सबसे पहली बात तो यह है कि भाजपा समझती है कि केरल की बदली राजनीति उसके अनुकूल हो गई है। हिंदू समुदाय के लोग कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ सरकार से बहुत ही नाराज हैं, क्योंकि यह सरकार अल्पसंख्यक समुदायों के तुष्टिकरण की राजनीति कर रही है। इस गुस्से को भाजपा अपने राजनैतिक फायदे में तब्दील करने की कोशिश कर रही है। उसे लगता है कि हिंदुओं की इस नाराजगी के बूतेे है वह अपना बहुत पुराना सपना पूरा कर सकेगी। उसका सपना केरल के चुनाव मंे अपनी जीत दर्ज करना है।
नेयिथिंकारा विधानसभा के उपचुनाव में भाजपा की कुछ सफलता का नजारा देखने को मिला। उसमें उसे जीत तो नही हासिल हुई, लेकिन उसके उम्मीदवार ओ राजगोपाल को मिले वोट 5 गुना ज्यादा बढ़ गए। विधानसभा के आमचुनाव में उस सीट से उन्हें 2011 में मात्र 6 हजार मत मिले थे, लेकिन उपचुनाव में वह बढ़कर 30 हजार हो गए। हालांकि उसमें जीत कांग्रेस उम्मीदवार की हुई थी, पर उस चुनाव का महत्व इस बात को लेकर था कि उसमें भारतीय जनता पार्टी का प्रदर्शन काफी बेहतर हो गया था। भारतीय जनता पार्टी का वह प्रदर्शन कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ के लिए ही नहीं, बल्कि सीपीएम के नेतृत्व वाले एलडीएफ के लिए भी बहुत चुनौती है।
यदि भारतीय जनता पार्टी अपने उस प्रदर्शन को आगामी लोकसभा चुनाव में भी दुहराती है, तो यह यूडीएफ और एलडीएफ दोनेा के लिए बड़ा झटका होगा कांग्रेस के लिए केरल काफी मायने रखता है, क्योंकि देश के जिन राज्यों में अभी भी कांग्रेस का दबदबा है, उनमें से केरल एक है। दक्षिण भारत में तो उसे कर्नाटक और केरल से ही आगामी लोकसभा के लिए कुछ उम्मीद बची हुई है। सीपीएम के लिए लिए भी केरल बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि बंगाल में उसकी स्थिति सुधरती नहीं दिखाई पड़ रही है। यदि उसे लोकसभा में इज्जत बचाने लायक कुछ सीटें पानी हैं, तो उसे केरल पर ही निर्भर रहना होगा।
सवाल उठता है कि जमीनी स्तर पर क्या स्थिति बन रही है? क्या भारतीय जनता पार्टी के पास इतनी ताकत और संगठन की मशीनरी है कि वह राज्य सरकार के खिलाफ पनप रहे हिंदुओं के आक्रोश का चुनावी लाभ उठा सके? इस सवाल का जवाब नकारात्मक है। इसका एक कारण तो यह है कि भाजपा की प्रदेश इकाई में काफी आंतरिक मतभेद है। जबतक राज्य इकाई अपने मतभेदों से मुक्ति नहीं पाती, तबतक वह यहां लोकसभा चुनाव में इतिहास बनाने के अपने सपने को पूरा नहंीं कर सकती। पहली जीत दर्ज करना उसके बूते की बात तबतक नहीं है।
पिछले दिनों कोचि में आरएसएस की एक तीन दिवसीय बैठक हुई। उस बैठक में कार्यकत्र्ताओं से अपील की गई कि वे संयुक्त तरीके से भाजपा की जीत को सुनिश्चित कर ने के लिए सक्रिय हो जायं। भाजपा ने साफ कर दिया कि अब वह केरल में मौन दर्शक बनकर नहीं रह सकता।
नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद संघ ने इस तरह का फरमान जारी किया है। मोदी की जीत संघ की प्रतिष्ठा का विषय हो गया है। उसके कहने पर ही मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया गया और आडवाणी को दरकिनार कर दिया गया।
लेकिन सवाल यह है कि क्या संघ भारतीय जनता पार्टी की आंतरिक गुटबाजी समाप्त करवाने में सक्षम है? भाजपा का एक गुट तो आरएसएस से ही भिड़ा हुआ है। क्या वह आत्मसमर्पण करेगा? यह सभी को पता है कि आरएसएस का एक वर्ग वी मुरलीधरन को दुबारा प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के खिलाफ था।
प्रदेश भाजपा में दो गुट हैं। एक गुट का नेतृत्व तो प्रदेश पार्टी चीफ मुरलीधरन के हाथ मे है, तो दूसरे का नेतृत्व पार्टी के राष्ट्रीय सचिव पी के कृष्णदास के हाथ में है। लोकसभा चुनाव मेे उम्मीदवारों के चयन को लेकर दोनों गुटों में भारी मतभेद है। (संवाद)
केरल की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी
क्या वह हिंदू नाराजगी का लाभ उठा पाएगी?
पी श्रीकुमारन - 2013-10-29 10:22
तिरुअनंतपुरमः जैसे जैसे लोकसभा का चुनाव नजदीक आ रहा है केरल भाजपा का आत्मविश्वास बढ़ता जा रहा है। क्या भारतीय जनता पार्टी का यह आत्मविश्वास ठोस धरातल पर आधारित है? इसे समझने के लिए भारतीय जनता पार्टी की राजनीति पर एक नजर डालनी होगी।