पिछली मनमोहन सिंह सरकार ने भी लोकलाज की उपेक्षा की। भ्रष्टाचार के एक से एक बड़े मामले सामने आते रहे और मनमोहन सिंह व उनकी सरकार का रवैया उन मामलों पर टालमटोल करने वाला बना रहा। लोकलाज नहीं मानने के कारण न केवल उनकी अपनी ईमानदार छवि धूल में मिल गई, बल्कि उनकी पार्टी कांग्रेस को अब तक की सबसे शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। उसे ऐसी हार मिली, जिसकी कल्पना उसके कट्टर विरोधियो तक ने नहीं की थी।

आज नरेन्द्र मोदी भी उसी लोकलाज की कसौटी पर जांचे जा रहे हैं। दुर्भाग्य से वे इस कसौटी पर खरे नहीं उतर रहे हैं। उनके नेतृत्व में उनकी पार्टी ने बहुमत हासिल इसलिए किया कि लोगों को लगा कि वे जो कह रहे हैं, वह करके दिखाएंगे। उन्होंने भ्रष्टाचार समाप्त करने की कसमें खाई थी। सरकार बनाने के बाद उन्होंने बार बार कहा था कि न खाएंगे, न खाने देंगे। न गंदगी फैलाएंगे और न ही किसी को गंदगी फैलाने देंगे। कुछ सप्ताह पहले जब उनकी सरकार ने अपने कार्यकाल का एक साल पूरा किया तो वे अपने सरकार के पहले कार्यकाल को भ्रष्टाचार मुक्त कार्यकाल बता रहे थे और कह रहे थे कि हमने भ्रष्टाचार पर नियंत्रण कर लिया है और उनकी सरकार में भ्रष्टाचार हुआ ही नहीं। वे चुनौती के अंदाज में लोगों से पूछ रहे थे कि बताओ किसी के ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। वे ताल ठोंककर कह रहे थे कि किसी मंत्री के रिश्तेदार पर भी भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे।

लेकिन एक साल पूरा होने का जश्न अभी उनकी सरकार ने मनाना पूरा भी नहीं किया था कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के भ्रष्टाचार का एक मामला सामने आ गया। सुश्री स्वराज ने कानून के एक भगोड़े ललित मोदी को यात्रा के दस्तावेज दिलवाने में सहायता की थी। विदेश मंत्री की हैसियत से सुषमा स्वराज का यह फर्ज बनता था कि ललित मोदी को भारत लाने के लिए प्रेरित करते। यदि उनसे जुड़ा कोई मानवीय मामला बन भी रहा था तो सहयोग के एवज में उनकी भारत वापसी की शर्त तो लगाई ही जा सकती थी। ललित मोदी भारत के नागरिक हैं। इसलिए उनके लिए विदेश मंत्री लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग को यात्रा दस्तावेज उपलब्ध कराने का आदेश दे सकती थी और बदले मे ललित मोदी की भारत में वापसी सुनिश्चित कर सकती थी, लेकिन उन्होंने वैसा नहीं किया और ललित मोदी को इंग्लैंड से बाहर जाने का रास्ता भ्रष्ट तरीका अपनाकर खोल दिया।

यही नहीं, सुषमा स्वराज की बेटी और उनका पति ललित मोदी के वकील भी हैं। उन दोनों की सहायता से मोदी ने हाई कोर्ट में मुकदमा जीतकर अपना पासपोर्ट भी हासिल कर लिया और विदेश मेंत्रालय ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील भी नहीं की। भ्रष्टाचार का यह एक और नमूना था कि जिसके तहत मंत्री अपने बेटी की मुवक्किल के पक्ष में फैसला ले रही थीं।

भ्रष्टाचार के इतने बड़े संगीन आरोप के बाद वे अपने पद पर बनी हुई हैं और उनकी पार्टी लोकलाज को ताक पर रखकर उनका इस तरीके से बचाच कर रही है, मानो उसे लोकलाज की कोई परवाह ही नहीं हैं। वे सुषमा के बचाव में जो तर्क दे रहे हैं, उसके कारण लोगों के बीच उनका उपहास उड़ता है, लेकिन उन्हें उसकी भी परवाह नहीं है।

सुषमा को बचाने के लिए ललित मोदी ने राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा से अपने रिश्तों का खुलासा कर दिया और पता चला कि राजस्थान विधानसभा में विपक्ष की नेता के रूप में वसुंधरा भी ललित मोदी के इंग्लैंड प्रवास को सुगम बनाने का प्रयास कर रही थी। उसके बाद तो दोनों के बीच वित्तीय लेनदेन के मामले भी सामने आए और संबंधों की प्रगाढ़ता का मामला भी सामने आया। लेकिन वसुधरा पर भी भाजपा वैसे ही बेतुके तर्क दे रही हैं, जिस तरह से सुषमा के मामले में दे रही हैं। वसुंधरा के बाद महाराष्ट्र की मंत्री पंकजा मुंडे के भ्रष्टाचार के मामले भी सामने आए। वहां भी पार्टी मंत्री का बचाव करती दिखाई दीं। इधर दिल्ली में मानस संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी पर भी शपथ देकर झूठ बोलने का मामला सामने आया है। निर्वाचन आयोग के समक्ष नामांकन करते समय उन्होंने 3 बार तीन प्रकार की परस्पर विरोधी जानकारी दी थी। दो बार तो उन्होंने निश्चय रूप से गलत जानकारी दी होगी और शपथ के साथ जानकारी पेश करना कानूनन अपराध है और इसके लिए हमारे यहां सजा का भी प्रावधान है। कायदे से उन्हें तो अपने पद से हट जाने के लिए कहा जाना चाहिए था। लेकिन वे भी अपने पद पर बनी हुई हैं।

और इन सब मामलों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुप्पी साध रखी है। यह चुप्पी उनकी एक बहुत ही दयनीय तस्वीर पेश करती है। उनकी पार्टी के लोग भ्रष्टाचार की नई नई परिभाषा गढ़ने में व्यस्त हैं और देश भर में अपने आपको उपहास के पात्र बना रहे हैं और इधर नरेन्द्र मोदी चुप्पी साधकर अपने आपको मनमोहन सिंह की श्रेणी में डाल रहे हैं, जिन्हें वे खुद मौन मोहन सिंह कहा करते थे। प्रधानमंत्री को लोकलाज का ख्याल रखना ही होगा, नहीं तो उनकी स्थिति भी वैसे नेताओं जैसी हो सकती है, जिन्होंने लोकलाज की उपेक्षा की थी। (संवाद)