प्रधानमंत्री कार्यालय और तेल मंत्रालय मिलकर एक ऐसी रणनीति पर काम कर रहे हैं, जिससे भारत अपने देश में और दूसरे देशों में भी ज्यादा से ज्यादा तेल की खोज और उसके शोधन का काम कर सके। पिछले वित्तीय वर्ष में भारत ने अपने तेल उत्पादो की जरूरतों का 80 फीसदी और गैस जरूरत का 70 फीसदी आयात किया है। प्रधानमंत्री ने संकेत किया है कि इनके आयात में लगातार कमी की जानी चाहिए और 2030 तक आयात के स्तर को आधा कर दिया जाएगा।
भारत की चिंता इस बात को लेकर है कि यहां तेल की मांग दुनिया के अन्य देशों के बीच सबसे ज्यादा दर से बढ़ रही है। मांग की यह बढ़ती दर साढ़े तीन फीसदी है। विकास की दर बढ़ने के साथ तेल उत्पादो की माग की दर भी बढ़ती जाएगी। लेकिन घरेलू उत्पादन मंे वृद्धि की दर बहुत कम है। इसके कारण भारत को ज्यादा आयात करना पड़ जाता है। इसके कारण देश का मुद्रा भंडार खाली होने लगता है। इस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार मे कच्चे तेल की कीमत 60 डाॅलर प्रति बैरल है और यह 30 जून के बाद और भी बढ़ सकती है, क्योंकि 30 जून ईरानी परमाणु संधि के लिए डेडलाइन तय किया गया है।
तथ्य यह भी है कि पिछले एक साल के ज्यादातर महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत गिरी हुई थी। यह गिरकर बहुत नीचे आ गई थी। लेकिन बाद के महीनों में कीमतें बढ़ने लगीं। कीमतों में शुरुआती कमी के कारण भारत के राजकोष को काफी लाभ हुआ और राजकोषीय घाटे पर नियंत्रण रखने में भारी सुविधा हुई। जब नरेन्द्र मोदी की सरकार ने पिछले साल 26 मई को शपथग्रहण किया था, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार मे कच्चे तेल की कीमत 108 डाॅलर प्रति बैरल थी, लेकिन वह 14 जनवरी तक गिरकर 43 डाॅलर प्रति बैरल तक आ गई। उसके बाद कीमत बढ़ने लगी। अभी यह 61 डाॅलर प्रति बैरल है।
कीमतों में वृद्धि के रुख को देखते हुए भारत सरकार की चिंता बढ़ रही है। आने वाले महीने उसके लिए चुनौती भरे होंगे। कीमतों के मोर्चे पर अनिश्चय बना रहेगा। यही कारण है कि सभी परिणामों का सामना करने के लिए भारत सरकार को तैयार रहना होगा।
तेल मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान एनडीए सरकार की नई रणनीति बना रहे हैं। उन्होंने भारत को तेल आयात करने वाले देशों के साथ बातचीत करनी शुरू कर दी है। एक बड़े तेल आयातक और उपभोक्ता देश के रूप में भारत तेल निर्यातक देशों के साथ विशेष रिश्ता बनाने की कोशिश कर रहा है। भारत तेल निर्यातक देशों की तेल पंरिसंपत्तियों के विकास की रणनीति पर तेजी से काम कर रहा है। वह उन देशों में तेल की खोज और उसके दोहन का काम बढ़ाना चाहता है। वहां की तेल संपत्तियों का स्वामित्व हासिल कर वह आयात बिल को कम कर सकता है और अपनी विदेशी मुद्रा की बचत भी कर सकता है। (संवाद)
भारत अब विदेशों में तेल संपत्तियों की खरीद में तेजी लाएगा
2030 तक आयात का स्तर आधा कम करना है
नित्य चक्रबर्ती - 2015-06-22 11:29
दुनिया के चौथे सबसे बड़े तेल उपभोक्ता देश भारत के सामने ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने की सबसे बड़ी चुनौती है। एनडीए सरकार के शुरुआती महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार मे कच्चे तेल की कीमतों के गिरने के कारण भारत को जो लाभ मिल रहा था, वह अब समाप्त हो रहा है। ऐसी स्थिति मे भारत को एक ऐसी रणनीति अख्तियार करनी होगी, ताकि वह कच्चे तेल और उसके उत्पादों के आयात के अपने बिल को कम कर सके। ऐसा करने के लिए उसने विदेशो मे तेल एवं गैसों की संपत्तियों को ज्यादा से ज्यादा खरीदने की रणनीति बनाई है।