वर्तमान व्यवस्था के तहत भारत ईरान से किए गए तेल आयात के 45 फीसदी का भुगतान रुपये में करता है। लेकिन इससे भुगतान की समस्या पूरी तरह सुलझ नहीं रही है। इसे सुलझाने के लिए पिछले राष्ट्रपति के कार्यकाल में वहां की सरकार ने भारत को बेचे गए तेल के शत प्रतिशत भुगतान की व्यवस्था रुपये में ही करने पर अपनी सहमति दे दी थी।
पर नई सरकार ने उसकी समीक्षा की और अपनी पूर्ववर्ती सरकार के उस फैसले पर मुहर लगाने से इनकार कर दिया है। इसके कारण एक बार फिर पुरानी स्थिति बहाल हो गई है और यह सवाल खड़ा हो गया कि भारत किस तरह 55 फीसदी ईरानी कच्चे तेल के आयात का भुगतान करेगा।
दरअसल यह समस्या अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों द्वारा ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण पैदा हो रही है। अमेरिका और यूरोपीय देश न केवल अपनी तरफ से ईरान के ऊपर प्रतिबंध लगा चुके हैं, बल्कि अन्य देशों को भी कह रखा है कि वे अमेरिकी डॉलर अथवा यूरो में ईरान को भुगतान नहीं करें। यही कारण है कि भारत न तो डॉलर में और न ही यूरो में ईरान को अपने आयात बिल का भुगतान कर सकता है।
शतप्रतिशत रूपये में भुगतान का प्रस्ताव ईरान द्वारा खारिज कर दिए जाने के बाद अब भारत और ईरानी अधिकारी आपस में मिलकर इस पर विचार कर रहे हैं कि किस हद तक भुगतान रूपये में हो और शेष आयात का भुगतान किस देश की करेंगी में हो। ईरान चाहता है कि भारत रुपये के अलावा उसे रुसी, रूबल, चीनी युआन अथवा जापानी येन में भुगतान करे।
इस समस्या का हल निकालने के लिए भारत के वित्त मंत्रालय, तेल मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक के अधिकारियों की एक टीम जल्द ही तेहरान की यात्रा करेगी।
भारत चालू वित्त वर्ष में ईरान से 130 लाख टन कच्चे तेल का आयात करने का लक्ष्य रखता है। उसने 20 लाख टन का आयात तो पहले ही कर रखा है। शेष 110 लाख टन का आयात उसे आने वाले महीनों में 31 मार्च से पहले ही करना है। तेल मंत्री वीरप्पा मोइली ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को प्रस्ताव करते हुए कहा है कि भारत यदि 110 लाख टन का आयात ईरान से करता है, तो वह देश के साढ़े 8 अरब डाॅलर की विदेशी मुद्रा की बचत कर सकता है।
भारत और ईरान के बीच हो रहे व्यापार की एक समस्या यह है कि भारत आयात तो बहुत कर रहा है, लेकिन भारत से अमेरिका में निर्यात बहुत कम हो रहा है। इसके कारण ईरान का 20 हजार करोड़ रुपया उससे यूको बैंक के खाते मे पड़ा हुआ है। ईरान भारत से किए गए आयात का भुगतान इस रुपये से कर सकता है, पर समस्या यह है कि भारत से वह आयात करे तो कैसे करे, क्योंकि अमेरिका व अन्य सहयोगी देशों ने धमकी दे रखी है कि जो निजी कंपनियां ईरान से व्यापारिक रिश्ता बनाएगी, उसे वे ब्लैक लिस्ट कर देंगे। इसके कारण भारत की कंपनियां ईरान के साथ व्यापारिक रिश्ते बनाने में दिलचस्पी नहीं ले रही है। दिलचस्पी की बात तो दूर, उसे ईरान के साथ संबंध बनाने में भी डर लगता है।
इस समस्या का एक समाधान यह है कि भारत की ये कंपनियां भारतीय स्टेट व्यापार निगम और धातु व खनिज व्यापार निगम के मुखौटे में ईरान के साथ व्यापार करे। यानी भारत की निर्यात कंपनियां सीधे ईरान को अपना माल नहीं बेचे, बल्कि वे अपना माल भारत की धातू एवं खनिज व्यापार निगम और भारतीय स्टेट व्यापार निगम को दे और ये सरकारी कंपनियां ईरान को निर्यात करें। ऐसा करने से ईरान अपने पास पड़े रुपये का इस्तेमाल कर सकेगा। उसका इस्तेमाल वह भारत के इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में निवेश करके भी कर सकता है। (संवाद)
ईरानी तेल का आयात: रुपये में भुगतान का मामला बिगड़ गया
विशेष संवाददाता - 2013-11-04 11:17
नई दिल्लीः भारत और ईरान के बीच राजनैतिक रिश्ते तेहरान में नये राष्ट्रपति की नियुक्ति के बाद बेहतर हुए हैं। इसके बावजूद भारत द्वारा ईरान से कच्चे तेल के आयात के भुगतान की समस्या का कोई अंतिम हल निकल नहीं पा रहा है।