार उसे मानने के लिए बाघ्य है। इस तरह की घोषणा राज्य के श्रम मंत्री शिबू जाॅन ने की। (संवाद)