शनिवार, 6 जनवरी 2007

गरीब-विरोधी रेलवे खान-पान प्रबंध नीति 2005

स्टेशनों से बाहर हो जायेंगे गरीब, अपंग, दलित और आदिवासी वेंडर

ज्ञान पाठक

भारत के रेलवे स्टेशनों पर सामान बेचकर आजीविका चलाने वाले गरीब वेंडरों की गर्दनें अब बलि के खूंटे पर रख दी गयी हैं। उन्हें नीतिगत सुधारों के नाम पर धनी ठेकेदारों से मुकाबला करने को विवश किया जा रहा है। स्वाभाविक तौर पर गरीब वेंडरों को अपने काम और आजीविका से हाथ धोना पड़ेगा।

इस नयी प्रणाली को लागू करने के पहले ही सरकार ने उनके लिए स्थितियां मुश्किल कर दी थीं, जबकि उनमें से अनेकों को अनुकंपा के आधार पर, शिक्षित बेरोजगारों को रोजगार देने की योजना के तहत, पूर्ववर्ती सेना के जवानों या उनके परिजनों को पुनर्वास योजना के तहत, या शारीरिक रुप से अपंग या अनुसूचित जाति और जनजाति की श्रेणी में छोटे-छोटे स्टाल या फेरी लगाने की अनुमति दी गयी थी। उनके लिए लाइसेंस फीस इस स्तर तक बढ़ाकर ऐसा किया जिसका भुगतान करने की क्षमता भी ये गरीब नहीं रखते। इससे स्टेशनों पर मूल्यवृद्धि के कारण गरीब यात्रियों की क्या दुर्दशा होगी, इसकी तो एक अलग ही कहानी है। कहना न होगा कि लाइसेंस फीस में ऐसी भारी वृद्धि बिल्कुल ही तर्कहीन ढंग से और बिना समुचित कारण के की गयी है। इस सुधारप्रिय सरकार का “असली मानवतावादी चेहरा” यही है, जो संसद और संसद के बाहर गरीबों के प्रति अपनी सदाशयता की चिकनी-चुपड़ी बातें करने में कभी पीछे नहीं रहती। सरकार ने जो कदम उठाये हैं वे उनके उनके आश्वासनों के ठीक विपरीत हैं।

जो लोग सत्ता में हैं या सत्ता में जिनकी पहुंच है उनकी धन की अत्यधिक लालसा ऐसे निर्णयों के मूल में है। वे किसी भी कीमत पर अधिक से अधिक धन एकत्रित करना चाहते हैं जिसकी अदायगी के लिए आम लोगों को मजबूर किया जा रहा है और वह भी मुट्ठी भर लोगों के पक्ष में। नीतियां बनायी जाती हैं और उनका उल्लंघन किया जाता है। आश्वासन किसी और दिशा में दिये जाते हैं और कार्रवाई किसी और दिशा में की जाती है। संक्षेप में रेल मंत्रालय यदि किसी नीति पर चलता हुआ दिखता है तो वह नीति है लोगों के आंखों में धूल झोंकने की नीति।

इसकी पुष्टि में अनेक उदाहरण गिनाये जा सकते हैं, लेकिन यहां दो-तीन उदाहरण देना ही काफी होगा। गरीब रथ का उदाहरण लीजिए, जिसमें गरीब सफर कर ही नहीं सकते क्योंकि उनके पास उतना किराया देने के लिए धन नहीं होता। गरीबों के नाम पर यह रथ धनी लोगों को सस्ती दरों पर यात्रा करवाती है। चुक्कड़ योजना हमारे गरीब कुम्भकारों के नाम पर शुरु की गयी लेकिन उन्हें सीधे रेलवे को अपने उत्पाद बेचने की अनुमति नहीं दी गयी। सिर्फ धनी व्यवसायियों को ही रेलवे को चुक्कड़ बेचने की सुविधा मिली। गरीब वेंडरों के वर्तमान मामले में भी रेल मंत्रालय उनके गरीब होने के कारण दंडित कर रहा है और इस क्रम में संसद की रेलवे संबंधी स्थायी समिति की अनुशंसाओं को भी दरकिनार कर दिया गया।

इस मामले में हो क्या रहा है उसपर एक नजर डालिए। रेल मंत्रालय ने सन् 2000 में एक नयी केटरिंग नीति लागू की थी। उस नीति के अनुसार सभी छोटे वेंडरों को छोटा ठेकेदार मान लिया गया। उसके बाद 2005 में एक और नीति आयी। इस नीति के बाद इनके लाइसेंस फीस काफी बढ़ा दिये गये। लेकिन इतने पर भी मंत्रालय को संतोष नहीं हुआ। नवंबर 2006 में फिर लाइसेंस फीस कई गुना बढ़ा दिये गये।

इस तरह दिल्ली रेलवे स्टेशन पर फलों के ताजा रस बेचने वाले एक स्टाल की फीस 1999 के 24,524 रुपये से बढ़कर नवम्बर 2005 में 28,032 रुपये और नवंबर 2006 में 2,40,000 रुपये हो गयी। नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर फलों की एक ट्रॉली की फीस 1999 के 4,120 से बढ़कर 2005 में 8,194 तथा 2006 में 1,44,000 रुपये हो गयी। सराय रोहिल्ला जैसे स्टेशन पर एक ट्रॉली की फीस 1999 के 2,160 से बढ़कर 2005 में 18,000 और 2006 में 75,000 रुपये कर दी गयी। पूरे देश भर के स्टेशनों पर ऐसे ही हालात पैदा किये गये हैं। उदाहरण के लिए ईटावा रेलवे स्टेशन पर चाय के एक स्टाल की फीस 1999 के 2,160 से बढ़ाकर 2005 में 30,000 और 2006 में 1,25,004 रुपये कर दी गयी है।

रेल मंत्रालय संसद को दिये गये अपने ही आश्वासनों का उल्लंघन करते हुए ऐसा कर रहा है। उसने संसद को आश्वासन दिया था कि ऐसे छोटे ठेकेदारों को नयी निविदा प्रणाली में शामिल नहीं किया जायेगा। जो भी हो, वे अनेकों से बड़े ठेकेदारों की तरह व्यवहार कर रहे हैं और नयी प्रणाली को इस ढंग से लागू कर रहे हैं कि कोई गरीब वेंडर स्टेशनों पर टिक ही नहीं पाये।

आश्चर्य है कि रेल मंत्रालय बारंबार दावा करता रहा है कि वह छोटे वेंडरों को लाइसेंस नवीनीकरण के माध्यम से रियायतें दे रहा है। लेकिन जिस ढंग से लाइसेंस फीस कई गुना बढ़ाये गये हैं वह “उच्चतम निविदा लाइसेंस फीस” के अलावा कुछ नहीं है।

फरवरी 2006 में संसद में पूछे गये एक सवाल के जवाब में रेल मंत्रालय ने कहा था कि छोटे वेंडरों को स्टेशनों से हटाने का कोई प्रस्ताव नहीं है। दिसंबर 2006 में लोक सभा में सांसद अजय चक्रवर्ती के पूछे गये एक सवाल के जवाब में रेल मंत्रालय ने कहा था कि लाइसेंस फीस वास्तविक बिक्री के आकलन, व्यवसाय की उपलब्धता और लाभ के आधार पर तय की जायेगी। लेकिन इस आश्वासन का भी घोर उल्लंघन किया गया।

श्री चक्रवर्ती को बाद में रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव को अलग से पत्र लिखकर इस प्रवृत्ति का विरोध करना पड़ा है। उन्होंने अपने पत्र में लिखा कि आईआरसीटीसी ने मनमाने ढंग से लाइसेंस फीस तीन से पांच गुना बढ़ा दिये हैं, जिसका न कोई तर्क है और न कोई कारण। वह आश्वासन और की गयी कार्रवाई से स्पष्टतः संतुष्ट नहीं हैं। उन्होंने अपने पत्र में लिखा कि “लगता है आईआरसीटीसी रेलवे बोर्ड के दिशा निर्देशनों को नहीं मान रही।”

गरीब-विरोधी रेलवे की इन नीतियों के खिलाफ अनेक आवेदन रेल मंत्रालय को दिये गये जिनपर कोई सुनवाई नहीं हो रही। ऐसे आवेदनों में एक आवेदन अखिल भारतीय रेलव खानपान लाइसेंसीज वेलफेयर एसोसिएशन का भी है।

लोक सभा में माकपा संसदीय दल के नेता और रेलवे विभाग संबंधी स्थायी संसदीय समिति के अध्यक्ष बासुदेव आचार्य ने भी बार-बार रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव को पत्र लिखकर ऐसी गरीब विरोधी नीतियों को रोकने की मांग की लेकिन अब तक कोई सार्थक कार्रवाई नहीं की गयी है। #