अब तक भारत की भूमिका इसकी बैठक के आॅब्जर्वर की हुआ करती थी, लेकिन रूस के समर्थन के साथ भारत ने इसकी पूरी सदस्यता पाने के लिए पिछले साल आवेदन किया था।

इस बार इसका शिखर सम्मेलन रूस में ही हो रहा है। वह भारत को सदस्यता दिलाने की पूरी कोशिश करेगा और अन्य सदस्य भी भारत को इसका सदस्य बनाने के लिए तैयार हो जाएंगे। उसके शिखर सम्मेलन के साथ साथ ब्रिक्स का भी शिखर सम्मेलन वहां होगा। जाहिर है भारत एससीओ के सदस्य देशों के अलावा ब्राजिल और दक्षिण अफ्रीका के सरकार प्रमुखों के साथ भी वहां संवाद करेगा।

पाकिस्तान ने भी इस समूह की सदस्यता के लिए आवेदन कर रखा है। पूरी संभावना है कि उसे भी इसकी सदस्यता हासिल हो जाएगी। एससीओ समूह की बैठकों में अफगानिस्तान के मसले पर भी गंभीरता से विचार किया जाता है। उसका सदस्य होकर भारत इस मसले पर अपने पक्ष को प्रभावी रूप से रख पाएगा।

भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा का मसला काफी महत्वपूर्ण है। यह दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ताओं में एक है। एससीओ की सदस्यता पाने के बाद यह इसके सदस्य देशों में गैस और तेल की खोज और शोध करने का अधिकार पा लेगा। मध्य एशिया के तेल और गैस भंडार इसके शोध और खोज के लिए उपलब्ध हो जाएंगे। भारत अपनी तेल और गेस जरूरतों के 80 फीसदी का आयात करता है। उसे सस्ती ऊर्जा का विकल्प चाहिए और यह विकल्प उसे एससीओ की सदस्यता पाने के साथ उपलब्ध हो जाएगा।

भारत के लिए अच्छी बात यह है कि अगला शिखर सम्मेलन रूस में होने जा रहा है और भारत वहां विचार विमर्श के लिए रूस की मदद से अपने एजेंडे को आगे बढ़ा सकता है। वैसे भी भारत और रूस के संबंध बेहतर हुए हैं, क्योंकि भारत उक्रेन मे रूसी हस्तक्षेप को लेकर पश्चिमी देशों के विचार से इत्तिफाक नहीं रखता और वह रूस के खिलाफ किसी भी प्रकार का प्रतिबंध लगाने के खिलाफ है। भारत और रूस के बीच आतंकवाद, अफगानिस्तान और ऊर्जा सुरक्षा के मसलों मे बेहतर तालमेल बन सकता है।

विस्तृत एससीओ जिसमें भारत सहित पाकिस्तान भी इसका सदस्य होगा, भारत के लिए खास मायने रखता है। इसके कारण भारत को इस क्षेत्र में इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास में सहयोग करने और सहयोग लेने का मौका मिलेगा। अफगानिस्तान से अमेरिका अपनी सेना को वापस करने वाला है। उसके बाद अफगानिस्तान में पैदा हुई स्थिति पर इस समूह की नजर होगी और समूह वहां शांति स्थापित होते देखना चाहेगा। समूह के एक सदस्य के रूप में भारत भी वहां भूमिका निभा पाएगा। वहां भारत अपने हितों की रक्षा कर पाएगा और पाकिस्तान द्वारा लगाई गई अड़चनो को हटाने में कामयाब हो पाएगा। सच कहा जाए, तो अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के बाद वहां रूस, चीन और भारत की भूमिका बढ़ जाएगी।

ईरान भी इस समूह का सदस्य बनने को उत्सुक है, लेकिन उसे इस साल सदस्यता नहीं मिल पाएगी, क्योंकि उसके ऊपर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रतिबंध लगा रखे हैं। उन प्रतिबंधों का बदले माहौल मे हट जाने की संभावना है। रूस भी इसके लिए कोशिश कर रहा है। प्रतिबंध हटने के बाद वह 2016 में इसका सदस्य बन सकता है। उसके बाद तो भारत के लिए एससीओ की उपयोगिता और भी बढ़ जाएगी। (संवाद)