वे संगठन इसे धर्मविशेष या संप्रदाय विशेष से जोड़ रहे हैं। सबसे ज्यादा विवाद सूर्य नमस्कार को लेकर है और योग को लेकर कुछ कम विवाद है, लेकिन कुछ संगठन योग मात्र से चिढ़ रहे हैं और इसे धर्म विशेष से जोड़कर इसे अन्य धर्मो पर थोपे जाने का विरोध कर रहे हैं।
भारत में प्राचीनकाल से ही अनेक पंथों एवं सांप्रदायों को मानने वाले लोग रहे हैं। भारत में अनेक दार्शनिक विचारधाराएं रही हैं और उन विचारधाराओं की विभिन्नता के कारण यहां अनेक मत, पंथ और संप्रदाय रहे हैं। उनकी गिनती हजारों में की जा सकती है। योग विद्या का आविष्कार किसने किया और कब किया, इसके बारे में दावे से कुछ भी नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह मानने की परंपरा रही है कि योग विद्या के आविष्कारक शिव हैं। वैसे सच्चाई यह है कि योग विद्या का विकास कालक्रम में होता रहा है और इसमें लगभग सभी पंथों, मतों और संप्रदाय के लोगों ने योगदान किया है।
हड़प्पा सभ्यता के मिले अवशेष में योगासन में बैठी मूर्तियां और मूर्तिचित्र मिले हैं। आसन में बैठे व्यक्ति के आसपास पशुओं की भी कलाकृति मिली है। कुछ इतिहासकार इसे शिव का पशुपतिनाथ रूप भी कहते हैं। योगासन लगाए किसी व्यक्ति की वह सबसे पुरान कलाकृति है। उससे योग विद्या के आविष्कारक के रूप में शिव को देखे जाने की परंपरा को बल मिलता है।
लेकिन योग सिर्फ शैवों तक सीमित नहीं रहा है। बुद्ध और महावीर भी अपनी मूर्तियों और मूत्र्तिचित्रों में पद्मासन में बैठे दिखाई देते हैं। बुद्ध पद्मासन लगाकर ज्ञान मुद्रा में तो महावीर पद्मासन लगाकर अंजलि मुद्रा में बैठे दिखाई पड़ते हैं। शिव ज्यादातर सिद्धासन में बैठकर ध्यान करते दिखाई देते हैं। बुद्ध और जैन का दर्शन अवैदिक दर्शन है। यानी वे दोनों वेद को प्रमाण नहीं मानते, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वेद को प्रमाण मानने वाले वैदिक लोग योग को नहीं मानते। सच तो यह है कि पतंजलि का योग सूत्र छह प्रमुख वैदिक दर्शनों में एक है। यानी योग वैदिक भी है और अवैदिक भी।
जैन और बौद्ध मतावलंबियों के अलावा लगभग सभी मतावलंबियों का योग से संबंध रहा है। शैव तो योग से जुड़े ही रहे हैं और शिव को ही परंपरा से योग विद्या का आविष्कारक माना जाता है, लेकिन इसे शाक्त भी मानते हैं और उन्होंने भी इसके विकास में योगदान किया है। शाक्त ही क्यों अघोरीपंथ, औघड़पंथ, दक्षिण मार्गी और वाम मार्गी सबने इसे समान रूप से अपनाया और योग का सबका अपना अपना अलग संस्करण भी कर रहा है। तांत्रिक से लेकर मांत्रिक समुदायों ने भी योग का अपने अपने तरीके से विकास किया है और उसे समृद्धि प्रदान की है।
पतंजलि का योगसूत्र को योग का दर्शन है। उसमें आसन या प्राणायाम या अन्य यौगिक क्रियाओं के भिन्न भिन्न किस्मों की चर्चा नहीं है। योग क्रियाओं के करने से संबंधित चार प्रमुख ग्रंथ आज मौजूद हैं। उनमें सबसे चर्चित ग्रंथ हठयोग प्रदीपिका है, जिसके रचयिता योगी स्वात्माराम हैं, जो नाथपंथीं हैं। नाथपंथियों के अनुसार आदिनाथ ने योग विद्या का आविष्कार किया और उनके यह विद्या मत्स्येन्द्रनाथ और फिर गोरखनाथ को मिली। इन नाथों ने भी योग विद्या को समृद्धि प्रदान की। लेकिन मुस्लिम काल में यह पंथ लगातार कमजोर पड़ता गया और इस मत को मानने वाले कई लोग मुस्लिम बन गए। पृथ्वीराज के योग गुरू योगी जयपाल के मुस्लिम बन जाने की बात इतिहास में कही गई है। आज मुसलमानों में जोगी नाम की एक जाति है, जिसके लोग अभी भी उस नाथ संप्रदाय की परंपरा को मुस्लिम आवरण में लपेटकर उसका निर्वहन करते हैं।
हठयोग प्रदीपिका के बाद दूसरी महत्वपूर्ण पुस्तक घेरंड सहिता है, जिसमें पतंजति और प्रदीपिका के अष्टांग योग की जगह सप्तांग योग है। इसमें भक्ति योग से समाधि प्राप्त करने की बात भी की गई है। पुस्तक की सामग्री के आधार पर हम घेरंड को वैष्णव कह सकते हैं, लेकिन वैष्णव होने के बावजूद घेरंड ने योग विद्या के आविष्कार का श्रेय शिव को ही दिया है। उसमें मुद्रा, आसन, प्राणायम व षटकर्म के बारे में विस्तार से बताया गया है।
हठयोग प्रदीपिका और घेरंड संहिता के अलावा शिवसंहिता और योगिनी तंत्र में भी योग क्रियाओं के बारे में विस्तार से बताया गया है। बताने की जरूरत नहीं कि शिवसंहिता शैव पंथ के लोगों द्वारा लिखी गई, तो योगिनी तंत्री शाक्त लोगों की कृति है।
बौद्ध ग्रंथों में भी योग का विस्तृत उल्लेख है। बज्रयानी, तंत्रयानी और सहजयानी बौद्धों ने भी योग क्रियाओं का विकास किया। बौद्ध साहित्य बौद्ध विश्वविद्यालयों के घ्वंस के साथ बहुत हद तक नष्ट हो गए हैं, लेकिन भारत के बाहर उपलब्ध साहित्य में योग क्रिया के बारे में बहुत कुछ देखने को मिल जाता है। सत्यनारायण गोयनका ने म्यान्मार से भारत आकर विपश्यना ध्यान पद्धति का प्रचार किया। माना जाता है कि बुद्ध ने विपश्यना योग से ही ज्ञान की प्राप्ति की थी।
जाहिर है कि योग का संबंध किसी एक पंथ से कभी नहीं रहा। जो नाथपंथी या अन्य पंथ के लोग मुसलमान हुए हैं, वे भी किसी ने किसी रूप में योग को अपने जीवन में अपनाते रहे हैं, भले ही योग की उनकी शब्दावलियां बदल गई हैं।
योग संबंधित जानकारियां बिखरी बिखरी हैं। मध्यकाल में इसकी परंपरा कमजोर भी पड़ती जा रही थी, लेकिन पिछली शताब्दी में हुए भारतीय पुनर्जागरण के साथ योग परंपरा को मजबूत करने वाले लोग भी पैदा हुए। बिहार स्कूल आॅफ योग के द्वारा स्वामी सत्यानंद ने तो विश्वायतन योगाश्रम के द्वारा स्वामी धीरेन्द्र ब्रह्मचारी ने इस पुरानी भारतीय विद्या से दुनिया का दर्शन कराया। दक्षिण भारत में योगी अयंगर ने इस परंपरा को मजबूती प्रदान की।
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने के कारण दुनिया भर में इसकी लोकप्रियता और बढ़ेगी, इसमें कोई संदेह नहीं, लेकिन इसे सांप्रदायिक रंग देकर इसका राजनैतिककरण किया जाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। (संवाद)
भारत
योग को संप्रदाय विशेष से जोड़ना गलत
यह हमेशा संप्रदाय निरपेक्ष रहा है
उपेन्द्र प्रसाद - 2015-06-18 09:44
21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने के संयुक्त राष्ट्र के निर्णय के बाद भारत में इसे राष्ट्रीय स्तर पर बहुत ही प्रचार के साथ मनाया जा रहा है। नरेन्द्र मोदी की केन्द्र सरकार की इसे हम एक उपलब्धि कह सकते हैं, क्योंकि इससे दुनिया भर में भारत का सम्मान बढ़ा है। योग विद्या की जननी भारत है ओर यह विद्या विश्व को भारत की देन है। लेकिन इसे लेकर कुछ संगठन विवाद खड़ा कर रहे हैं, जो बिल्कुल ही उचित नहीं।