कानून मंत्री का यह बयान ऐसे माहौल में आया है, जब केन्द्र की उनकी सरकार के ऊपर अपराधियों के प्रति नरम रुख रखने का आरोप लग रहा है। पिछले 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश जारी कर दो साल या उससे ज्यादा की सजा पाने वाले सांसदों और विधायकों की सदस्यता समाप्त करने को कहा था और उनके चुनाव लड़ने पर भी रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को निरस्त करने के लिए सरकार ने संसद में एक विधेयक पेश किया था, जो अभी भी वहां विचाधीन है। संसद का सत्र समाप्त होने के बाद तो सरकार ने एक अध्यादेश ही जारी कर दिया था। पर उसका भारी विरोध हुआ और विरोध करने वालों में राहुल गांधी भी शामिल हो गए। विरोध को देखते हुए सरकार ने उस अध्यादेश को वापस ले लिया।
अध्यादेश वापस लेने के बावजूद सरकार की बहुत ही किरकिरी हुई और सरकार का नेतृत्व कर रही कांग्रेस इस आरोप को धो नहीं पा रही है कि उसने भ्रष्ट और आपराधिक तत्वों को बचाने की भरपूर कोशिश की। ऐसे माहौल में कांग्रेस के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह यदि दिखाए कि वास्तव में वह अपराधियों को राजनीति में आने की विरोधी है। संभवतः इसी को ध्यान में रखकर सरकार एक ऐसा कानून बनाना चाहती है, जिससे अपराधियों के चुनाव लड़ने पर रोक लग सके।
अपराधियों के चुनाव लड़ने पर रोक तो अभी भी लगी हुई है, लेकिन समस्या यह है कि तकनीकी रूप से अपराधी उसी को माना जाता है, जिसे अदालत ने सजा दे रखी हो। वर्तमान कानूनों के तहत जिस व्यक्ति को दो साल से ज्यादा जेल की सजा मिली हुई है, वह चुनाव नहीं लड़ सकता। पर सच्चाई यह भी है कि सजा मिलने में बहुत देर होती है। हमारी न्याय व्यवस्था बहुत ही सुस्त है। अधिकांश अपराधियों को तो सजा ही नहीं मिलती है। गवाहों और सबूतों के अभाव में वे अदालत से बरी कर दिए जाते हैं। विलंबित न्याय के उदाहरण लालू यादव और रशीद मसूद हैं। रशीद मसूद 1990 के एक अपराध के मामले में 2013 में दोषी पाए गए। इस बीच उन्होंने बहुत चुनाव लड़े और कुछ जीते भी। लालू यादव के खिलाफ मुकदमा 1997 में दायर किया गया था, पर उन्हें सजा 2013 में मिली। इस बीच वे कई चुनाव लड़े और जीते। 5 साल तक तो वे देश के रेल मंत्री भी रहे।
जाहिर है, यदि सजा मिलने के बाद ही किसी को चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है, तो इससे अपराधियों को चुनाव लड़ने से रोकने का हमारा उद्देश्य पराजित हो जाता है। इसका एक तरीका तो यह है कि न्याय की प्रक्रिया को तेज किया जाय और जल्द से जल्द फैसला आए, लेकिन ऐसा करने में हमारे नीति निर्माता दिलचस्पी नहीं लेते। जाहिर है, न्याय व्यवस्था को सुस्त रखने में उनका निहित स्वार्थ है। पर वह यह दिखाना भी अब चाह रहे हैं कि वे राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ हैं। इसीलिए कपिल सिबल अब आरोपित अपराधियों को भी चुनाव लड़ने पर रोक लगाने का कानून बनाने की बात कर रहे हैं।
केन्द्र सरकार सभी प्रकार के आरोपित अपराधियों के खिलाफ कानून लाने का अभी भी पक्षधर दिखाई नहीं पड़ती। इसलिए वह 7 साल से ज्यादा सजा वाले अपराधों से संबंधित कानून ही बनाने जा रही है। पर आज राजनीतिज्ञों के भ्रष्टाचार पर भी आंदोलन होते रहते हैं। अन्ना के नेतृत्व में देश के करोड़ों लोगों ने आंदोलन किया। पर सरकार नहीं झुकी। सरकार क्या, देश की लगभग सभी राजनैतिक पार्टियों के नेताओं को वह आंदोलन रास नहीं आया। अभी भी जो कानून बनाए जाने की बात हो रही है, उसमें भ्रष्टाचार के आरोपों का अदालत में सामना कर रहे लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने की बात नहीं है। इसका कारण यह है कि हमारे भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत दोषी पाये गए अपराधियों को ज्यादा से ज्यादा 7 साल की सजा हो सकती है और कपिल सिबल 7 साल से ज्यादा की सजा पाने की संभावना रखने वाले अपराधियों को चुनाव लड़ने से रोकने की बात कर रहे हैं।
जाहिर है, कपिल सिबल का यह अधूरा प्रयास है। पर आज हमारे देश का राजनैतिक वर्ग इतना आत्मकेन्द्रित हो गया है कि ऐसी कोई व्यवस्था को तैयार करने को राजी नहीं है, जिससे उसके हितों को नुकसान हो सकता है। अन्ना के आंदोलन द्वारा प्रस्तावित लोकपाल को उसने इसके कारण ही स्वीकार नहीं किया। लेकिन लोकतांत्रिक दबाव और आपसी प्रतिस्पर्धा के तहत ही यदि वह हत्या, बलात्कार और अपहरण जैसे संगीन मामलों के आरोपित लोगों को चुनाव लड़ने पर भी रोक लगाता है, तो यह स्वागत योग्य है, क्योंकि न मामा से काना मामा अच्छा माना जाता है।
केन्द्र सरकार द्वारा प्रस्तावित कानून का विरोध भी किया जाएगा। इसके खिलाफ एक तर्क तो यही दिया जाएगा कि सिर्फ आरोप लगा दिए जाने से ही किसी की अपराध सिद्ध नहीं हो जाता और वह अपराधी नहीं करार दिया जा सकता। आरोप तो निर्दोष लोगो पर भी लगते हैं। कहा जाएगा कि अदालत से सजा सुनाए जाने के पहले ही इस कानून के तहत सजा देने का प्रावधान बन गया है, क्योंकि यदि किसी व्यक्ति को मात्र इसीलिए चुनाव लड़ने से रोक दिया जाता है, क्योंकि उसके खिलाफ मुकदमा अदालत में लंबित है, तो यह तो उसे सजा दिए जाने के बराबर है।
इस तर्क में दम है। पर हमें राजनीति के अपराधीकरण को भी तो रोकना है। इसमें भी सच्चाई है कि राजनैतिक विराधी किसी को भी चुनाव लड़ने से रोकने के लिए उसे झूठे मुकदमे में फंसा सकते है। जाहिर है, इसके कारण कुछ लोगों के चुनाव लड़ने के अधिकार को बाधित किया जाएगा। पर आज चुनाव वही लड़ते और जीतते हैं, जो समर्थ लोग हैं और समर्थ लोग अपने आपको झूठे मुकदमे में फंसाए जाने की समस्या का हल करने मे समर्थ हैं। अब तो हमारा लोकतंत्र ही वंशवादी लोकतंत्र मे तब्दील होता जा रहा है, जिसके तहत देश की राजनीति कुछ सौ परिवारों की गुलाम होती जा रही है। इसलिए गरीब और कमजोर लोगों को झूठे मुकदमे में फंसाए जाने का हवाला देकर इस कानून को रोकना गलत होगा। (संवाद)
आरोपित अपराधियों के चुनाव लड़ने पर रोक पर प्रस्तावित कानून नाकाफी पर स्वागत योग्य
उपेन्द्र प्रसाद - 2013-11-16 09:49
केन्द्रीय कानून मंत्री कपिल सिबल ने कुछ दिन पहले घोषणा की है कि केन्द्र सरकार एक ऐसा कानून बनाने जा रही है, जिसके बाद ऐसे संगीन अपराधियों के चुनाव लड़ने पर रोक लग जाएगी, जिसके खिलाफ अदालत में आरोप पत्र दाखिल हो चुके हैं। संगीन अपराधों की श्रेणी में उन्होंने ऐसे अपराधों को रखा है, जिसमें सजा होने पर कम से कम 7 साल की जेल होती है। हत्या, बलात्कार और अपहरण जैसे मामले इस तरह के संगीन अपराधों की श्रेणी में आते हैं।