मायावती दलित मतदाताओं को अपना मूल आधार मानती हैं। उन्हें ज्यादा दलितों का समर्थन मिलता भी रहा है, लेकिन एक तथ्य यह भी है कि दलितों के लिए प्रदेश में आरक्षित 17 सीटों में से 10 सीटें अभी मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी के पास है।

गौरतलब है कि समाजवादी पार्टी, बसपा और कांग्रेस को 2009 के लोकसभा चुनाव में लगभग समान सीटें मिली थीं। कांग्रेस को 22, सपा को 23 और बसपा को 21 सीटें मिली हैं, लेकिन दलितों के लिए आरक्षित सीटों पर जीत के मामले में समाजवादी पार्टी ने अन्य दोनों दलों को पछाड़ दिया है।

सपा को 10, बसपा को 2 और कांग्रेस को भी 2 ही सीटें उत्तर प्रदेश की 17 दलित सीटों में से मिली है। भाजपा को भी 2 और एक शेष सीट राष्ट्रीय लोकदल को मिली थी।

सपा को ज्यादा दलित सीटें मिलने का एक कारण यह है कि उन सुरक्षित सीटों पर हारजीत तय गैर दलित मतदाताओं के हाथों में होता है। इसलिए यदि किसी सीट पर दलित एकतरफा होकर किसी पार्टी विशेष के उम्मीदवार को वोट डाल दें, तब भी उनकी जीत सुनिश्चित नहीं की जा सकती। इसके लिए जरूरी है कि गैर दलित मतों का एक अच्छा खासा हिस्सा भी उस उम्मीदवार को मिले।

जाहिर है पिछले लोकसभा चुनाव में मायावती के दलित उम्मीदवार गैर दलितो का ज्यादा मत अपनी आरे खींच नहीं पाए, जबकि समाजवादी पार्टी का दलित उम्मीदवार वैसा करने मे ंसफल रहा। सपा उम्मीदवारों की जीत का बड़ा कारण वही था।

आने वाले चुनाव में भी समाजवादी पार्टी ज्यादा से ज्यादा दलित सीटों पर जीत हासिल करना चाहती है और इसके लिए ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दे रही है, जो ज्यादा से ज्यादा गैर दलित मत अपनी ओर आकर्षित कर सके। सपा ने अपने निवर्तमान 10 दलित सांसदों में से दो का टिकट काट लिया है, क्योंकि उसे लगता है कि चुनाव जीत नहीं सकते। जिन 7 हारी हुई सीटों पर जो उम्मीदवार पिछली बार खड़ किए गए थे, उनमें से भी कुछ को इस बार बदल दिया गया है।

समाजवादी पार्टी को यह अहसास है कि जीत निश्चित करने के लिए दलितों का भी वोट चाहिए। दलित भले ही आरक्षित सीटों पर बहुमत में नहीं हैं, लेकिन उन सभी सीटों में उनकी आबादी अच्छी खासी है। सच तो यह है कि उन्हीं सीटों को आरक्षित किया जाता है, जहां दलितों की आबादी ज्यादा है। जाहिर है, दलित मतों की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती।

यही कारण है कि समाजवादी पार्टी ने दलितों के लिए किए गए कल्याण कार्यक्रमों को लोगों तक पहुंचाने की अपील अपने कार्यकत्र्ताओं से की है। उम्मीदवारों को कहा गया है कि वे लगातार अपने चुनाव क्षेत्र में बने रहें और दलितों के कल्याण के लिए किए गए कार्यों की जानकारी दलितों को देते रहें।

दलितों में भी अनेक जातियां हैं और मायावती की जाति की संख्या उत्तर प्रदेश में दलितों की कुल संख्या का करीब 55 फीसदी है। शेष 45 फीसदी अन्य दलित जातियों की है। मायावती की पकड़ अपनी जाति के दलितों पर ज्यादा है, जबकि अन्य जाति के दलितों पर उनकी पकड़ उतनी मजबूत नहीं। टिकट वितरण में मुलायम सिंह यादव ने इसका ध्यान रखा है और वे वैसे दलित उम्मीदवारों को ज्यादा टिकट दे रहे हैं, जो मायावती की जाति के नहीं हैं।

उन्होंने सारिका देवेन्द्र सिंह बघेल को आगरा से अपनी पार्टी का टिकट दिया है। गौरतलब है कि सुश्री बघेल हाथरस से राष्ट्रीय लोकदल की निवर्तमान सांसद हैं।

बुलंदशहर में समाजवादी पार्टी ने कमलेश त्यागी की जगह सुनीता चैहान को टिकट दिया है। श्री वाल्मिकी कल्याण सिंह के काफी नजदीकी माने जाते हैं। शायद पिछली बार उनसे नजदीकी के कारण ही उन्हें सपा का टिकट मिला था।

लालगंज में विधायक बेचाई सरोज को पार्टी का टिकट दिया गया हैं। बाराबांकी में राजरानी रावत को चुनाव गया है, जबकि पिछले चुनाव में यहां का उम्मीदवार राम सागर रावल को बनाया गया था। राजरानी कभी भाजपा की विधायक हुआ करती थीं, पर वे आजकल समाजवादी पार्टी में हैं।

मुलायम सिंह यादव ने अपनी पार्टी के सभी दलित नेताओं को कहा है कि प्रखंड स्तर पर लोगों की बैठकें करें और उन्हें अखिलेश सरकार की उपलब्धियों से अवगत कराएं।

राजनेतिक विश्लेषक सुरेन्द्र राजपूत का कहना है कि समाजवादी पार्टी को यह अहसास हो गया है कि यदि ज्याद सीटें जीतनी हैं, तो यह दलितों का समर्थन हासिल किए बिना संभव नहीं है। यही कारण है कि उसने दलितों को लुभाने का प्रयास तेज कर दिया है। (संवाद)