कांग्रेस ने माधव राव सिंधिया के बेटे ज्योतिरादित्या सिंधिया को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बना दिया है और श्री सिंधिया ने हवा का रुख पलटने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है। सच कहा जाय, तो उन्होंने अपना सबकुछ दांव पर लगा रखा है।
मध्यप्रदेश में दो ही पार्टियों की तूती बोलती है। इसके गठन के बाद से ही यहां भारतीय जनसंध और बाद के भारतीय जनता पार्टी के साथ कांग्रेस का सह अस्तित्व रहा है। ज्यादा समय तक यहां कांग्रेस की सरकार रही है और मात्र 17 सालों तक भाजपा का शासन रहा है। अपने जनसंघ काल में भारतीय जनता पार्टी ने यहां एक बार सत्ता हासिल की थी।
लेकिन 2003 के पहले कभी भी भारतीय जनता पार्टी की किसी सरकार ने अपना पूरा कार्यकाल यहां पूरा नहीं किया था। 2003 में उमा भारती के नेतृत्व में सत्ता में आने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार अपना कार्यकाल पूरा किया था और उसके बाद हुए चुनाव में दुबारा जीत हासिल की थी। हालांकि सच यह भी है कि 2003 से 2008 के कार्यकाल में भारतीय जनता पार्टी के तीन मुख्यमंत्रियों ने सरकार का नेतृत्व किया। उमा भारती के बाद बाबू लाल गौर मुख्यमंत्री बने थे और श्री गौर के बाद शिवराज सिंह को यहां का मुख्यमंत्री बनाया गया। उसके बाद से वे लगातार अपने पद पर बने हुए हैं। विधानसभा का पिछला चुनाव शिवराज सिंह चैहान के नेतृत्व में ही भाजपा ने लड़ा था।
पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की स्थिति 2003 के चुनाव से बेहतर हुई थी, लेकिन उसके बावजूद भाजपा के विधायकों की संख्या के आधी से भी उसकी संख्या कम थी। 2003 में कांग्रेस को मात्र 38 सीटें मिली थीं? जबकि 2008 में उसे 70 सीटें मिली थीं। पिछली विधानसभा के आम चुनाव के बाद जितने भी उपचुनाव हुए, सबमें कांग्रेस की हार हुई। ज्यादातर उन्हीं क्षेत्रों में चुनाव हुए, जो आमचुनाव में कांग्रेस द्वारा जीते गए थे। जाहिर है, उन उपचुनावों में एक के बाद एक हो रही हार से कांग्रेस का मनोबल टूटा हुआ था।
कांग्रेस की आपसी गुटबाजी भी उसके लिए लगातार बाधा बनी हुई थी। इस गुटबाजी के कारण कांग्रेस विपक्ष की भूमिका का निर्वाह भी ढंग से नहीं कर पा रही थी। इस बार कांग्रेस ने ज्योतिरादित्या सिंधिया को केन्द्र में रखकर सभी गुटों मे एकता पाने में सफलता पाई है। सिंधिया स्वच्छ छवि के नेता हैं। भारतीय जनता पार्टी उन पर निजी हमले करने में सफल नहीं हो पा रही है। पहले भाजपा की रणनीति थी कि 2003 के पहले के कांग्रेसी कार्यकाल बनाम भाजपा कार्यकाल को मुद्दा बनाया जाय, लेकिन सिंधिया के मोर्चे पर आ जाने के कारण वह नीति काम करती नहीं दिखाई दे रही है।
भारतीय जनता पार्टी के लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद शिवराज सिंह चैहान का नेतृत्व हो रहा है। श्री चैहान की छवि जमीन से जुड़े नेता की हो गई है, जो लोगों के कल्याण का ध्यान रखते हैं। उनके कार्यकाल मंे प्रदेश का विकास हुआ है और सरकार की माली हालत भी अच्छी हुई है, जिसके कारण वे अनेक कल्याणकारी योजनाओं को चलाने में सफल हुए हैं। समाज के अनेक कमजोर वर्गो के लिए शिवराज सिंह चैहान ने कुछ न कुछ किया है। अपनी उपलब्धियों की एक लंबी सूची उनके पास है।
भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की एकता भी पार्टी के काम आ रही है। शिवराज सिंह चैहान सबके सर्वसम्मत नेता हैं और उमा भारतीय को छोड़कर कोई उनका चुनौती नहीं देता। इसके कारण पार्टी में आपसी फूट की समस्या नहीं है।
लेकिन हाल के दिनों में उजागर हुए भ्रष्टाचार के कुछ मामलों ने कांग्रेस को भाजपा पर हमला करने के लिए अवसर तैयार कर दिए हैं। प्रवेश घोटाला के साथ साथ खान घोटालों को भी कांग्रेस ने अपने अभियान का मुद्दा बना डाला है।
चुनाव पूर्व होने वाले सभी सर्वेक्षणों ने एक सुर में यह कहा है कि चुनाव में भाजपा की ही जीत होगी और आने वाले 5 साल में उसकी ही सरकार रहेगी, लेकिन अनेक बार चुनाव नतीजे इस तरह के सर्वे के नतीजों को गलत साबित कर देते हैं। देखना होगा कि श्री सिंधिया हवा के रुख को मोड़ पाने में सफल रहते हैं या नहीं। (संवाद)
मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए निर्णायक
सिंधिया ने झोंक दी है अपनी पूरी ताकत
एल एस हरदेनिया - 2013-11-19 10:30
भोपालः मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए मतदान 25 नवंबर को होने हैं। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी तीसरी बार लगातार सत्ता में आने के लिए पूरा जोर लगा रही है। फिलहाल हवा का रुख उसके पक्ष में दिखाई पड़ रहा है। कांग्रेस के लिए यह चुनाव जीतना काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह पहले से ही लगातार 10 साल से विपक्ष में है। यदि इस बार भी उसकी हार होती है, तो उसे अगले 5 सालों तक फिर विपक्ष में रहना होगा। लगातार विपक्ष में रहने से कांग्रेस के जमीनी स्तर पर कमजोर हो जाने के खतरे हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए वहां कांग्रेस इस बार अपने मतभेदों को भूलकर एक हो गई सी लगती है।