नीतीश कुमार की चिंता मोदी के भाषणों से ही नहीं, बल्कि उनकी सामाजिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि से भी है। मोदी ने खुद कहा कि वे बचपन में रेल के डब्बों में चाय बेचा करते थे। बिहार की आबादी का आधा गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करती है। यदि खुद नीतीश सरकार के दावों को मानें, तो बिहार की आबादी का 85 फीसदी गरीबी रेखा से नीचे है। जाहिर है, यहां नेताओं का गरीब बैकग्राउंड मतदान के समय मायने रखता है। लालू यादव ने भी इस गरीबी की राजनीति की और इसके भरपूर फायदे उठाए। लालू ने बिहारी की जातिवादी राजनीति में गरीब शब्द को एक नई प्रतिष्ठा दिलाई। वे अपनी रैलियों का नाम गरीब शब्द पर रखा करते थे। एक रैली को उन्होंने गरीब रैली कहा, तो दूसरी को गरीब महारैली। फिर तीसरी रैली आयोजित की, तो उसका नाम गरीब रेल्ला और फिर चैथी रैली का नाम गरीब महारेल्ला रख दिया। गरीब शब्द के प्रति लालू यादव का ऐसा लगाव था कि उन्होंने रेल मंत्री की हैसियत से गरीब रथ नाम की रेलगाडि़यां तक चला दीं, जो वातानुकुलित हैं और जिनमें कम किराए लगते हैं।
जाहिर है, बिहार की राजनीति में गरीबी को एक बड़ा फैक्टर बनाने में लालू ने भूमिका अदा की। लालू खुद भी बहुत गरीब परिवार के थे और अपने चपरासी भाई के घर मे ंरहकर पढ़ाई करते थे। अपनी इस पारिवारिक पृष्ठभूमि का इस्तेमाल लालू ने बिहार की गरीब जनता के साथ अपने आपको एक दिखाने के लिए किया। अब जब नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि वे रेलगाड़ी के डब्बे मे चाय बेचा करते थे, तो इससे बिहार की गरीब जनता के साथ उनका जुड़ाव आसानी से हो जाता है और उनके बीच उनकी राजनैतिक पकड़ भी मजबूत हो जाती है। यही कारण है कि गुजरात की राजनीति में अपने आपको कभी भी चाय बेचने वाले के बेटे या खुद चाय बेचने वाले के रूप में मोदी ने कभी प्रचारित नहीं किया, लेकिन वे बिहार मे ंऐसा कर रहे हैं।
बिहार की जातिवादी राजनीति में पिछले 23 सालों से ओबीसी का दबदबा रहा है। जब तक ओबीसी का साथ लालू के साथ बना रहा, तबतक लालू जीतते रहे। भाजपा ने ओबीसी मतों के लिए ही नीतीश को आगे बढ़ाया था। उसी रणनीति के कारण लालू से नाराज हो रहे ओबीसी तबकों को तोड़ने में भाजपा सफल हुई थी। अब नरेन्द्र मेादी के रूप में उसके पास अपना नेता है, जिसे उसने अपना प्रधानमंत्री उम्मीदवार बना दिया है। नरेन्द्र मोदी ने तो खुद नहीं बताया, लेकिन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने मोदी को ओबीसी के रूप में बिहार की राजनीति में परिचय कराया।
नरेन्द्र मोदी की कमजोर पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि भाजपा का बिहार मे सबसे बड़ा हथियार है और नीतीश कुमार इस हथियार की काट करते हुए दिखाई पड़ रहे हैं। नरेन्द्र मोदी की पारिवारिक पृष्ठभूमि से वे इस कदर डरे हुए हैं कि उन्होंने खुद अपनी गरीब पारिवारिक पृष्ठभूमि का हवाला देना शुरू कर दिया है। राजगीर में अपनी पार्टी के चिंतन शिविर में उन्होंने कहा कि वे रेलवे स्टेशन पर चाय तो नहीं बेचते थे, पर अपने पिताजी के बगल में बैठकर दवाई की पुडि़या बांधा करते थे। गौरतलब हो कि नीतीश के पिताजी वैद्य थे ओर अपने मरीजों को दवाई पुडि़यों में बाधकर देते थे। चाय बेचने वाले मोदी के सामने अपने आपको दवाई की पुडि़या बांधने वाले बाल मजदूर के रूप मे पेश कर नीतीश उनकी काट कर रहे हैं।
बिहार की ओबीसी राजनीति कहीं मोदी के पक्ष में न चला जाए, इसकी चिंता भी नीतीश को है। इसलिए वे मोदी से इस बात का हिसाब मांग रहे हैं कि वे बताएं कि उन्होंने पिछड़ों के लिए क्या किया। यह सच है कि मोदी पिछड़े वर्ग से ताल्लुकात रखते हैं, लेकिन वे नीतीश की तरह पिछड़े वर्ग की राजनीति की उपज नहीं हैं, बल्कि वे हिंदुत्व की राजनीति की उपज हैं। पर यह भी सच है कि ओबीसी राजनीति अब उन दिनों को पीछे छोड़ चुकी है, जब अगड़ी जातियों को गाली देकर ओबीसी नेता अपनी राजनीति किया करते थे। भूराबाल (भूमिहारए राजपूत, ब्रहाह्मण और लाला यानी कायस्थ) साफ करो का नारा लगाने वाले लालू भी अब अगड़ी जातियों को खुश कर रहे हैं और खुद नीतीश कुमार तो मुख्यमंत्री ही अगड़ी जातियों के समर्थन से बने हैं। इसलिए नरेन्द्र मोदी द्वारा अगड़ी जातियों को कोसा नहीं जाना बिहार की राजनीति में अब कोई मायने नहीं रखता। आखिर पिछड़े वर्गो के मंडलवादी नेताओं ने ओबीसी के लिए क्या किया? यह ओबीसी के लोग अच्छी तरह जानते हैं। उनके लिए किसी ओबीसी को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठना ही काफी है। बिहार की राजनीति का यह तथ्य नीतीश कुमार को परेशान कर रहा है।
मोदी की पटना रैली का असर जनता दल(यू) पर कैसा हुआ है, वह राजगीर के चिंतन शिविर में दिखाई पड़ा। मोदी के खिलाफ सबसे कड़े शब्दों का इस्तेमाल करने वाले शिवानन्द तिवारी वहां नीतीश की खिंचाई और मोदी की बड़ाई करते दिखाई पड़े। उन्होंने नीतीश पर खराब नीयत वाला तंगदिल इंसान होने का आरोप लगा दिया। दूसरी तरफ एक मंत्री नरेन्द्र सिंह ने नीतीश को चुनौती दे डाली कि यदि उनको हिम्मत है, तो वे उन्हें मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दे। शिवानन्द की तरह की नरेन्द्र सिंह भी नरेन्द्र मोदी के कट्टर आलोचक रहे हैं। इन दोनों नेताओं द्वारा नीतीश के खिलाफ भरी सभा में उनके सामने ही आग उगलना इस बात का संकेत है कि बिहार के मुख्यमंत्री की राजनैतिक जमीन बहुत कमजोर हो चुकी है और अब ये नेता उनकी परवाह नहीं करते, क्योंकि उन्हें लग रहा है कि कमजोर नीतीश उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते।
आखिर ऐसा हुए क्यो? तो इसका एक कारण शायद यह है कि मोदी की ओबीसी पहचान सार्वजनिक होने के बाद भी बिहार की अगड़ी जातियों के बीच मोदी की लोकप्रियता कम नहीं हुई है। श्री सिंह और श्री तिवारी अगड़ी जातियों से आते हैं और वे साफ साफ देख रहे हैं कि राजनैतिक धरातल पर वहां क्या हो रहा है। जाहिर है, उन्हें जनता दल(यू) अब एक डुबता हुआ जहाज लग रहा है, जिसमें बने रहने की उनकी दिलचस्पी समाप्त हो गई है और उस दल के नेता को वे दल से निकालने की चुनौती दे रहे हैं। यानी मोदी की चुनौती नीतीश को भारी पड़ रही है।(संवाद)
नीतीश को भारी पड़ रही है मोदी की चुनौती
बगावती हो रहे हैं सिपहसालार
उपेन्द्र प्रसाद - 2013-10-30 10:39
भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी की पटना की हुंकार रैली के बाद बिहार के बदले राजनैतिक माहौल ने नीतीश कुमार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। एक तरफ तो रैली के दौरान हो हुए बम धमाकों ने उनकी सरकार की क्षमता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं, तो दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी द्वारा किए गए हमलों ने भी उन्हें आहत कर डाला है। मोदी के भाषण से तिलमिलाए नीतीश ने गुजरात के मुख्यमंत्री पर जिस तरह निजी हमले किए हैं, उससे उनकी प्रतिष्ठा नहीं बढ़ी है। मोदी ने उनके ऊपर विश्वासघाती, झूठा और पाखंडी होने का आरोप लगाया था। उन आरोपों को तो वे झुठला नहीं सके, उल्टे उन्होंने मोदी को ही झूठा साबित करने की कोशिश है।