आगामी विधानसभा के आम चुनावों और 2014 के लोकसभा चुनावों में टिकट पाने के लिए राजनीतिज्ञों के 28 बच्चे एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। ये बच्चे पहली बार चुनाव लड़ना चाह रहे हैं। इन लोगों में दिग्विजय सिंह का बेटा जयवर्धन, अशोक गहलौत के पुत्र वैभव, ओमन चांडी के पुत्र चांडी ओमन, चन्द्रबाबू नायडू के पुत्र नरा लोकेश, तरुण गोगोई के पुत्र गौरव और अमित जोगी के पुत्र अमित शामिल हैं। भाजपा के अध्यक्ष राजनाथ सिंह के पुत्र पंकज भी लोकसभा चुनाव लड़ने की जुगत में लगे हुए हैं।
यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि पहले से ही लोकसभा के सदस्यों का 29 प्रतिशत राजनीतिक परिवारों से ताल्लुकात रखते हैं। ऐसा होने से राजनैतिक दलों के कार्यकत्र्ताओं की उपेक्षा हो रही है। उनकी कीमत पर परिवार के उन लोगों को टिकट दे दिए जाते हैं, जिनका पार्टी के प्रसार और प्रचार में कोई योगदान नहीं होता। यह रोग इस तेजी से फैल रहा है कि भारत का लोकतंत्र एक वंशवादी लोकतंत्र के रूप में परिणत होता जा रहा है। बदलाव के मुहाने पर खड़े भारत जैसे देश के लिए यह एक बहुत ही अशुभ संकेत है।
तर्क दिया जाता है कि जब एक डाॅक्टर का बेटा डाॅक्टर बन सकता है और एक इंजीनियर का बेटा इंजीनियर, तो फिर एक राजनेता का बेटा राजनेता क्यों नहीं बन सकता। यह तर्क बहुत की खतरनाक है। डाॅक्टर या इंजीनियर तो बेटे अपनी प्रतिभा और योग्यता के बूते बनते हैं, लेकिन टिकट तो बेटे अपने बाप या मां के बदौलत ही पा जाते हैं। उनकी योग्यता का कोई मायने ही नहीं रह जाता। इसके कारण पार्टी के उन कार्यकत्र्ताओं का नुकसान हो जाता है, जो दल से बहुत शिद्दत के साथ जुड़े हुए हैं। वंशवाद की इस राजनीति के कारण नये लोग अब राजनैतिक प्रक्रिया में शामिल होने से ही झिझकने लगे हैं। इससे तो दलीय व्यवस्था का काफी नुकसान हो रहा है। दलीय व्यवस्था का नुकसान अंततः दलीय लोकतंत्र के नुकसान के रूप में सामने आएगा। वह शायद अब आ भी रहा है।
चुनावों के लिए टिकटों का वितरण राजनैतिक पार्टियां बहुत ही मनमाने तरीके से करती हैं। उसके लिए किसी तरह का नियम या कायदा बना हुआ नहीं है। और यदि कहीं नियम कायदे बने हुए भी हैं, तो उनका पूरी तरह पालन नहीं किया जाता और पार्टी नेता की इच्छा सभी कायदों पर हावी हो जाती है। अनेक मामलों में तो पार्टी का टिकट उन लोगों के हाथों बेच भी दिया जाता है, जो उनकी ज्यादा कीमत अदा कर सकते हैं।
भारत में अंतिम समय में प्रवेश किए लोगों के टिकट मिलने के मामले बढ़ते जा रहे हैं। ठीक चुनाव के समय अनेक लोग पार्टी बदल लेते हैं। जब उन्हें लगता है कि उनका पक्ष कमजोर हो गया है, तो वे कमजोर पक्ष को छोड़कर मजबूत पक्ष की ओर चले जाते हैं। पार्टी के अंदर जिन्हें टिकट नहीं मिलता वे भी किसी दूसरी पार्टी मे ंप्रवेश कर जाते हैं या खुद की नई पार्टी बना लेते हैं। और यदि कुछ नहीं कर पाए, तो वे आजाद उम्मीदवार के रूप में ही मैदान में कूद जाते हैं।
इतना ही नहीं, एक और नई प्रवृति उभर कर सामने आ रही है। वह प्रवृति अपराधियों की बीवियों को टिकट दिए जाने की है। यदि अपराधी तकनीकी कारणों से चुनाव नहीं लड़ पाता, तो उसकी बीवी को टिकट दे दिया जाता है। अनेक बार अपराधी कानून के डर से फरार रहते हैं। इसके कारण वे अपना नामांकन नहीं करा सकते, क्योंकि तब गिरफ्तारी का खतरा हो सकता है, तो वे अपनी बीवी को चुनाव लड़वा देते हैं और पार्टियां उनकी बीवियों को टिकट भी दे देती हैं।
टिकट पाने वाले नये बेटे बेटियों में सबसे ज्यादा लोग मध्यप्रदेश में हैं। हालांकि उनमें से सभी उतने भाग्यशाली नहीं, जितने जयवद्र्धन हैं, जिनके लिए राघोगढ़ के निवर्तमान सांसद ने यह घोषणा कर दी कि अब वे अगला चुनाव नहीं लड़ेंगे। अपने खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए उक्त सांसद ने जयवद्धन के लिए मैंदान खाली कर दिया। जय की उम्र 27 साल है और वे अमेरिका के एक विश्वविद्यालय से एमबीए की पढ़ाई कर रहे थे। वे दिग्विजय सिंह के बेटे हैं।
अन्य अनेक बेटे चुनाव के लिए मूछ पर ताव दे रहे हैं। उनमें से एक हैं विक्रांत भूरिया। वे कांतिलाल भूरिया के बेटे हैं। झबुआ जिले की किसी सीट से उन्हें टिकट मिलना लगभग तय है। उनका राजनीति में मात्र दो साल का अनुभव है। कमलनाथ के बेटे नकुल भी किसी से पीछे नहीं। कांग्रेस ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी भी अनेक नेताओं के बेटे बेटियों के टिकट पाने के दावे का सामना कर रही है। सवाल उठता है कि राजनीति आखिर किस मुकाम की ओर बढ़ रही है? (संवाद)
चुनावों पर वंशवाद का दबदबा, मध्यप्रदेश सबसे आगे
हरिहर स्वरूप - 2013-10-22 11:23
वंशवाद की राजनीति देश पर हावी होती जा रही है। राजनेताओं के बच्चे और बच्चियों का दबदबा राजनीति पर इस कदर बढ़ता जा रहा है कि इससे दलीय व्यवस्था और दलीय लोकतंत्र पर ही खतरा पैदा होने का डर लगा रहा है। वंशवाद अब सिर्फ गांधी नेहरू परिवार या कश्मीर के अब्दुल्ला या हरियाणा के चैटाला, उडीसा के पटनायक, तमिलनाडु के करुणानिधि, उत्तर प्रदेश के मुलायम, महाराष्ट्र के शरद पवार और बिहार के लालू तक सीमित नहीं रह गया है। वह देश के हरेक हिस्से में दीमक की तरह फैलता जा रहा है।