जिस तरह से 1984 में मिली विजय को राजीव गांधी ने बर्बाद किया, उसी तरह कांग्रेस 2004 और 2009 में मिली विजय को बर्बाद कर रही है और आगामी 2014 के लोकसभा चुनाव में एक बड़ी पराजय की ओर बढ़ रही है। उसमे उसे शायद उसे 100 सीटें भी नहीं मिल पाए। 1989 के पहले कांग्रेस ने इस बात को मानने से इनकार कर दिया था कि लोग पहचान की राजनीति से उबरना चाहते हैं। बोफोर्स मससे के उभरने के बाद कांग्रेस इस कदर डरी कि उसने पहचान की राजनीति को बढ़ावा देकर जीत का सपना देखना शुरू कर दिया। उसका अंजाम क्या हुआ, हम यह जानते हैं।

उसी तरह कांग्रेस इस बार नहीं समझ पा रही है कि 2004 और 2009 में उसे जीत क्यों और कैसे मिली। वह इस बात को महसूस नहीं कर पा रही है कि 2004 की जीत लोगों द्वारा पहचान की राजनीति को खारिज कर दिए जाने का नतीजा था। 2002 में गुजरात में जो दंगे हुए थे, उसे लोगों ने पसंद नहीं किया और उसके कारण ही 2004 में कांग्रस की सरकार केन्द्र में बनी। 2004 का चुनाव हारने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने भी महसूस किया था कि उनकी पार्टी की हार गुजरात दंगों के कारण ही हुई थी। लेकिन जिस सच्चाई को अटल पहचान गए थे, उसे समझने में कांग्रेस भूल कर रही है।

2009 में कांग्रेस की जीत इसलिए हुई थी, क्योंकि 2004 और 2009 के बीच अर्थव्यवस्था का तेज विकास हुआ था। उस विकास का फायदा अमीरों को ही नहीं, गरीबों को भी मिला था। खासकर 25 करोड़ से 30 करोड़ के बीच की आबादी वाले मध्यवर्ग को उस विकास से बहुत फायदा हुआ था। उसके कारण ही कांग्रेस की जीत हुई थी, लेकिन उस कारण को भी कांग्रेस मानने से इनकार कर रही है।

जीत के असली कारणों को भूलकर कांग्रेस पुरानी सामंती समाजवादी नीति की ओर बढ़ रही है, जो इन्दिरा और नेहरू की विरासत है। इन्दिरा और संजय गांधी के तानाशाही राज में उन नीतियों को अपने चरम पर लाया गया था। टैक्स का बोझ बढ़ाओ और खर्च करो कि उस नीति के तहत आयकर की ऊपरी सीमा 97 फीसदी तक पहंुचा दी गई थी।

जो काम इन्दिरा और संजय की मां- बेटे की जोड़ी ने कभी किया था, अब वही काम सोनिया और राहुल की मां- बेटे की जोड़ी कर रही है। उन्हें विश्वास नहीं है कि पूंजीवादी तरीके से विकास हो सकता है। उन्हें मनमोहन- चिदंबरम- मोंटेक टीम पर भरोसा नहीं है। और जीत के लिए यह जोड़ी ऐसी नीतियों को सरकार और देश पर लाद रही है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था का बंटाढार हो जाएगा। सरकार के पास संसाधन नहीं है, लेकिन खाद्य सुरक्षा कानून बना दिया गया है। इसे लागू करने के लिए संसाधन प्राप्त करने का जो तरीका सरकार उठाएगी, उससे सुधार कार्यक्रम तबाह हो जाएंगे।

अपनी गलत समझ के कारण राहुल गांधी ने अपने राजनैतिक विरोधियों को फटकारते हुए कहा कि वे समझते हैं कि सड़कें, रेल, हवाई अड्डे और हवाई जहाज ही विकास के प्रतीक हैं। उन्हें नहीं पता कि शताब्दियों से ये सब विकास के प्रतीक रहे हैं। युवा शाहजादे को यह नहीं पता कि उनके निर्माण के समय तो प्रत्यक्ष तौर पर लोगों को रोजगार मिलता है और बाद में उसके कारण विकास की जो गति तेज होती है, उसके कारण भी रोजगार के अवसर पैदा होते हैं।

कांग्रेस का दुर्भाग्य यह है कि वह एक परिवार पर आश्रित हो गई है और परिवार जीत के लिए लोकप्रियतावादी नारों पर आश्रित है। भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना करते करते अब परिवार को लगता है कि पहचान की राजनीति और खाद्य सुरक्षा कानून जैसे अव्यवहारिक कानून ही उसे जीत में मदद पहुंचा सकते हैं। इसलिए वह उसी दिशा में आगे बढ़ रही है। ऐसा करके कांग्रेस खुद अपना कब्र खोद रही है। मां और बेटे कांग्रेस को उस गहराई की ओर ले जा रहे हैं, जहां उसका डूबना तय है। (संवाद)