कांग्रेस के नेतृत्व वाली कर्नाटक सरकार पर दबाव पड़ रहा था कि वह जयललिता के पक्ष में दिए गए कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे। वह दबाव में आ गई और उसने उस फैसले के खिलाफ अपील करने का निर्णय कर लिया। उस पर दबाव बनाने वालों में करुणानिधि की पार्टी डीएमके और रामदाॅस की पार्टी पीएमके तो थी ही, भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी भी धमकी दे रहे थे कि यदि कर्नाटक सरकार ने अपील नहीं की, तो वे खुद हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे।

कर्नाटक सरकार ने अपील उस समय की है, जब जयललिता आगामी साल होने वाले विधानसभा चुनाव को जीतने की तैयारी कर रही थी। इसके लिए उन्होंने अपने प्रशासन पर ध्यान केन्द्रित करना शुरू कर दिया था और हल्का अभियान भी आगामी विधानसभा चुनाव के लिए शुरू कर दिया था। जयललिता ने 23 मई को मुख्यमंत्री का फिर से शपथ ली थी। उसके पहले आठ महीने तक उनके द्वारा नियुक्त किए गए ओ पनीरसेल्वम मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे हुए थे। उनके समय में प्रशासन की हालत खस्ता थी और मुख्यमंत्री अनिर्णय के शिकार रहा करते थे। जयललिता के लिए अच्छी बात यह थी कि सेसन कोर्ट के निर्णय के बाद उन्हें जनता की अभूतपूर्व सहानुभूति प्राप्त हो गई थी। हाई कोर्ट के फैसले के बाद जनता का विश्वास जयललिता में कायम हो गया है। जयललिता इस सहानुभूति और विश्वास का लाभ उठाकर आगामी विधानसभा चुनाव में एक बार फिर जीत दर्ज करने की सोच रही थी।

लेकिन कर्नाटक सरकार द्वारा कर्नाटक हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जाने के बाद जयललिता को झटका लगा है। अपील उस समय की गई है, जब जयललिता खुद एक विधानसभा का उपचुनाव लड़ रही हैं, जिसे जीतना उनके मुख्यमंत्री बने रहने के लिए जरूरी है। गौरतलब है कि जब सेसन कोर्ट ने जयललिता को 4 साल की सजा सुनाई थी, तो उनकी विधानसभा सदस्यता अपने आप समाप्त हो गई थी। सुप्रीम कोर्ट में उनके खिलाफ अपील के बावजूद विधानसभा के इस उपचुनाव को जीतने में जयललिता को कोई परेशानी नहीं होगी, लेकिन असली डर इस बात का है कि कहीं सुप्रीम कोर्ट कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले को पलट न दे।

अपनी याचिका में कर्नाटक सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि वह जयललिता की सजा को फिर से बहाल कर दे, क्योंकि अपना फैसला सुनाने में कर्नाटक हाई कोर्ट ने अंकगणितीय गलतियां कर दी है। याचिका में यह भी कहा गया है कि कर्नाटक सरकार हाई कोर्ट में अपना पक्ष सही ढ़ंग से नहीं रख सकी, क्योंकि उसे इसके लिए पूरा समय नहीं मिल पाया था। आय से अधिक संपत्ति के मामले वाला यह मुकदमा जयललिता के खिलाफ 1996 में ही ठोंका गया था, लेकिन 2003 में इस मामले को कर्नाटक शिफ्ट कर दिया। ऐसा इस मुकदमे को तमिलनाडु की राजनीति के प्रभाव से मुक्त रखने के लिए किया गया था।

इधर देश की दोनों राष्ट्रीय पार्टियां जयललिता को अपने साथ लेने की कोशिश कर रही है। आगामी विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियां जयललिता के पार्टी के साथ गठबंधन या तालमेल करना चाहती है। जयललिता की पार्टी के लोकसभा में 37 सांसद हैं। इसका लाभ उठाने के लिए भारतीय जनता पार्टी जयललिता के साथ बेहतर रिश्ता कायम करना चाहती है। यही कारण है कि जब जयललिता को पिछले महीने कर्नाटक हाई कोर्ट द्वारा सजा मुक्त करार दिया गया था, तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें बधाई दी थी। उसके बाद यह अफवाह भी फैली कि जयललिता की हाई कोर्ट की जीत में केन्द्र सरकार की भी भूमिका रही है। (संवाद)