मोदी की पटना रैली इस मायने में भी ऐतिहासिक थी कि अबतक गांधी मैदान में हुई वह सबसे बड़ी रैली थी। 31 अक्टूबर, 1994 को लालू यादव ने पटना में गरीब रैली का आयोजन किया था। वह बिहार की सबसे बड़ी रैली थी। उस समय बिहार बड़ा भी था। आज का झारखंड उस समय दक्षिण बिहार कहा जाता था। वहां से भी लोग 1994 की उस गरीब रैली में आए थे। पर नरेन्द्र मोदी की 27 अक्टूबर को आयोजित हुंकार रैली ने उसका रिकार्ड भी तोड़ दिया।
सभाओं के पहले या उसके दौरान बम विस्फोट की घटनाएं पहले भी हमारे देश में हुई हैं। एक घटना में तो राजीव गांधी की मौत भी हो चुकी है। पेरम्बुदुर की उस सभा को कौन भूल सकता, जिसने इस देश के इतिहास को ही एक नया मोड़ दे दिया, पर पटना की यह रैली उससे ज्यादा अनूठी थी। उसमें एक तरफ धमाके हो रहे थे, तो दूसरी तरफ मंच से भाजपा नेताओं के भाषण हो रहे थे और भाषण सुनने वाले बमों के धमाकों को अनसुना कर अपनी जगह पर बैठकर नरेन्द्र मोदी के मंच पर आने का इंतजार कर रहे थे।
अबतक जो बातें सामने आई हैं, उनसे साफ हो रहा है कि ये धमाके कोई राजनैतिक रंजिश का नतीजा नहीं था, बल्कि आतंकवाद का हिस्सा था। छोटी मोटी सभाओं के आसपास विरोधियों द्वारा बम फंेककर सभा का मिजाज बिगाड़ने की घटनाएं तो बिहार में पहले भी होती रही हैं, लेकिन इस तरह से हिंसक बम विस्फोट वहां कभी नहीं हुए थे। बिहार की क्यों, देश के किसी भी हिस्से में इस तरह की योजना के साथ बम धमाके नहीं हुए थे। धमाके इस तरह से आयोजित किए गए थे, जिनमें धमाके से कम और भगदड़ से ज्यादा लोगों की मौत सुनिश्चित करवाने की योजना थी।
लगता है कि आतंकवादियों ने मोदी को रैली में भाषण देने से रोकने की फुलप्रूफ योजना बना रखी थी। विस्फोट की शुरुआत पटना जंक्शन रेल स्टेशन से शुरू हुई। रैली में ज्यादा लोग रेल से ही आते हैं। वहां धमाके करवाकर भगदड़ मचाने की योजना थी, ताकि सैकड़ों लोग उस भगदड़ में मारे जायं। लेकिन वैसा नहीं हुआ। वहां भगदड़ नहीं मची और कुछ बमों को विस्फोट होने के पहले ही देख लिया गया।
स्टेशन के बाद रैली स्थल को ही निशाना बनाया गया था। गांधी मैदान में रैली होनी थी और मैदान में भी बम बिछा दिए गए थे। एक बम तो मंच से 150 मीटर की दूरी पर ही फटे। रैली के मर्मस्थल पर शायद सुरक्षा की ज्यादा व्यवस्था थी, इसलिए उस स्थल में बम को प्लांट नहीं किया जा सका, लेकिन मैदान के चारों ओर बम प्लांट कर दिए गए थे और उनमें से अनेक फटे भी। बमों ने अपना काम भी किया। 5 लोग मारे गए और दर्जनों जख्मी होते रहे। सभी दिशाओं में बम फट रहे थे और आंखों देखा हाल सुनाने और दिखाने वाले टीवी चैनलों के पत्रकारों द्वारा रिपोर्ट सुनाने के बीच में ही बम धमाके की आवाज भी सुनाई पड़ती थी।
माहौल आतंकित करने वाला था। आतंकवादियों की योजना रही होगी कि चारों तरफ हो रहे बम धमाकों और उनसे उठ रहे धुएं को देखकर रैली में आए लोगों में भगदड़ मच जाएगी और वे जहां तहां भागने लगेंगे ओर उसमें सैंकड़ों लोग मारे जाएंगे। इसके साथ ही रैली का आयोजन भी नहीं हो पाएगा। रैली के आयोजक खुद कार्यक्रम रद्द कर देंगे और नरेन्द्र मोदी को रैली को संबोधित किए बिना वापस लौटना होगा या उन्हें पटना में रुककर मौत का मातम मनाना होगा।
पर बिहार के लोगों ने आतंकवादियों के मंसूबे का नाकाम कर दिया। दहशतगर्द दहशत फैलाना की अपना उद्देश्य रखता हैं। हिंसा तो उस उद्देश्य को पाना का साधन होती है। और यहां हिंसा से दहशत और दहशत से मौत का मंजर प्लान किया गया था, पर वैसा कुछ हुआ नहीं। यह सच है कि इस हिंसा में कम से कम 5 लोग मारे गए हैं और दर्जनों घायल हैं। घायलों में कुछ गंभीर लोगों की मौत भी हो सकती है और उसके बाद मरने वालो ंकी संख्या बढ़ भी सकती है। जो कुछ हुआ, वह बहुत ही चिंता की बात है और निंदनीय भी है, लेकिन दहशतगर्द अपने अंतिम उद्देश्य में सफल नहीं रहे और न तो सभा स्थगित हुई और न मंच प भाषण रुके और न लोग ही भागे। जो घायल हुए, वे अस्पताल गए, लेकिन अन्य लोग मोदी के भाषण का इंतजार करते रहे और भाषण सुनकर ही वहां से गए।
आतंकवादियों की मंशा पूरे बिहार को ही सांप्रदायिक हिंसा की आग मे झोंक देने की थी। अब्दुल करीम टृंडा और यासीन भटकल की गिरफ्तारी के बाद आतंकवादी न केवल बिहार से बदला लेना चाह रहे थे, बल्कि यह संदेश भी देना चाह रहे थे कि उन गिरफ्तारियों ने उन्हें अभी भी कमजोर नहीं किया है। यदि रैली के दौरान सैंकड़ों की संख्या में लोग मारे जाते और रैली हो ही नहीं पाती, तो निश्चय ही स्थिति को संभालना राज्य सरकार के लिए मुश्किल भरा काम होता। आखिर मुजफ्फरनगर के दंगे भी तो एक सभा में आ रहे और फिर उससे वापस जा रहे लोगों पर हमले के बाद ही शुरू हुए थे। आतंकवादी बिहार में मुजफ्फरनगर को और भी बड़ी भयावहता के साथ दुहराते देखना चाहते थे। पर रैली हुई और उसमें नरेन्द्र मोदी ने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की और शांति के मसले को बिहार की शान से जोड़ दिया। उन्होंने लगभग गिड़गिड़ाते हुए लोगों से शंाति से अपने अपने घरों को वापस जाने के लिए कहा। उनके भाषण का ही असर था कि रैली में जुटी लाखों की भीड़ शांत बनी रही और लोग शांति से ही अपने अपने गांवों और शहरों में वापस चले गए।
आतंकवाद की इस घटना ने चुनावी माहौल को भी खराब कर डाला है। जाहिर है, अन्य सभाओं में भी इस तरह के कारनामों को अंजाम देने की योजना आतंकवादी बना सकते हैं। निश्चय ही कानून व्यवस्था बनाए रखने वाली मशीनरी के सामने एक बड़ी चुनौती पैदा हो गई है। इस चुनौती का सामना कैसे किया जाता है, इसे बिहार ने दिखा दिया है। (संवाद)
आतंकवाद को बिहार का मुहतोड़ जवाब
धमाकों के बीच रैली का अनूठा कीर्तिमान
उपेन्द्र प्रसाद - 2013-10-28 10:27
लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री बनने के सबसे प्रबल दावेदार नरेन्द्र मोदी की पटना रैली की बहुत दिनों से प्रतीक्षा की जा रही थी। इसका कारण है कि उनके प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनने का सबसे ज्यादा विरोध और समर्थन बिहार में ही हो रहा था। उनका वह विरोध और समर्थन सियासी स्तर पर हो रहा था। जनता के स्तर पर उनकी क्या लोकप्रियता और किस तरह का विरोध उन्हें देखने को मिलता है, इस पर सबकी नजरें टिकी हुई थी। कुछ लोग उम्मीद कर रहे थे कि गोधरा के बाद गुजरात में हुए दंगे का मुद्दा उठाकर कोई समूह उनका पटना में सांकेतिक विरोध बगैरह कर सकता है, लेकिन उनका विरोध हुआ बमों के धमाके से, जो सवा तीन घंटे तक रुक रुक कर होते रहे।