जब देश की अंदरूनी आर्थिक स्थिति अच्छी हो तो शेयर बाजार की भी चांदी हो जाती है, लेकिन आज स्थिति कुछ अच्छी नहीं है। सच कहा जाय, तो अर्थव्यवस्था के हर मोर्चे पर हताशा और निराशा ही है। औद्योगिक विकास दर गिरती जा रही है। अर्थव्यवस्था की विकास दर पिछले 10 साल के निम्नतम स्तर पर है। पिछले वित्त वर्ष यानी 2012-13 में देश की आर्थिक विकास दर 5 फीसदी थी। इस साल इसके और भी कम हो जाने की आशंका है।

ऐसी विकट स्थिति में शेयर बाजार के समृद्ध होने का कोई भी आर्थिक आधार नहीं दिखाई पड़ रहा है। तो क्या राजनैतिक आधार पर शेयर बाजार की यह खुशहाली आघारित है? कुछ लोग कह रहे हैं कि यह चिदंबरम प्रभाव का नतीजा है। उनका मानना है कि चिदंबरम के वित्त मंत्री बनने से शेयर बाजार उत्साहित है। पर वे तो वित्तमंत्री बहुत पहले से ही बने हुए हैं। यह सच भी है कि उन्होंने कुछ ठोस आर्थिक कदम भी उठाए है। लेकिन उनके कदमों का क्या असर अर्थव्यवस्था पर पड़ा है, वह हम देख चुके हैं। इसलिए यह कहना गलत है कि कोई चिदंबरम प्रभाव शेयर बाजार पर काम कर रहा है और उसके वशीभतू शेयर बाजार में आंधी हुई है।

एक और राजनैतिक कारण का नाम लिया जा रहा है और वह नाम है नरेन्द्र मोदी का। कहा जा रहा है कि 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना प्रबल हो गई है और उसी संभावना के बीच भारत का शेयर बाजार खुशियां मना रहे रहा है। पर लोकसभा चुनाव में अभी देर है। यह आगामी मई महीने में होगा।

और इसके अलावा नरेन्द्र मोदी का प्रधानमत्री बनना भी कोई तय नहीं है। इसके बारे में तरह तरह के अनुमान लगाए जा रहे हैं। त्रिशंकु लोकसभा होने की भविष्यवाणी सबसे ज्यादा प्रबल है, जिसमें क्षेत्रीय दलो का दबदबा हो सकता है। वैसी हालत मे नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना पर सवाल खड़ा किया जा रहा है, क्योकि क्षेत्रीय दलों में उनकी स्वीकार्यता को लेकर सभी एकमत नहीं है।

और यदि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना को स्वीकार भी किया जाय, तो वह तो 7 महीने के बाद ही संभव होगा। फिर इतना पहले भारत के शेयर बाजार में इतने पैसे कहां से और क्यों आ रहे है? देश की गिरी आर्थिक दशा का असर शेयर बाजार में पैसा लगाने वालों पर क्यों नहीं पड़ रहा?

यदि हम यह देखें, कि बाजार में पैसा कहां से आ रहा है, तो साफ दिखाई देगा कि यह विदेशों से आ रहा है। यानी घेरलू बाजारों के शेयर निवेशकों के पैसे नहंीं हैं, बल्कि विदेशों से यह पैसे आ रहे हैं। आखिर एकाएक विदेशियों ने भारत के शेयर बाजारों में पैसा लगाने की क्यों ठान ली? यह भी सोचने का विषय है।

ये विदेशी निवेशक विदेशी संस्थाओं और एजेंसियों से हिंट लेकर ही किसी दूसरे देश में निवेश करते हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक जैसे अंततरराष्ट्रीय संस्थान कह रहे हैं कि भारत की आर्थिक विकास दर नीचे गिर रही है। दोनो 5 फीसदी से कम की विकास दर का आकलन कर रहे हैं। मूडीज की सहयोगी इक्रा का भी यह आकलन है। फिर ये विदेशी निवेशक भारत मे धुआंधार निवेश क्यों किए जा रहे हैं?

26 अक्टूबर को समाप्त हुए एक महीने मे शेयर बाजार में विदेशों से 3 अरब अमेरिकी डालर विदेशी मुद्रा आ चुकी थी। यह एक बहुत ही बड़ी राशि है। यह विदेशी संस्थागत निवेशकों के द्वारा भारत में लाया गया और ज्यादातर मारिशश रास्ते को अपनाया गया। इन विदेशी संस्थागत निवेशकों की पहचान क्या है? ये कौन लोग हैं? सेबी और भारतीय रिजर्व बैंक को इसकी जांच करानी चाहिए, ताकि पता चल सके कि शेयर बाजार में आये इस तूफान के लिए कौन लोग जिम्मेदार हैं और वे ऐसा कयों कर रहे है। (संवाद)