1980 के दशक में पूरा पंजाब सांप्रदायिक तनाव के माहौल में थे। उसके कारण प्रदेश में हजारों हिंदू और सिख मारे गए थे। उसके कारण पंजाब का ही नहीं, बल्कि पूरे देश का ही इतिहास बदल गया था। इन्दिरा गांधी की हत्या और उसके बाद देश के कुछ इलाकों में सिंखों का कत्लेआम पंजाब के उस माहौल का परिणाम था।
1980 के दशक के अंतिम सालों में पंजाब में उग्रवाद पर काबू पा लिया गया था। लेकिन उसके बाद कश्मीर घाटी में सांप्रदायिक उबाल आ गया, जो अभी भी समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा है।
एक बार फिर पंजाब में इतिहास दुहराया जा रहा है। सांप्रदायिकता केा कुछ निहित स्वार्थी तत्व बढ़ावा दे रहे हैं और युवकों को गुमराह किया जा रहा है। इन सबका नतीजा सामने आ रहा है।
आखिर इसके कारण क्या हैं? सबसे बड़ा कारण तो सिखों के ऊपर शिरोमणि अकाली दल के नेताओं का प्रभाव लगातार कम होते जाना है। उन नेताओं से सिखांे का मोह भंग हो रहा है। इसके कारण अकाली दल जमीनी स्तर पर कमजोर होता जा रहा है।
सिखों पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए अकाली नेता अब धार्मिक नकाब जयादा से ज्यादा लगाने लगे हैं। सिख वोट बैंक को बचाना उनकी प्राथमिकता हो गई है और इसके लिए वे प्रदेश को सांप्रदायिकता के हवाले करने में भी संकोच नहीं कर रहे हैं।
उन्होंने प्रदेश भर में होने वाली धार्मिक दर्शन यात्रा का इस्तेमाल सिखों के बीच अपनी पैठ बनाए रखने के लिए किया। इस यात्रा को भारी प्रचार दिया गया और इसके लिए सरकारी तंत्र का पूरा पूरा इस्तेमाल किया गया। अधिकारियों को कहा गया कि वे यात्रा की विडियोग्राफी करें ओर विडियो को सोशल साइट्स पर डालें।
एक और ऐसा काम पंजाब की अकाली सरकार कर रही है, जिसके कारण प्रदेश मंे सांप्रदायिकता को नये पंख लग सकते हैं। पंजाबी सरकार देश भर में जेलों में बंद पंजाबी आतंकवादियों को पंजाब की जेलों में लाने का काम कर रही है।
अन्य राज्यों के जेलों में बंद सारे आतंकवादी यदि पंजाब की जेलों में आ जाते हैं, तो इससे उग्रवाद को नई ताकत मिल सकती है। जेलों में बंद अन्य कैदियों को वे भड़का सकते हैं और जेल से बाहर जाकर वे गुमराह किए गए कैदी समाज के अन्य लोगों को गुमराह कर सकते हैं।
उन आतंकवादियों को समय समय पर पेरोल पर भी छोड़ा जा सकता है और पेरोल पर बाहर जाकर वे खुद भी वहां के अन्य लोगों को गुमराह करने का काम कर सकते हैं।
भारतीय जनता पार्टी पंजाब में अकाली दल की सहयोगी है। पंजाब भाजपा के अध्यक्ष कमल शर्मा का कहना है अन्य राज्यों में बंद आतंकवादियों को पंजाब की जेलो में लाने के फैसले के पहले पंजाब की सरकार ने उनकी पार्टी से सलाह मशविरा नहीं किया।
आपरेशन ब्लू स्टार की 31वीं सालगिरह पर स्वर्ण मंदिर परिसर में जो हुआ, वह भी बढ़ती सांप्रदायिकता का नतीजा है। उस दिन वहां हिंसा हुई। खालिस्तान के नारे बुलंद किए गए। अकाली तख्त के जत्थेदार ने विवादास्पद बयान जारी किए। परमींदर मेहता द्वारा जरनैल सिंह भिंडरावाले के पोस्टर को हटाने के खिलाफ तीव्र प्रतिक्रिया भ्ी हुई। परमींदर मेहता कांग्रेस के नेता है और पोस्टर लगाने के कारण उन्हें पार्टी से सस्पेंड कर दिया गया है।
अमृतसर के हिंदू बहुल इलाके में खून खराबा होते होते बचा। भिंडरावाले के समर्थक उस इलाके में बाइक जुलूस निकालना चाह रहे थे, जिसका भिंडरावाले विरोधी हिंदू ग्रुप विरोध कर रहे थे। पुलिस ने उस जुलूस को उस इलाके में प्रवेश नहीं करने दिया और इस तरह एक भारी खून खराबे का खतरा टला। (संवाद)
भारत
पंजाब में फिर हो रहे हैं सांप्रदायिक संघर्ष
उग्रवादियों पर नियंत्रण करने में बादल विफल
बी के चम - 2015-06-16 17:19
चंडीगढ़ः पंजाब में एक बार फिर सांप्रदायिक ताकतें अपना सिर उठा रही हैं और उसके कारण सांप्रदायिक संघर्ष होने भी शुरू हो गए हैं।