यदि सरकार को विवाद पैदा करने का कोई कारण नहीं दिखाई पड़ता है, तो वह ऐसे दावे करने लगती है, जो बाद में हवा हवाई साबित हो जाती है।
सरकार ने कुछ दिन पहले ही एक दावा पेश करते हुए कहा कि केरल का कन्नूर जिला देश का ऐसा पहला और एकमात्र जिला है जहां कोई भी भूमिहीन नहीं है। यह घोषणा बहुत ही जोर शोर से केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश की उपस्थिति में एक सभा में की गई। केन्द्रीय मंत्री सरकार के दावे से इतने उत्साहित हुए कि उन्होंने देश के अन्य राज्यों का आवाहन करते हुए कह डाला कि देश के अन्य राज्यों को केरल की इस उपलब्धि से सबक लेनी चाहिए।
उस घोषणा पर अभी हो रहे जश्न का माहौल समाप्त भी नहीं हुआ था कि तथ्य सामने आने लगे और जो कुछ अलग ही कहानी कह रहे थे। यह सच्चाई झटका देने वाली हैं कि सरकार कैसे तथ्यों को छुपाती है और वैसा करने में नौकरशाही कैसे उसकी मदद करती है।
उदाहरण के लिए सरकार ने घोषणा की थी जिस रोज उस सभा का आयोजन होगा, उस दिन 11 हजार 1 सौ 18 लोगों को जमीन के पट्टे दिए जाएंगे, लेकिन उस दिन मात्र 11,106 लोगों को ही पट्टे के कागज दिए जा सके। यह भी पाया गया कि कुछ आवेदक तो असली थे ही नहीं। इसका मतलब है कि लाभ पाने वाले लोगों की पहचान जिस प्रक्रिया से की गई थी, वह दोषपूर्ण थी।
यही नहीं, 6000 से ज्यादा परिवार, जिनमें मुस्लिम, आदिवासी और ओबीसी के लोग शामिल हैं अभी भी जमीन के प्लाॅट पाने का इंतजार रह रहे हैं। उनका यह इंतजार पिछले 7 साल से जारी है। इंतजार करने वालों मंे ज्यादातर लोग थालासेरी और तालिपरंभा तालुके के हैं।
सबसे आश्चर्य की बात यह है कि अधिकारियों को इन तथ्यों की जानकारी थी, लेकिन सरकार के एजेंडे को सूट करे, इसके लिए उन्होंने इन तथ्यों को दबाए रखा।
आगामी कुछ महीनों में लोकसभा के चुनाव होने वाले हैं। ये चुनाव कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाले यूडीएफ के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। पर भूमिहीन विहीनों के सरकार दावों का यह खेल उन्हें भारी पड़ सकता है। आदिवासी बहुत ही नाराज हो गए हैं। उन्हें भूमिहीन रखकर सरकार को उनके जिले को भूमिहीनों से मुक्त घोषित कर दिए जाने की घोषणा उनको नागवार गुजर रही है।
एक अनुमान के अनुसार कन्नूर जिले में अभी भी 12 हजार आदिवासी परिवार भूमिहीन हैं। इसके कारण राज्य सरकार की घोषणा बेमानी साबित हो रही है। आदिवासी संगठनों को कहना है कि राज्य सरकार इस मामले में केन्द्र सरकार को गुमराह कर रही है।
भूपरीक्षण समिति के अनुसार चांडी सरकार ने 2011 में सत्ता संभालने के बाद आदिवासियों को जमीन आबंटित ही नहीं की है। केन्द्र ने 19 हजार एकड़ जमीन राज्य सरकार को इस मकसद से दी थी, लेकिन उसे अन्य कामों में इस्तेमाल किया जा रहा है।
यही ठोस सच्चाई है और इसके कारण सरकार का वह दावा खोखला साबित हुआ है, जिसमें उसने कहा था कि उसे भूमिहीन लोगों की बहुत चिंता है।
इस बीच आदिवासी संगठनों ने घोषणा की है कि यदि प्रदेश सरकार ने उनके लिए केन्द्र से मिली जमीन उन्हें नहीं दी, तो वे आंदोलन करेंगे। (संवाद)
क्या कन्नूर देश का एकमात्र भूमिहीन विहीन जिला है?
चांडी सरकार का यह दावा उसके गले की बनी हड्डी
पी श्रीकुमारन - 2013-11-25 10:45
तिरुअनंतपुरमः ओमेन चांडी की यूडीएफ सरकार व्यावहारिक दृष्टि से विवादों के द्वारा विवादों के लिए और विवादों की सरकार बन कर रह गई है।