शुक्रवार, 25 अगस्त 2006
सांसद और संसदीय आचार संहिता
ज्ञान पाठक
गुरुवार को भारतीय संसद के पतन का एक और रिकार्ड उस समय बना जब जद (यू) नेता प्रभुनाथ सिंह और राजद नेता तथा रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के साले साधु यादव के बीच हाथापाई की नौबत आ गयी। फिर दोनों तरफ के सदस्यों द्वारा उत्पन्न किये गये गाली-ग्लौज और शोर-गुल के माहौल में प्रभुनाथ सिंह ने लोक सभा की सदस्यता से त्यागपत्र भी दे दिया।
उक्त घटना की हालांकि सभी तरफ से निंदा हुई है और लोक सभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने भी इसकी निंदा करते हुए चेतावनी दी कि यदि भविष्य में ऐसी घटना की पुनरावृत्ति हुई तो कठोरतम संभव कार्रवाई की जायेगी। लेकिन जिस ढंग से संसद समेत देश भर के राज्यों की विधायिकाओं में पिछले कुछ समय से गिरावट आ रही है उसे रोकना संभव नहीं जान पड़ता।
ऐसा विश्वास करने के कारणों की एक झलक स्वयं इस घटना में अंतर्निहित है। धक्का-मुक्की और शोर-गुल उस समय शुरु हुआ जब प्रभुनाथ सिंह ने आरोप लगाया कि बिहार के आरा में हुए बलात्कार कांड में रेल मंत्री लालू यादव के रिश्तेदार शामिल थे।
ध्यान रहे कि दोनों नेता बिहार राज्य से हैं जहां की राजनीति में दोनों एक-दूसरे के दुश्मन रहे हैं। पिछले दिनों हुए राज्य विधान सभा चुनाव में प्रभुनाथ सिंह की पार्टी ने बिहार में लगभग डेढ़ दशक तक चले लालू यादव के प्रभुत्व को समाप्त कर सत्ता संभाली है।
दोनों नेताओं के खिलाफ कितने-कितने आपराधिक मुकदमें हैं और दोनों के कितने रिश्तेदारों और चहेतों के खिलाफ कितने, इसकी चर्चा एक अलग आलेख का विषय हो सकता है। यहां इसकी अलग से चर्चा करने के बजाय खुद दोनों पक्षों के आरोपों- प्रत्यारोपों का उल्लेख ही काफी होगा।
प्रभुनाथ सिंह ने जैसे ही बलात्कार कांड में लालू के रिश्तेदारों के शामिल होने का आरोप लगाया, राजद के सांसदों ने प्रभुनाथ सिंह के खिलाफ कार्रवाई की ही मांग नहीं की बल्कि लालू यादव ने पलटवार करते हुए आरोप लगाया कि प्रभुनाथ सिंह के बहनोई आरा बलात्कार कांड में शामिल हैं।
यह हाल तो सदन में होना ही है, लेकिन आश्चर्य तो बस इतना ही है कि अभी सदन में उतनी संख्या और वीभत्सता में कांड नहीं हो रहे हैं जितने की आशंकाएं हैं। इन आशंकाओं को बल इसलिए भी मिलता है क्योंकि सदनों में सैकड़ों की संख्या में जीतकर आये नेता ऐसे हैं जिनकी पृष्ठभूमि आपराधिक रही है या जिनके खिलाफ आपराधिक मुकदमें दर्ज हैं।
लोक सभा के सांसदों के लिए जो हैंडबुक (पुस्तिका) है उसमें सांसदों का व्यवहार कैसा हो लिपिबद्ध है। राज्य सभा में 2005 में इसके लिए एक आचार संहिता लागू की गयी थी। लेकिन काफी विचार-विमर्श के बाद तैयार ऐसी आचार संहिताओं का भी मोल तभी रह पायेगा जब देश की विधायिका में कानून सम्मत तरीके से चलने वाले लोग जीतकर आयें।
विधायिका, जहां कानून बनाये जाते हैं वहां एक ओर तो भारी संख्या में कानून तोड़ने वाले जीतकर आ रहे हैं वहीं स्वच्छ छवि के माने जाने वाले नेता भी अब दोषियों को बचाने के लिए कानून बनवा रहे हैं। हाल के ही दिनों में ऐसे कई मामले सामने आये हैं।
फिर कथित तौर पर स्वच्छ छवि वाले नेताओं का एक ऐसा वर्ग भी है जो आपराधिक मुकदमों से ‘शोभित’ नेताओं को अपने साथ रखने और मंत्री बनाने के लिए तर्क देते हैं कि कानून में ऐसा करना वर्जित नहीं है।
यह भी सर्वज्ञात है कि राजनीतिज्ञ-अपराधी-अधिकारी तंत्र की मिलीभगत को तोड़ने के लिए भी कोई ठोस कदम नहीं उठाये जा रहे हैं। चुनाव सुधार की बात तो सभी राजनीतिक पार्टियां करती हैं लेकिन उनकी करनी उनकी बातों से मेल नहीं खातीं।
जनता भी कम दोषी नहीं। वह बड़ी संख्या में संदिग्ध चरित्र के लोगों को जिताकर सदनों में भेज रही है। एक तर्क दिया जाता है कि उनके पास विकल्पों की कमी रहती है, पर यह तर्क जनता के चारित्रिक पतन को ढकने में असमर्थ है।
कुल मिलाकर पूरे कुएं में भांग पड़ी हुई है। अभी लोग सभ्यता के पायदान पर नीचे खिसक रहे हैं। समाज की बदली हुई प्राथमिकताओं में सभ्य और अच्छे लोगों को हाशिये पर धकेला जा रहा है और वे पीड़ित हैं। राजनीति के माध्यम से यह स्थिति विधायिका में आ गयी है। सदन की गरिमा कैसे बचेगी! #
ज्ञान पाठक के अभिलेखागार से
सांसद और संसदीय आचार संहिता
System Administrator - 2007-10-20 05:54
गुरुवार को भारतीय संसद के पतन का एक और रिकार्ड उस समय बना जब जद (यू) नेता प्रभुनाथ सिंह और राजद नेता तथा रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के साले साधु यादव के बीच हाथापाई की नौबत आ गयी। फिर दोनों तरफ के सदस्यों द्वारा उत्पन्न किये गये गाली-ग्लौज और शोर-गुल के माहौल में प्रभुनाथ सिंह ने लोक सभा की सदस्यता से त्यागपत्र भी दे दिया।