गुरुवार, 8 मार्च, 2007
हरियाणा में पंचायती राज, असंवैधानिक सरकारी गतिविधियां
श्रृंगारिक लीपापोती से गांवों की भलाई संभव नहीं
ज्ञान पाठक
नई दिल्ली: सारे देश की तरह हरियाणा में भी पंचायती राज के मामले में सरकार असंवैधानिक तौर तरीकों से चल रही है और स्वसरकार (तीसरे तृणमूल स्तर की सरकार) का बंटाधार किया जा रहा है, लेकिन जनता को लुभाने के लिए आकर्षक घोषणाएं की जाती हैं और पत्रकार सम्मेलनों में उन्हें इस ढंग से पेश किया जाता है मानो सरकार ने तीर मार लिया।
उदाहरण के लिए इसी सप्ताह प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में पत्रकारों से मिलिए कार्यक्रम के तहत आये हरियाणा के मुख्य मंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने अपनी सरकार के दो साल की उपलब्धियां गिनायीं, जिनमें पंचायती राज के मामले में उपलब्धियां शामिल हैं। बताया गया कि 73 वें संविधान संशोधन के अनुरुप पंचायती राज संस्थाओं को कई तरह के प्रशासनिक व वित्तीय अधिकार दिये गये। बताया गया कि पंचायती राज संस्थाओं को 10 प्रमुख विभागों के कार्य, अमले व निधि सहित सौंपने वाला हरियाणा देश का पहला राज्या है। और भी अनेक तथाकथित उपलब्धियां गिनायी गयीं जिनकी चर्चा से पहले कुछ बातों पर गौर फरमाना जरुरी है।
भारत की आजादी के बाद भी देश की जनता को स्वसरकार चलाने का कोई अधिकार हासिल नहीं था, लेकिन 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के बाद पहली बार यह अधिकार 1993 में हासिल हुआ, और 1994 से संविधान के अनुसार वे सभी कानून स्वत: समाप्त हो गये हैं, जो इनके अनुरुप नहीं हैं। लेकिन इतना कह देने मात्र से बात नहीं बनती। यदि और साफ-साफ कहें तो पहले जनता के प्रतिनिधियों के माध्यम से ही सरकार चलाने का कानून था लेकिन 1994 के बाद जनता तृणमूल स्तर पर जनता को अपनी सरकार सीधे चलाने का संवैधानिक अधिकार है। अर्थात यह कि ग्रमीण क्षेत्रों में गांव के स्तर पर और शहरी क्षेत्रों में वार्ड के स्तर पर 18 वर्ष के अधिक उम्र के सभी नागरिक ग्राम या वार्ड सभा के स्वाभाविक सदस्य होते हैं, और उन्हें अपने गांव और वार्ड के संबंध में निर्णय करने और निर्वाचित स्थानीय स्वसरकार (पंचायत सरकार) की सामाजिक समीक्षा करने का उसी तरह का अधिकार हासिल है जिस तरह हमारे सांसदों और विधायकों को संसद या विधान सभाओं में निर्णय करने और सरकार की गतिविधियों की समाजिक समीक्षा करने की है। तकनीकी समीक्षा के लिए जिस तरह से महालेखाकार और अंकेक्षक या अन्य सुविधाएं हैं, उसी तरह पंचायत और वार्ड स्तर पर भी तकनीकी विशेषज्ञों की व्यवस्था है।
दुर्भाग्य यह कि जनता को यह संवैधानिक अधिकार प्राप्त हुए 12 वर्ष से ज्यादा हो रहे हैं लेकिन हरियाण में भी यह अधिकार पूरी तरह जनता को नहीं सौंपा गया है। जो कानून 1994 में खत्म हो गये उन्हें सरकार लागू कर रही है और जो कानून संविधान के अनुसार अस्तित्व में है उन्हें लागू नहीं किया जा रहा है।
मुख्य मंत्री हुड्डा ने इस बात का प्रचार कर वाहवाही लूटने की कोशिश की कि पंचायती राज संस्थाओं को 10 प्रमुख विभागों के कार्य, अमले व निधि सहित सौंपने वाला हरियाणा देश का पहला राज्य है। लेकिन तब उन्होंने जो लिखित सामग्री पत्रकारों के बीच बंटवायी उसमें यह नहीं बताया गया कि संविधान के तहत अन्य 32 विभाग तृणमूल स्तर की स्वसरकारों को कब सौंपी जायेगी। ये विभाग नहीं सौंपने का असंवैधानिक कार्य हरियाणा में कब तक चलेगा। पुराने कानून जो संविधान के अनुसार समाप्त हो गये हैं, उन्हें ही लागू करने पर ही राज्य सरकार आमादा क्यों है।
हरियाणा की एक और समस्या यह है कि इन संवैधानिक पंचायतों से ज्यादा तरजीह असंवैधानिक पंचायतों को दी जाती है। विभिन्न जातियों की अलग-अलग पंचायतें हैं और वे अनेक बार विवादास्पद और गैरकानूनी निर्णय भी कर लेते हैं। लेकिन बदनामी होती है संवैधानिक रुप से गठित होने वाले पंचायतों की और लोग कहते सुने जाते हैं कि पंचायतें ठीक ढंग काम नहीं कर रही हैं या गलत ढंग से काम कर रही हैं। लेकिन कोई यह पूछता नजर नहीं आता कि संवैधानिक पंचायतों को ठीक ढंग से काम करने क्यों नहीं दिया जाता ? जब निर्णय करने का काम तृणमूल स्तर के पंचायतों का है, तो उन्हें धन और जन के अलावा विभाग भी क्यों नहीं सौंपे जा रहे तथा काम ठेकेदारों या गैर सरकारी संस्थानों (एनजीओ) के माध्यम से काम कराने में सरकार की ज्याद रुचि क्यों है? अनेक उदाहरण गिनाये जा सकते हैं जिनमें तृणमूल स्तर की स्वसरकारों को संवैधानिक अधिकार होते हुए भी, उनको बाइपास किया जाता है।
इस सब असंवैधानिक गतिविधियों को छिपाने की नीयत से हरियाणा की सरकार ने कुछ ऐसे राजनीतिक कदम उठाये हैं जिनसे असली बात छिप जाये और सरकार की वाह-वाही हो। पंचायतों को धन देने में देरी करना, उनकी योजनाओं की निर्णय प्रक्रिया में स्थानीय विधायकों और सांसदों के माध्यम से असंवैधानिक दखल देना आदि जारी है। राज्य सरकार की अनेक योजनाएं ऐसी हैं जो पंचायती राज प्रावधानों के खिलाफ हैं, क्योंकि जो काम पंचायती राज संस्थानों को करना है वह राज्य सरकार या केन्द्र सरकार कर रही है तथा पंचायतों को उनके काम करने का मौका भी नहीं दे रही। लेकिन राज्य सरकार को वाहवाही चाहिए जिसके लिए उसने अनेक कदम उठाये हैं। सरपंचों को अतिथि सत्कार के लिए 1000 रुपये प्रति माह देना, उनके पास नकद राशि रखने की सीमा 5000 रुपये से बढ़ाकर 10000 रुपये करना, जिला परिषद अध्यक्ष का मानदेय 4000 रुपये, उपाध्यक्ष का 3000 रुपये, तथा पंचायत समिति अध्यक्ष का 3000 रुपये करना शामिल है। सरपंचों और जिला परिषद सदस्यों का मासिक मानदेय भी 1000 रुपये कर दिया गया है। प्रखंड समितियों के सदस्यों को 500 रुपये और पंचायत सदस्यों को 200 रुपये देने की व्यवस्था की गयी है। चौकीदारों का मासिक भत्ता 1000 रुपये किया गया है। बताया गया कि गांवों के विकास के लिए राज्य सरकार और भी काफी कुछ कर रही है।
लेकिन ढाक के वही तीन पात वाली कहावत चरितार्थ है। राज्य सरकार अब भी ग्रामीण पंचायतों और शहरी निकायों, जैसे नगरपालिका, को तृणमूल स्तर पर लोकतंत्र की संवैधानिक व्यवस्था कायम करने के लिए न तो उनके सभी विभाग सौंपे हैं और न ही उनको देय धनराशि जिसपर संविधान के अनुसार उनका हक है। गांवों और शहरों की भलाई के नाम पर श्रृंगारिक लीपापोती हो रही है जिससे वास्तव में कोई भलाई नहीं है। प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन और कुशासन जनता झेलते आ रही है अब उन्हें अपना भविष्य संवारने का सीधा निर्णय करने का संविधान प्रदत्त अधिकार सौंप ही देना चाहिए, तथा राज्य सरकार को उनके विपरीत असंवैधानिक गतिविधियां चलाये रखने से परहेज करना ही चाहिए। #
ज्ञान पाठक के अभिलेखागार से
हरियाणा में पंचायती राज
System Administrator - 2007-10-20 05:59
सारे देश की तरह हरियाणा में भी पंचायती राज के मामले में सरकार असंवैधानिक तौर तरीकों से चल रही है और स्वसरकार (तीसरे तृणमूल स्तर की सरकार) का बंटाधार किया जा रहा है, लेकिन जनता को लुभाने के लिए आकर्षक घोषणाएं की जाती हैं और पत्रकार सम्मेलनों में उन्हें इस ढंग से पेश किया जाता है मानो सरकार ने तीर मार लिया।