जवाहरलाल नेहरू ने अपने कार्यकाल में राज्य स्तर के अनेक नेताओं को खड़ा किया था। तमिलनाडु में कामराज, उत्तर प्रदेश में चरण सिंह और चन्द्रभानु गुप्त, उड़ीसा में बीजू पटनायक, राजस्थान में मोहनलाल सुखाडि़या, महाराष्ट्र में वाई बी चैहान, गुजरात में मोरारजी देसाई व अन्य राज्यों में भी कद्दावर कांग्रेसी नेता नेहरू के जमाने मे ही उभरे थे और उनके उभार में नेहरू ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। नेहरू खुद वंशवाद की राजनीति नहीं चलाना चाहते थे और उन्हें एक हद से ज्यादा इन्दिरा गांधी को राजनीति में आगे नहीं बढ़ाया था। अपने उत्तराधिकारी के रूप में उन्होंने इन्दिरा को स्थापित नहीं किया था। सच कहा जाय, तो जवाहरलाल नेहरू का समय कांग्रेस का स्वर्णकाल था।

लेकिन इन्दिरा गांधी के सत्ता में आने के बाद स्थिति बदलने लगी। उस समय कांग्रेस में एक मजबूत सिंडिकेट था, जो इन्दिरा गांधी को पसंद नहीं करता था और इन्दिरा भी उससे डरी डरी रहती थी। दोनों के बीच टकराव चलता था और राष्ट्रपति के चुनाव के मसले पर तो दोनों के बीच आर और पार की लड़ाई हो गई। इन्दिरा नीलम संजीवैया रेड्डी को राष्ट्रपति उम्मीदवार नहीं बनाना चाहती थीं, पर सिंडिकेट के सामने उनकी एक नहीं चली। कांग्रेस के संसदीय बोर्ड ने रेड्डी को ही राष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में खड़ा करने का फैसला किया। इन्दिरा गांधी उस निर्णय केा प्रभावित नहीं कर पाई, क्योंकि बोर्ड में सिंडिकेट का ही बहुमत था।

इन्दिरा गांधी को यह अहसास हो गया था कि सिंडिकेट का अंतिम उद्देश्य उन्हें ही प्रधानमंत्री पद से हटाना था और उनकी जगह मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री बनाना था। इन्दिरा के सामने भारी संकट था और वह कोशिश कर रही थीं कि सिंडिकेट के साथ वह शांति स्थापित कर ले। पर उनकी कोशिश कामयाब नहीं हो पा रही थी और टकराव बढ़ता जा रहा था। राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस का आधिकारिक प्रत्याशी पराजित हुआ और इन्दिरा की पसंद का व्यक्ति राष्ट्रपति बना। उसके बाद क्या था? सिंडिकेट ने इन्दिरा गांधी को ही पार्टी से निकालकर बाहर कर दिया।

फिर तो इन्दिरा गांधी ने अपन निजी लड़ाई को अपनी सैद्धांतिक लड़ाई में बदल डाला। वह एक विचारधारा का प्रतीक बन गईं और सत्ता में बने रहने का लाभ भी उठाया। सत्ता ने उन्हें मजबूत बनाया और उनकी कांग्रेस ही कांग्रेस की मुख्य धारा के रूप में अपने आपकों स्थापित करना शुरू किया। लेकिन सिंडिकेट के हाथों मार खाने के बाद इन्दिरा ने कांग्रेस के स्थापित नेताओं के प्रति एक किस्म का डाह भाव पाल लिया था और फिर उन्होंने स्थापित नेताओं को ही एक एक कर विस्थापित करना शुरू किया।

इन्दिरा की नीतियों के कारण ही चरण सिंह कांग्रेस से बाहर हो गए और अपनी एक अलग पार्टी ही बना ली। बाद मे वे गृहमंत्री भी हुए और प्रधानमंत्री भी। हालांकि प्रधानमंत्री के पद पर वे इन्दिरा के समर्थन से ही बैठे थे। महाराष्ट्र के चैहान को भी इन्दिरा ने कमजोर कर डाला। चन्द्रशेखर इन्दिरा समर्थक नेता के रूप में उभरे थे, लेकिन उनका उभार भी उन्हें पसंद नहीं आया। उन्हें आपातकाल के दिनों में इन्दिरा ने जेल में भेज डाला था। जगजीवन राम के साथ भी अच्छा सलूक नहीं किया गया। उन्हें भी कांग्रेस छोड़ना पड़ा। हेमवती नन्दन बहुगुणा जैसे तेज तर्रार नेता भी इन्दिरा को पसंद नहीं था। वे भी कांग्रेस से बाहर हो गए। कुछ समय के लिए वे कांग्रेस में एक बार फिर वापस आए, लेकिन उसमें वे ज्यादा दिनों तक टिक नहीं सके।

इन्दिरा के कारण कांग्रेस राज्य और जिला स्तर पर देश के अनेक हिस्सों में नेता विहीन हो गई है। राहुल गांधी कोशिश कर रहे हैं कि सभी जगह नेताओ को बढ़ावा दिया जाय। लेकिन इसमे समय लगता है। यही कारण है कि फिलहाल उन्हें पहले के ही नेताओं से काम चलाना पड़ रहा है। पर सवाला उठता है कि नेताओं की नई फौज खड़ा करने में राहुल कितना समय लेंगे? (संवाद)