जांच के दौरान हो रही मौतों का आलम यह है कि जांच के काम में लगे लोगों को भी अपनी जान गंवाने का डर सता रहा है। पत्रकार की मौत के बाद व्यापम से जुड़ी दो और मौतें हो चुकी हैं। जबलपुर मेडिकल काॅलेज के एक डीन तो दिल्ली के एक रिजाॅर्ट में मृत पाए गए। वे दो महीने पहले ही इस पद पर नियुक्त हुए थे। उनके पूर्ववर्ती डीन तो अपने घर में ही जलकर मर चुके थे। पूर्ववर्ती डीन के बारे में कहा गया कि उन्होंने जलकर आत्महत्या कर ली। लेकिन यह सामान्य ज्ञान की बात है कि जल कर आत्महत्या करना बहुत ही कष्टदायी होता है और जलने के बाद भी मौत नहीं हुई, तो जीवन और भी कष्टदायी हो जाता है। यह बात एक डाॅक्टर भी जानता है और यदि किसी डाॅक्टर को किसी कारणवश आत्महत्या करनी ही होगी, तो वह जलकर क्यों मरेगा? डाॅक्टर आसान और पीड़ा रहित मौत के लिए कोई इंजेक्शन ले लेगा अथवा कोई दवाई खा लेगा, जिसकी उसके पास जानकारी भी होती है और जिसके पास उसकी पहुंच आसान भी होती है। इसलिए पूर्ववर्ती डीन की जलने से हुई मौत को आत्महत्या नहीं माना जा सकता। कहते हंै कि व्यापम घोटाले की जांच में वे उनकी भी भूमिका थी और वे उन दस्तावेजों की जांच कर रहे थे, जिनका इस्तेमाल कर घोटालेबाजों ने मेडिकल में दाखिला लिया था।
मध्य प्रदेश का व्यावसायिक परीक्षा मंडल मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसे संस्थानों में प्रवेश की परीक्षाएं ही आयोजित नहीं करता था, बल्कि सरकारी नौकरियों में नियुक्तियों का जिम्मा भी उसे मिला हुआ था। 2007 से 2013 की कालावधि में 76 लाख से भी ज्यादा अभ्यर्थियों की परीक्षाएं व्यापम (व्यावसायिक परीक्षा मंडल) ने आयोजित की थी और उसी अवधि के दौरान चैतरफा व्यापक घोटाले हुए। घोटाले की व्यापकता को देखते हुए कहा जा सकता है कि यह अब तक भारत में हुआ सबसे बड़ा शिक्षा एवं नियुक्ति घोटाला है।
इस घोटाले से मध्यप्रदेश के राज्यपाल रामनरेश यादव का नाम भी जुड़ चुका है। उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था, जिसे उच्च न्यायालय ने यह कहते खारिज कर दिया कि राज्यपाल को संविधान के तहत संरक्षण मिला हुआ है और उनके खिलाफ उस पद पर रहते कोई मुकदमा नहीं हो सकता। हालांकि उच्च न्यायालय के उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई है और उसकी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में होने वाली है। राज्यपाल के बेटे पर भी मुकदमा इस घोटाले में दायर हुआ था और उनके बेटे भी मरने वाले आरोपियों में शामिल हो गए है। उनकी मौत भी रहस्यमय तरीके से हुई है। पुलिस उसे आत्महत्या का मामला बता रही है, लेकिन कई लोग उस मौत को आत्महत्या नहीं बल्कि साजिशन हत्या बता रहे हैं।
इस घोटाले में अनेक बड़े नेताओं के नाम सामने आए हैं और उनमे से कुछ के खिलाफ तो मुकदमा भी चला है और उनमें से कुछ अभी भी जेल में है। एक पूर्व मंत्री और भाजपा के बड़े नेता लक्ष्मीकांत शर्मा अभी भी जेल में बंद हैं। लक्ष्मीकांत शर्मा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के बहुत नजदीकी मंत्री रह चुके हैं। शिवराज सिंह के निजी सचिव से लेकर कुछ बहुत ही अन्य करीबियों के खिलाफ भी जांच चल रही है और उनमे ंसे कई अभी गिरफ्तारी से बचे हुए हैं।
इस घोटाले के आरोप खुद शिवराज सिंह चैहान और उनकी पत्नी साधना सिंह पर भी लगे हैं, लेकिन उनके खिलाफ किसी तरह की जांच नहीं चल रही है। संघ के नेता सुरेश सोनी का नाम भी इसमें आ रहा था। पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती का नाम भी इसमें घसीटा जा चुका है, हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह का कहना है कि शिवराज सिंह ने अपने आपको बचाने के लिए दस्तावेजों में छेड़छाड़ कर उमा भारती का नाम उससे जोड़ दिया। अपने आरोपों को साबित करने वाले कुछ दस्तावेज भी दिग्विजय सिंह ने जांच अधिकारियों को उपलब्ध कराए थे। जांच अधिकारियों ने उन दस्तावेजों की सत्यता पर सवाल उठाए, जिसे अदालत ने मान लिया। पर दिग्विजय सिंह ने वे दस्तावेज शपथ के साथ पेश किए थे। इसलिए यह वे झूठे दस्तावेज थे, तो श्री सिंह पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए था, पर वैसा अभी तक नहीं किया गया है।
व्यापम घोटाले की सत्यता जानने के लिए सीबीआई की जांच पहले से ही की जानी चाहिए थी, क्योंकि वह घोटाला हो ही इसलिए रहा था, क्योंकि मध्यप्रदेश सरकार के लोग भी उसमे शामिल थे। अब यदि सरकार के लोग उसमे शामिल हो, तो फिर उसी की एजेंसी के द्वारा जांच करवाने का क्या मतलब? हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि जांच अदालत की निगरानी में हो रही है, इसलिए प्रदेश सरकार उसे प्रभावित नहीं कर पाएगी। पर जिस तरह से एक के बाद एक हत्याएं हो रही हैं, उससे तो यही लगता है जांच को अंतिम निष्कर्ष पर तुरंत पहुंचाना चाहिए, अन्यथा मौतों का दौर जारी रहेगा और प्रत्येक मौत के साथ जांच प्रभावित होता रहेगा, क्योंकि आरोपियों की मौत होने से घोटाले की कड़ी टूटती है और गवाह की मौत के साथ केस भी मरने लगता है। जांचकत्र्ताओं की मौत के कारण अन्य जांच कर्मियों के हौसले पर उसका असर पड़ता है।
इसलिए जांच मजबूती से चले, इसके लिए जरूरी है कि सीबीआई की विशेष टीम से इन घोटालों की जांच हो और जांच की देखरेख सुप्रीम कोर्ट करे। मुख्यमंत्र्री िशवराज सिह को खुद इसकी सिफारिश करनी चाहिए, लेकिन वे इसका विरोध कर रहे हैं। सवाल उठता है कि यदि शिवराज सिंह निर्दोष हैं, तो फिर उन्हें सीबीआई जांच से डर क्यों लग रहा है। (संवाद)
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व्यापम घोटाले की सीबीआई जांच जरूरी
यदि निर्दोष हैं, तो चौहान को डर क्यों?
उपेन्द्र प्रसाद - 2015-07-06 16:19
मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापम) में हुए घोटाले की जांच जारी है और इस बीच उस घोटालों से जुड़े लोगों की मौत का सिलसिला भी जारी है। कभी इस घोटाले का आरोपी की मौत होती है, तो कभी किसी गवाह की मौत हो जाती है और कभी इसकी जांच में शामिल किसी शख्स की मौत हो जाती है। इन सबके बीच इस घोटाले से जुड़ी एक मौत की पड़ताल करने पहुंचे एक पत्रकार की भी मौत हो गई। ये सारी मौत में एक और चीज काॅमन है और वह यह है कि ये सारी की सारी अप्राकृतिक अकाल मौतें हैं। इनमें से कुछ को आत्महत्या का नाम दिया जा सकता है, तो कुछ को हम साजिशन हत्या की वारदात भी कह सकते हैं। अनेक कथित आत्महत्याओं से भी साजिश की बू आती है।