ममता सरकार के दो साल पूरे हो चुके हैं। उसके बावजूद वामपंथी उसके खिलाफ विपक्ष की सार्थक भूमिका निभाने की रणनीति अभी तक बना नहीं सके हैं। आखिर वे विपक्ष की प्रभावी भूमिका निभाने में भी असमर्थ क्यों हैं- यह सवाल राजनैतिक पर्यवेक्षकों और वामपंथी समर्थकों के सामने भी एक रहस्य से कम नहीं है।

34 साल तक सत्ता में रहने के बाद सीपीएम 2011 में इससे बाहर हो गई। उसके बाद उसे समझ में नहीं आ रहे है कि वह क्या करे। वह कभी कुछ शरू करती है और बीच में ही छोड़ देती है। वह आंदोलन की घोषणा करती है, लेकिन बाद में उसे स्थगित कर देती है। पार्टी के बड़े नेता युवा समर्थकों को कुछ करने की आजादी नहीं देते। उनके उत्साह पर लगातार पानी फेरने का काम करते हैं।

जब कभी भी तृणमूल कांग्रेस और उसकी सरकार के खिलाफ आंदोलन करने की बात सामने आती है तो सीपीएम के प्रदेश सचिव और वाम मोर्चे के चेयरमैन बिमान बोस व पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य लोगों को सतर्कता बरतने का संदेश देना शुरू कर देते हैं।

दूसरी तरफ दूसरी पंक्ति के नेता चाहते हैं कि वे सड़कों पर उतरें और लड़ाई को तृणमूल कांग्रेस के कैंप में ले जाकर लड़ें। उनका नेतृत्व गौतम देब और सुभाष मुखर्जी जैसे नेता कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि पार्टी ज्यादा से ज्यादा आक्रामक रुख अपनाए।

तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ कौन सी फौरी रणनीति बनाई जाय, इस पर चल रही आंतरिक बहस अब वैचारिक स्तर पर आ गई है। अशोक मित्र जैसे सीपीएम के पुराने नेता ने कहा है कि पार्टी अब अपनी जड़ों में जाय और एक बड़ा आंदोलन कदम दर कदम बनाए और वह बिना किसी तैयारी के मैदान में नहीं कूदे।

लेकिन गौतम देब ने तुरंत अशोक मित्र के विचार से विपरीत अपनी टिप्पणी जारी कर दी। उन्होंने कहा कि पार्टी का युवा तबका पहले से ही अलग अलग क्षेत्रो में आंदोलन कर रहे हैं और एक बड़ा संघर्ष शुरू करना कोई दिवा स्वप्न नहीं है। इस स्तर पर बड़े आंदोलन छेड़ने की बात करना पागलपन भी नहीं है। दोनों नेताओं ने अपने अपने विचार सार्वजनिक मंचों पर रखे हैं।

सच कहा जाय, तो पार्टी के मुखपत्र में ही मित्रा और देब के विचार आए हैं। इस तरह की सार्वजनिक बयानबाजी सीपीएम के लिए अनोखी घटना है। एक राजनैतिक पर्यवेक्षक का कहना है कि सीपीएम अब आंतरिक दबाव के तहत ज्यादा से ज्यादा लोकतांत्रिक होने लगी है और स्टालिनवादी पार्टी होने की अपनी छवि से बाहर निकल रही है।

रणनीति को लेकर हो रही बहस मीडिया में बहुत प्रचार पा रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेता कह रहे हैं कि लोग अभी विपक्ष के किसी बड़े आंदोलन के लिए तैयार नहीं हुए हैं। हावड़ा लोकसभा के उपचुनाव को छोड़कर अन्य सारे उपचुनावों के परिणाम भारी समर्थन के साथ तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में गए हैं। पंचायत और शहरी निकायों के चुनावों मंे भी तृणमूल कांग्रेस को जबर्दस्त सफलता हाथ लगी है।

अशोक मित्रा का कहना है कि लोग अभी भी वामपंथी दलों और खासकर सीपीएम से नाराज हैं। सीपीएम को अपनी गलती स्वीकार करनी चाहिए और लोगों से उसके लिए माफी मांगनी चाहिए। उसे खुद को भी सुधारना चाहिए और उसके बाद प्रखंड स्तर से शुरू करके ऊपर के स्तर पर आंदोलन को आगे ले जाना चाहिए।

उनका कहना है कि यह आजमाया हुआ तरीका है, जिसका इस्तेमाल वामपंथी अतीत में भी कर चुके हैं। वे याद दिलाते हैं कि इसी तरीके को अपनाते हुए वामपंथी दलों ने 1947 से 1967 तक सत्ता में रहे कांग्रेस को हराकर सत्ता हासिल की थी। उनका कहना है कि वामपंथी दल झटका खाकर अब उन्हीें दिनों मंे वापस पहुंच गए हैं।

दूसरी और देब व अन्य लोगों का कहना है कि विपक्ष चुप बैठकर तृणमूल कांग्रेस का काम आसान कर रहा है। इसके कारण उसे खुला मैदान मिल गया है, जिसमें उसे रोकने वाला कोई नहीं है। इसके कारण वह कांग्रेस के लोगों को अपनी ओर खींचने में सहायता मिल रही है और वह लगातार मजबूत होती जा रही है। यही नहीं इसके कारण अब वामपंथी कार्यकत्र्ता और समर्थक भी तृणमूल की ओर खिंचे जा रहे हैं। और जो तृणमूल में शामिल नहीं हो रहे हैं, उनमें से भी अनेक ने अपने आपको निष्क्रिय बना दिया है, क्योंकि वे हौसलापस्ती के दौर से गुजर रहे हैं। यदि पार्टी ने आंदोलनों को जारी रखा होता, तो इस तरह की नौबत नहीं आती।

इस तरह से पार्टी के अंदर वैचारिक बहस चल रही है और फिलहाल तृणमूल का सामना करने के लिए सीपीएम तैयार नहीं दिखाई पड़ रही है। (संवाद)