सबसे बड़ी सभाएं आयोजित करने के बावजूद जनता दल को सीटें कम मिल पाईं, तो उसका एक कारण यह था कि सभा में जो लोग अपनी भारी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे, उनमें से अधिकांश लोगों के नाम मतदाता सूचियों मंे था ही नहीं। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपने प्रधानमंत्रित्वकाल में दिल्ली की अवैध कालोनियों में रहने वाले लोगों के लिए राशन कार्ड, बिजली और पानी की सुविधा का प्रब्रध करवा दिया था। उनके राशन कार्ड तो बने थे, लेकिन मतदाता सूची में अधिकांश लोगो ंके नाम उस समय तक नहीं चढ़े थे। जाहिर है, मुकाबला त्रिकोणात्मक नहीं हो सका और जनता दल की भूमिका कांग्रेस को हराने तक सीमित रह गई, क्योंकि उसे जो मत प्राप्त हुए थे, उनमें से अधिकांश कांग्रेस के परंपरागत मत थे।

इस बार स्थिति अलग है। इस बार मुकाबले की त्रिकोणात्मक बनाने की कोशिश में आम आदमी पार्टी ( आप) के नेता अरविंद केजरीवाल हैं। अन्ना के नेतृत्व मे देश भर में हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की उपज है यह पार्टी। दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप अपनी ताकत देखने और दिखाने जा रही है। पार्टी के गठन के बाद राजनैतिक हलकों में इस गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था। कंाग्रेस और भाजपा दोनों पार्टियां मान रही थी कि केजरीवाल की पार्टी भाजपा का उसी तरह से नुकसान करेगी, जिस तरह से जनता दल ने 1993 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का नुकसान किया था। जनता दल के साथ मुस्लिम और दलित जुड़े थे, इसलिए कांग्रेस उस समय हारी और केजरीवाल के साथ शहरी मध्यवर्ग का कांग्रेस विरोधी तबका जुड़ेगा, जो अन्यथा भाजपा के साथ जाता, इसलिए नुकसान भाजपा को माना जा रहा था।

यही कारण है कि भाजपा आप को अपने लिए कांग्रेस से भी बड़ा खतरा मान रही थी। दूसरी तरफ कांग्रेस के नेता खुश थे कि उसके खिलाफ हुए आंदोलनों के बावजूद, आंदोलन स ेउपजी एक पार्टी ही उसकी जीत का कारण बनेगी। लेकिन जैसे जैसे समय नजदीक आता जा रहा है, केजरीवाल की स्थिति मजबूत होती जा रही है। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों के नतीजों पर यदि नजर दौड़ाई जाए, तो साफ लगता है कि केजरीवाल लगातार बढ़त प्राप्त कर रहे हैं। निजी लोकप्रियता में वे भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष विजय गोयल को तो पहले से ही पीछे छोड़े हुए हैं, अब तो उन्होंने दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को भी पछाड़ दिया है। एक न्यूज चैनल के लिए नील्सन द्वारा किए गए एक सर्वे में पाया गया कि दिल्ली के 32 फीसदी लोगों की मुख्यमंत्री के रूप में पहली पसंद अरविंद केजरीवाल हैं, जबकि शीला दीक्षित 28 फीसदी के साथ दूसरे और विजय गोयल 24 फीसदी के साथ तीसरे स्थान पर हैं। सीटों केी संख्या के लिहाज से आम आदमी पार्टी को 18 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर पाया गया, जबकि 22 के साथ भाजपा दूसरे स्थान पर और 28 के साथ कांग्रेस पहले स्थान पर।

टरविंद केजरीवाल की पार्टी ने खुद भी एक सर्वे करवाया, जिसके नतीजों के अनुसार आप को 32 फीसदी वोट मिलने वाले हैं और 70 में 33 सीटें उसी के खाते में आएंगी। गौरतलब है कि नील्सन ने माना था कि दिल्ली के 32 फीसदी लोग केजरीवाल को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं, जबकि उतने लोग उनकी पार्टी को मत देने वाले नहीं हैं, जबकि आप का सर्वे के अनुसान 32 फीसदी लोग उसे मत भी देंगे। त्रिकोणात्मक मुकाबले में 32 फीसदी के साथ कोई भी पार्टी बहुमत के आंकड़े को छू लेती है। ऐसा कई बार कई राज्यों में हो चुका है। दिल्ली भी इसका अपवाद नहीं हो सकती।

तो क्या यह माना जाय कि दिल्ली में अगले मुख्यमंत्री केजरीवाल होंगे? ऐसा कहना बहुत कठिन है। इसका एक कारण तो यही है कि केजरीवाल ने घोषणा कर रखी है कि वे वहीं से चुनाव लड़ेंगे, जहां से शीला दीक्षित खड़ीं होंगी। भारतीय जनता पार्टी की आंखों में भी केजरीवाल कांटा बने हुए हैं। जाहिर है, वह भी वहां उन्हें हराने की कोशिश करेगी और वैसा करने के लिए उसके समर्थक शीला दीक्षित के पक्ष में भी मतदान कर सकते हैं। चुनावों के दौरान इस तरह की बातें होती ही रहती हैं।

दूसरी बात यह है केजरीवाल की पार्टी पहली बार चुनाव लड़ रही है और उसके लगभग सभी उम्मीदवार भी पहली बार की चुनाव लड़ रहे हैं। इसलिए समर्थन को वोट में तब्दील करना आसान काम नहीं होगा। चुनावी दांवपेंच और मतदान की पूर्व संध्या को होने वाली घटनाएं मतदान की प्रवृति को भी बदलने की क्षमता रखती है और इस मामले में पहली बार चुनाव लड़ने वाले लोग अपने आपको कमजोर पाते हैं।

केजरीवाल की पार्टी को कितनी सीटें मिलेंगी, इसके बारे में तो फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन इतना तय है कि पहली बार दिल्ली में तितरफा मुकाबला होने जा रहा है और शायद पहली बार दिल्ली विधानसभा त्रिशंकु हो जाय। ऐसी स्थिति में आप की सहायता के बिना न तो भाजपा सरकार बना सकती है और न ही कांग्रेस। यदि आप सरकार बनाना चाहे, तो उसे भी इन दोनों में से किसी एक का समर्थन लेना होगा। आप आंदोलन से निकली पार्टी है, इसलिए वह आंदोलन की मांगों को शर्त के रूप में रखकर और मनवाकर ही कांग्रेस या भाजपा से गठबंधन कर सकती है। और यदि कोई बात नहीं बनी, तो दिल्ली विधानसभा का एक बार फिर चुनाव करवाया जा सकता है। ऐसा बिहार में एक बार हो चुका है। फरवरी 2005 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद त्रिशंकु विधानसभा के कारण किसी की सरकार नहीं बन पाई और उसी साल नवंबर महीने में दुबारा विधानसभा के चुनाव करवाने पड़े थे। सवाल उठता है कि क्या दिल्ली में भी कुछ वैसा ही होगा? (संवाद)