दोनों भाजपा नेताओं के खिलाफ अकाट्य प्रमाण आ चुके हैं और दोनों के भ्रष्ट आचरण पर अब किसी को किसी भी प्रकार का संदेह नहीं रह गया है। इसके बावजूद भाजपा का नेतृत्व यह कहते हुए अड़ा हुआ है कि उन दोनों नेताओं ने कोई गलती नहीं की। दोनों नेता पार्टी की इस बुरी हालत का फायदा उठा रही हैं और अपने अपने पदों से चिपकी हुई हैं।

भाजपा की इस बेवकूफी का एक कारण तो यह है कि उसके नेताओं को लग रहा है कि यदि विपक्ष और मीडिया के दबाव में उन्होंने सुषमा और वसुंधरा में से किसी एक को या दोनों को हटा दिया, तो यह माना जाएगा कि पार्टी कमजोर है और वह दबाव के सामने झुक गई है।। वे इस तरह का संदेश नहीं देना चाहते, क्योंकि वे नरेन्द्र मोदी के मजबूत नेतृत्व के अंदरद काम कर रहे हैं।

दूसरा कारण यह हो सकता है कि पार्टी को लगता है यदि उसने दोनों में से किसी एक महिला अथवा दोनों को हटा दिया, तो पार्टी के अंदर से इस तरह की और घटनाएं सामने आने लगेंगी। अंदरूनी राजनीति के कारण सत्ता के ऊचे पदों पर बैठे नेताओं के खिलाफ सत्ता से दूर पडे नेता सक्रिय हो जाएंगे और एक ऐसा सिलसिला शुरू हो जाएगा, जिसका सामना अमित शाह कर नहीं पाएंगे।

लेकिन ऐसा करके भारतीय जनता पार्टी बड़ा खतरा मोल ले रही है। यदि उसका नेतृत्व दोनों महिला नेताओं के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करता है तो आने वाला मानसून सेसन इसका शिकार हो सकता है। विपक्ष उसे चलने ही नहीं देगा और उसके कारण अनेक विधेयक धरे के धरे रह जाएंगे।

इसके कारा पार्टी आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को आगे नहीं बढ़ा पाएगी। भूमि अधिग्रहण कानून और वस्तु और सेवा कर से संबंधित विधेयकांें को पास करवाना केन्द्र सरकार की उच्च प्राथमिकता रही है।

अब यह भाजपा नेतृत्व को तय करना है कि वह दोनों नेताओं का त्याग करता है या आर्थिक सुधार कार्यक्रमों का। भारतीय जनता पार्टी को लगता है कि वह कांग्रेस की कमजोरियों के कारण गलती से 2014 में केन्द्र की सत्ता में आ गई है और वह अपने नेताओं की छंटनी करने की हिम्मत नहीं जुटा रही है।

भारतीय जनता पार्टी सत्ता में इसलिए आ सकी है, क्योंकि नरेन्द्र मोदी पूर्ववर्ती यूपीए सरकार की बेवकूफी को भुनाने में सफल हुए। यही कारण है कि वह केन्द्र से किसी मंत्री को हटाकर इसे अस्थिर करने का खतरा मोल नहीं लेना चाहती और न ही राजस्थान में राजनैतिक अस्थिरता को बढ़ावा देना चाहती है।

नरेन्द्र मोदी में पार्टी को एक ऐसा नेता दिखाई पड़ता है जो आने वाले दिनों में भी युवाओं को आकर्षित करते रहेंगे। लेकिन पार्टी में उनके विरोधियों की भी कमी नहीं है। आडवाणी जैसे बड़े मोदी विरोधी पार्टी में हैं और जो कभी भी सक्रिय होकर पार्टी का संतुलन बिगाड़ सकते हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अभी भी गुजरात के मुख्यमंत्री वाले तरीके से काम करना चाहते हैं। गौरतलब है कि गुजरात में कांग्रेस की ओर से उन्हें कोई चुनौती नहीं मिला करती थी और वे पार्टी के अंदर के अपने विरोधियों को एक के बाद एक दरकिनार करते चले गए।

पर उन्हें अब अहसास हो रहा है कि केन्द्र की राजनीति गुजरात की राजनीति से अलग किस्म की है। वहां वाला फार्मूला यहां काम नहीं करेगा। यहां विपक्ष ज्यादा तीखा है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में हार का सामना मोदी कर चुके हैं और इस तरह की हार का सामना उन्हें आगे भी करना पड़ सकता है। (संवाद)