सवाल उठता है कि उड़ीसा में हम सफल और मध्यप्रदेश मंे विफल क्यों रहे? हमने वैसा उड़ीसा में क्या कर दिया, जो हम मध्यप्रदेश में नहीं कर पाए। उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान करीब 10 सालों से अपने अपने राज्यों में मुख्यमंत्री हैं। दोनों की सरकारें स्थिर हैं और दोनों को ही सफल मुख्यमंत्री माना जाता है। दोनों की प्रशासनिक कुशलता के बारे में किसी को संदेह नहीं है। फिर भी दोनों राज्यों में अलग अलग नतीजे देखने को क्यों मिले?

किसी को सिर्फ एक सफलता के उदाहरण से खुश नहीं हो जाना चाहिए, लेकिन फिर भी इतना तो हम कह ही सकते हैं कि हम प्रकृति के प्रकोप से अपने आपको बचाना सीख रहे हैं। भारत में एक से बढ़कर एक प्राकृतिक विपदाएं आई हैं। 1977 में आंध्र प्रदेश में एक बहुत बड़ा समुद्री तूफान आया था। तमिलनाडु में सुनामी आया था। 1999 में उड़ीसा में सुपर तूफान आया था। 2001 में गुजरात में एक भयंकर भूकंप आया था। मानसून की शुरुआत में इसी साल उत्तराखंड में भी भारी आपदा आई थीं, जिनमें हजारों लोग मारे गए और लाखों लोग उजड़ गए। उत्तराखंड प्रशासन तो उस आपदा के लिए तैयार भी नहीं थी।

उत्तराखंड में प्रशासन की कमजोरी की जमकर खिंचाई हुई। उससे सबक लेकर इस बार समुद्री तूफान का सामना करने के लिए समय रहते ही तैयारी पूरी कर ली गई थी। इस तूफान का पता समय से पहले ही लग गया था। इसके कारण ही समय से पहले तैयारी करने के लिए समय भी मिल गया था। इसके कारण नुकसान को न्यूनतम करने में सफलता प्राप्त हुई।

इस बार उड़ीसा ने यह साबित कर दिया कि प्राकृतिक आपदा का सामना करना कठिन नहीं है, यदि केन्द्र, राज्य व संबंधित एजेंसियों के बीच सही तालमेल बना रहे और इसके साथ राजनैतिक संकल्पशक्ति भी मजबूत बनी रहे। उड़ीसा और आंध्र प्रदेश की सरकारों को तीन दिन पहले ही पता चल गया था कि एक भारी तूफान उनके राज्य की ओर बढ़ रहा है।

इसलिए दोनों राज्यों ने तेजी से कदम उठाने शुरू किए और केन्द्र सरकार ने भी अपनी तरफ से पूरा योगदान किया। 5 लाख से भी ज्यादा लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिया गया। 2014 के चुनाव भी सफलता का एक कारण था। नवीन पटनायक प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखते हैं, इसलिए उन्होंने अपनी प्रशासनिक सफलता को साबित करना अपनी प्रतिष्ठा का विषय बना दिया। कांग्रेस उन्हें खुश रखना चाहती है, ताकि लोकसभा चुनाव के बाद वह उसे केन्द्र में सरकार बनाने में मदद कर सके। यही कारण है कि केन्द्र सरकार ने अपनी तरफ से हर प्रकार की मदद उड़ीसा और उसकी सरकार को दी।

दूसरी तरफ मध्यप्रदेश का कुछ और ही हाल है। कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार मध्यप्रदेश सरकार को उस आपदा के लिए जिम्मेदार बता रही है और तूफान से लोगों को बचाने का श्रेय खुद ले रही है। इसमें कोई शक नहीं कि केन्द्र सरकार ने वह सब कुछ किया जो तूफान के खराब प्रभाव को न्यूनतम करने के लिए वह कर सकती थी।

पर मध्य प्रदेश के दतिया की घटना ने उड़ीसा की सफलता पर उत्सव मनाने से हमें रोक दिया। इसने साबित कर दिया कि आपदा प्रबंधन के मामले में हमें अभी बहुत गुर सीखने हैं। जब आपदा हमें बताकर नहीं आए, तो हम अपने आपको किस कदर असमर्थ और लाचार महसूस करते हैं इसका अहसास हमें दतिया ने करा दिया है। (संवाद)