12 जून 2015 को नीति आयोग के सदस्स्य बिबेक देबरॉय ने रेल मंत्रालय को अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी है। उन्होंने रेलवे पुनर्गठन पर एक पैनल गठित करने, भारतीय रेल को तीन भागों में बांटने, रेलवे के स्वरूप व सामग्री को बदलने के उपायों तक पहुंचने की सिफारिश की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने पहले की रेलवे में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति प्रदान कर चुकी है।

भारतीय रेलवे एकीकृत समन्वित तंत्र बनाए रखने, एकल प्रबंधन के तहत अपने वर्तमान एकीकृत एकात्मक चरित्र को बनाए रखे हुए है। देबरॉय कमेटी इसे तोड़कर तीन भागों में बांटने की सिफारिश करती है। इससे संपूर्ण रेलवे पर रेल मंत्रालय का नियंत्रण नहीं रह पाएगा। यदि इन सिफारिशों को लागू कर दिया जाए तो रेल दुर्घटनाओं की वृद्धि की आवृत्तियों का जोखिम और रेलवे सुरक्षा और सेवाओं की सुरक्षा के मानकों को ख़तरे में डालने जैसे कार्य सरकार को करने को विवश होना पड़ेगा। इसके अलावा, पैनल रेलवे की सामाजिक जिम्मेदारी और उसके अपने वाणिज्यिक चरित्र के बीच मौजूदा संतुलन को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास कर रहा है। और आज रेलवे चाहे जितनी बुरी स्थिति में है फिर भी हमारे देश के लोगों को जो भारी संख्या में गरीब हैं, को कौन पूछेगा? आखिर वही तो सरकार का चुनाव करते हैं और जो कानून आधारित लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में प्रभु हैं, स्वामी हैं। उनके हित सीधे कुचले जाएंगे ।

रेल सुधार, सुरक्षा एवं न्याय पर आधारित इस तरह के रिपोर्ट पर कई अन्य पैनल और आयोग अपनी सिफारिशें दे चुके हैं, जिसमें सरीन समिति, प्रकाश टंडन समिति, एचआर खन्ना आयोग, राकेश मोहन समिति, सैम पित्रोदा समिति, अनिल काकोडकर समिति शामिल हैं। विभिन्न तरह के प्रमुख समितियों की गाथा में रेल निगमित सुरक्षा योजना के साथ रेलवे सुधारों पर कई समूहों और समितियों की रिपोर्ट अनगिनत हैं। ऐसी सभी रिपोर्टों को तेजी से जंग खा रही रेल लाइनों, जंग और मूल्यह्रास लागत को झेल रही रेलवे में निजी क्षेत्र की गुनगुना या नहीं के बराबर भागीदारी का फार्मूला नाकामयाब ही रहा है। भारतीय संदर्भ में संचालन, रखरखाव, रेलवे रोलिंग स्टॉक और घटकों के विनिर्माण जैसे क्षेत्र निश्चित रूप से निजी क्षेत्र के लिए चाय का प्याला के समान है। यह देखते हुए कि लंबी अवधि में कम या अधिक उत्पादन या कोई लाभप्रदता नहीं होने के बावजूद रेलवे का संचालन जारी है।

वैश्विक बाजार अर्थव्यवस्था के लिए जुलाई 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था के खुलने के बाद से सभी सरकारें वर्तमान सरकार से भी तेजी से रेलवे में निजीकरण का रास्ता ढूंढ़ती रही हैं परंतु यह तथ्य है कि अब तक कंटेनर यातायात को छोड़कर किसी अन्य क्षेत्र में निजी भागीदारी शून्य ही हैं। वर्तमान सरकार ने भी अपने शस्त्रागार में से सबसे तेज हथियार चलाने की कोशिश की है जो आसान नहीं है। भारतीय रेलवे में निजी भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए लागत-साझेदारी के आधार पर रेल के बुनियादी ढांचे के विकास का फार्मूला पेश किया गया था। यहां तक कि राज्यों से भी इसमें सहयोग करने की अपील की गई थी लेकिन तीव्र वित्तीय संकट से जूझ रहीं राज्य सरकारों ने अपने क्षेत्रों में भी रेल के बुनियादी ढांचा तैयार करने से दूर भाग गईं। निजी क्षेत्र तो इसमें भाग लेने में ही असमर्थ दिखा या उसे तत्काल लाभ नहीं दिखा।
बिबेक देबरॉय पैनल ने यात्री डिब्बे व वैगन निर्माण क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा कायम करने के लिए उसे निजी क्षेत्र के लिए खोलने की सिफारिश की है, रेलवे उत्पादन इकाइयों का कॉरपोराइजेशन करने, वाणिज्यिक लेखा अलग करने, रेल बजट समाप्त करने, यात्री और माल सेवाओं में निजी कंपनियों के प्रवेश की सिफारिशें प्रमुख हैं। यह रेलवे को कहां ले जाएंगे? यही नहीं रेलवे के मुख्य कार्य से लोकोमोटिव, रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) को अलग करने, स्थापित एवं चल रहे स्कूलों, अस्पतालों, स्टेडियमों, खानपान, अचल संपत्ति विकास, सुरक्षा जैसे अलाभकारी गतिविधियों को रेलवे के कार्य से अलग करने की सिफारिशें कुछ तो कहती हैं। अन्य महत्वपूर्ण सिफारिशें में अर्द्ध न्यायिक वैधानिक अधिकार के साथ एक स्वतंत्र नियामक के गठन का प्रावधान शामिल है। रेलवे में बाहरी दक्षता को प्रवेश दिलाने की सिफारिश की गई है। बाहरी प्रतिभा के प्रवेश के साथ समस्या यह आएगी कि रेलवे की व्यावसायिक इकाइयों के पुनर्गठन, उसके स्टाफ और भविष्य की पीढ़ी की चिंता कौन करेगा? इसके साथ ही केंद्रीकृत और श्रेणीबद्ध संस्थानों को निजी क्षेत्र को सौंपने और रेलवे के उद्धार हेतु विभिन्न उपायों को कैसे लागू किया जाए आदि सुझाव भी हैं।

यह भी हो सकता है भारतीय रेलवे निर्माण निगम नामक संस्था का गठन एक विशेष उद्देश्य के लिए करने की सिफारिश की गई हो। एक ही कंपनी के तहत, एक छतरी के नीचे इरकॉन और रेल विकास निगम लिमिटेड और सभी उत्पादन इकाइयों-उपक्रमों को क्षेत्रीय और मंडल रेल स्तरों पर विकेन्द्रीकरण की सिफारिश की गई हो। जिसे भारतीय रेलवे निर्माण निगम नाम दिया गया है।

पैनल की रिपोर्ट लेखा सुधारों के पांच अंक, एकीकृत प्रवेश, स्वतंत्र नियामक की स्थापना, निजी क्षेत्र के प्रवेश और विकेन्द्रीकरण पर केंद्रित है। इसके कार्यान्वयन के लिए पूरे पांच साल की समय सीमा का सुझाव दिया गया है।
मौजूदा हालात के तहत, भारतीय रेलवे के लिए प्रकाश टंडन समिति की सिफारिशों को लागू करने का रास्ता प्रशस्त किया गया है। उस रिपोर्ट का कहना है कि रेलवे की उत्पादकता और क्वालिटी सुधार के लिए भारतीय एकीकृत रेलवे प्रबंधन सेवा जो कि संयुक्त लोक सेवा परीक्षा के तहत आयोजित किए जाएं इससे निकलने वाले मानव संसाधन का प्रयोग रेलवे अपनी बेहतरी के लिए कर सकती है। श्री टंडन प्रबंधन क्षेत्र के दिग्गज माने जाते हैं जिन्होंने भारत में हिंदुस्तान यूनीलीवर लिमिटेड और सार्वजनिक क्षेत्र के पंब नेशनल बैंक को व्यवसायिक क्षेत्र में नई पहचान दिलाई थी। इनके सुझाव रेलवे को नई उदारीकृत अर्थव्यवस्था में एक अनोखे बिजनेस मॉडल बनने में सहायक साबित हो सकती है। देबरॉय कमेटी की सिफारिशें अन्य सभी सिफारिशों को लेकर चलने का एक नया रास्ता दिखाती है।

अन्य सुझावों के साथ यह जरूरी है कि सरकार को खर्चीले योजनाओं को बिना लागत बढ़ाए या अनावश्यक समय गंवाए समय पर पूरा करने की ओर ध्यान देना चाहिए जिसमें दिल्ली-कोलकाता और दिल्ली-मुंबई डेडीकेटेड माल वाहक कोरिडोर को पूरा करना चाहिए। इसकी तुलना में मुंबई-अहमदाबाद रूट पर बुलेट ट्रेन, सेमी हाई स्पीड ट्रेन और सेमी हाई स्पीड ट्रेन को प्रमुखता देना कहीं से भी रेलवे के भविष्य के लिए अच्छी नहीं है। इसकी तुलना में रेलवे को अपनी तकनीकी उन्नयन, ट्रेक, अमान परिवर्तन, बंद पड़ी योजनाओं को पूरा करने और रेलवे के ढांचे के विस्तार पर ध्यान देना ज्यादा हितकारी साबित होगा।

यदि देबरॉय समिति की सिफारिशों को सरकार ने लागू कर दिया तो आने वाले दिनों में रेल सेवा बहुत ज्यादा महंगी हो जाएगी। इसमें मानव संसाधन भी महंगा हो जाएगा, रेलवे में अत्याधुनिकीकरण के चलते नियुक्तियां बहुत कम हो जाएंगी रेलवे के महंगी होने से भारतीय अर्थव्यवस्था भी महंगी हो जाएगी, रेलवे ऋण के जाल में फंसती जाएगी जो उसके विनाश का कारण भी बन सकता है। यह जगजाहिर तथ्य है कि रेलवे का अपना बजट समाप्त होने से इसकी शत-प्रतिशत निर्भरता वित्त मंत्रालय पर हो जाएगी जो इसके रख रखाव और विकास में बाधक बनेगा। जो भी हो, देबरॉय समिति ने रेलवे के निजीकरण का ही सुझाव दिया है भले ही वह इससे इंकार करे, लेकिन यही सत्य है।

अंग्रेजी से अनुवाद-शशिकान्त सुशांत