इस सम्मेलन की अध्यक्षता इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया की जगह उनके बेटे प्रिस चाल्र्स करेंगे। 55 देशों के इस संगठन में एक अकेला देश कनाडा ही है, जो इसका बहिष्कार कर रहा है। कनाडा में रह रहे तमिलों ने वहां दबाव बनाया और उसके दबाव में ही कनाडा सरकार ने इसका बहिष्कार करने का फैसला किया। दबाव ब्रिटेन सरकार पर भी पड़ा। लेकिन वहां की महारानी विक्टोरिया की राष्ट्रमंडल की प्रमुख हैं। इसलिए दबाव के बावजूद ब्रिटेन इसका बहिष्कार नहीं कर सका।

इसी तरह का दबाव भारत सरकार पर भी पड़ रहा है। तमिलनाडु की पार्टियां और उनके नेता भारत के इस सम्मेलन में भाग लेने का जबर्दस्त विरोध कर रहे हैं। कांग्रेस के तमिल नेता भी इस तरह के विरोध मे ंपीछे नहीं हैं। वित्तमंत्री पी चिदंबरम भी इसके सख्त खिलाफ हैं। केन्द्र सरकार में शामिल तमिलनाडु प्रांत के सभी मंत्री चाहते हैं कि भारत भी इस शिखर सम्मेलन का बहिष्कार करे और श्रीलंका की सरकार द्वारा वहां के तमिलों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ अपना विरोध दर्ज करे।

2014 में लोकसभा के चुनाव होने हैं। चुनाव के पहले इस तरह की गतिविधियां वहां बढ़ जाती हैं। वहां के दल और नेता अपने आपको श्रीलंकाई तमिलों के हमदर्द के रूप में दिखाने की हरसंभव कोशिश करते हैं, ताकि चुनावों मंे उन्हें तमिल भावना के नाम पर ज्यादा से ज्यादा मत मिले। हालांकि एक तथ्य यह भी है कि श्रीलंका के तमिलों के पक्ष में हाहाकार मचाने के कारण अब तक तमिलनाडु में किसी भी पार्टी को चुनावी लाभ नहीं मिला। इसके बावजूद वहां इस तरह के हाहाकार मचाए जाते हैं और जब चुनाव नजदीक हों, तो इसकी ध्वनि कुछ ज्यादा ही तेज होने लगती है।

हालांकि श्रीलंका के खिलाफ इस तरह का अभियान चलाने वाले भारत और भारत से बाहर रह रहे तमिल अकेले नहीं हैं। अनेक अंतरराष्ट्रीय संगठन भी श्रीलंका के खिलाफ मानवाधिकार हनन के आरोपों को लेकर सक्रिय हैं और चाहते हैं कि राष्ट्रमंडल देश श्रीलंका पर दबाव बनाने के लिए इसके शिखर सम्मेलन का बहिष्कार करें। उन संगठनों में अमनेस्टी इंटरनेशनलए नवी पिल्लै, संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयुक्त और कुछ अन्य भी शामिल हैं। वे श्रीलंका में हो रहे तमिल मानवाधिकारों के उल्लंधन की जांच की मांग की है। उनका आरोप है कि श्रीलंका की सरकार लगातार तानाशाह बनती जा रही है।

लेकिन मनमोहन सिंह ने अभी तक किसी प्रकार का निर्णय नहीं किया है और उनकी सरकार में यह बहस चल रही है कि वे खुद श्रीलंका जाएं या नहीं जाएं। उनकी सरकार के तमिल मंत्री चाहते हैं कि खुद मनमोहन सिंह वहां नहीं जाएं। भारत और श्रीलंका के बीच मछली मारने के अधिकारों को लेकर भी विवाद खड़ा हो गया है और श्रीलंकाई सैनिक भारतीय मछुआरों को परेशान करते रहते हैं। उनकी हत्या तक कर दी जाती है, गिरफ्तारी तो छोटी बात है।

दूसरी तरह श्री सिंह के उस सम्मेलन मे भाग लेने के पक्ष में भी बहुत सारी बाते की जा रही हैं। सबसे पहली बात तो यह है कि श्रीलंका भारत का एक पड़ोसी देश है। यदि कोई दूर दराज का देश होता तो ज्यादा समस्या पैदा नहीं होती, पर एक पड़ोसी देश के साथ इस तरह का बर्ताव करने का अलग मतलब होता है। श्रीलंका पर चीन डोरे डाल रहा है और यदि भारत ने इससे दूरी बनाया, तो वह पूरी तरह चीन की गोद में जा सकता है। इसलिए भारत श्रीलंका में हो रहे राष्ट्रमंडल देशों के शिखर सम्मेलन के बहिष्कार का जोखिम नहीं उठा सकता।

इतना ही नहीं, जो काम भारत श्रीलंका जाकर वहां की सरकार को समझाकर कर या करवा सकता है, वह उससे दूरी बनाकर नहीं कर सकता। भारत के प्रधानमंत्री खुद तमिल इलाकों का दौरा कर सकते हैं वहां की दशा का खुद जायजा ले सकते हैं। इसके कारण वहां के लोगों में कुछ आत्मविश्वास बढ़ेगा। श्रीलंका के उत्तरी तमिल बहुत इलाकों मंे प्रान्तीय चुनाव भी हुए हैं और वहां एक तमिल बिघ्नेश्वर की उसके मुखिया हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को उत्तरी श्रीलंका आने का आमंत्रण भी दिया है। वहां की स्थानीय सरकार भी यही चाहती है कि भारत इस शिखर सम्मेलन का बहिष्कार नहीं करे।

भारत बहिष्कार नहीं करेगा, लेकिन क्या वहां मनमोहन सिंह खुद जाएंगे या भारत के प्रतिनिधित्व का जिम्मा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी या उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के पास होगा? या भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए वहां विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद को भेज दिया जाएगा? भारत के पास ये सारे विकल्प हैं। लेकिन अच्छा यही रहेगा कि प्रधानमंत्री खुद ही इस सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व करें। (संवाद)