भारत के प्रधान मंत्री एक लंबे समय से देश के विकास के नाम पर साहसिक कदा उठाते रहे हैं। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह भी उत्तर प्रदेश के विकास के नाम पर उन्हीं की नीतियों के अनुरुप साहसिक कदम उठाते रहे थे। अब राज्य की नयी मुख्य मंत्री मायावती भी उत्तर प्रदेश के विकास के लिए लगातार साहसिक कदम उठा रही हैं।
लेकिन तीनों नेताओं के साहसिक कदमों में फर्क है। जहां एक ओर मनमोहन सिंह ने खुलेआम देश में विकास की ऐसी योजनाएं बनवायीं और लागू कीं तथा लागू करवा रहे हैं जो मूलत: बहुस्तरीय अन्याय और शोषण के सिद्धांतों पर आधारित हैं। इसके कारण व्यक्ति का विकास पूरी तरह उसके पास उपलब्ध धन का समानुपाती बन गया है। अर्थात जो जितना धनी है उसे उतना ही लाभ मिल रहा है और जो जितना गरीब है वह उतना ही नीचे गिरता जा रहा है। इसी के आधार पर रियायते और सुविधाएं दी जाती रही हैं। जब भी वह देश के विकास के नाम पर कठोर कदम उठाने की बात करते हैं तो उसका अर्थ होता है आम आदमी से धन बटोरकर कुछ खास लोगों की झोलियों में डालना।
उदाहरण के लिए, वह जब कठोर कदमों की बात करते हैं तो जिनके पास कम धन है या नहीं के बराबर धन है उसको दी जाने वाली सबसिडियों और सुविधाओं में कटौती, उनको दी जाने वाली सेवाएं महंगी करना, उनको अधिक ब्याज दरों पर कर्ज देना और यहां तक कि परिवहन का किराया भी बढ़ाना ही उसका अर्थ होता है। फिर जब वह विकास की बात करते हुए कदम उठाने की बात करते हैं तो अरबपतियों को सबसिडी देना, उन्हें तरह-तरह को प्रोत्साहन देना, उन्हें अल्प ब्याज दरों पर कर्ज देना, उन्हें हर सुविधा कम मूल्य पर देना होता है। और बीच में आम आदमी पिसता चला जाता है।
यहां उत्तर प्रदेश की चर्चा चल रही है तो पिछले कार्यकाल में मुख्य मंत्री रहे मुलायम सिंह यादव की चर्चा तो करनी ही पड़ेगी। जब उन्होंने देखा कि केन्द्र सरकार ने पड़ोसी उत्तरांचल के लिए अन्याय और शोषण पर आधारित ऐसी ही एक योजना लागू की है जिसमें 100 करोड़ से ज्यादा का निवेश करने वाले उद्योगपतियों को पांच प्रतिशत सबसिडी देने, बिना ब्याज के कर्ज देने और परिवहन के लिए भी सबसिडी देने का प्रावधान किया गया था, तब उनका भी जी मचलने लगा। उनके और अमर सिंह के कई बड़े उद्योगपति मित्र हैं। उन्होंने सोचा कि क्यों न अपने मित्रों को इसी बहाने मालामाल कर दिया जाये। बस वे भूमिका बनाने लगे। कहने लगे कि उत्तर प्रदेश से उद्योगों के पलायन का खतरा है और बड़े उद्योगपति उत्तरांचल में मिलने वाले करोड़ों के फोकट में मिलने वाले लाभ के लिए वहां चले जायेंगे। फिर उन्होंने उत्तर प्रदेश के विकास के नाम पर योजनाएं बनवायीं और जितनी की जरुरत भी नहीं थी उतनी जनता की जमीनें छीनने का कठोर कदम भी उठाया। योजना के तहत जिन उद्योगपतियों को लाभ दिया गया वे सभी उनके मित्र हैं। राज्य में उन्हें 100 करोड़ से अधिक के निवेश पर पांच प्रतिशत की सबसिडी, बिना ब्याज के कर्ज और परिवहन सबसिडी देने का प्रावधान कर दिया गया।
इस स्थिति में गरीब व्यवसायियों और उद्योगपतियों, जो 100 करोड़ रुपये से कम का निवेश करने की ही क्षमता रखते हैं को ऐसी सुविघाएं न देने का सवाल उभरकर सामने आना लाजिमी था। विवेक तो यह है कि छोटी इकाइयों और छोटे व्यवसायों, गांवों में खेती से लेकर मिट्टी के बर्तन बनाने तक तथा कुटीर उद्योग से लेकर औद्योगिक ईकाइयां लगाने से रोजगार की संभावना भी ज्यादा हो और खुशहाली की भी। लेकिन न तो मनमोहन सिंह की सरकार और न ही मुलायम सिंह की पूर्व सरकार ने उन्हें बिना ब्याज कर्ज देने की हिम्मत दिखायी। सबसिडी और अन्य सुविधाओं में कटौती की धमकी अलग से। सवाल है कि अत्यंत धनवानों को ही बिना ब्याज कर्ज क्यों दिया जाये, उन्हें पांच प्रतिशत सबसिडी और अन्य सुविधाएं क्यों दी जायें विशेषकर वे जो हम उनसे कम धन वालों को नहीं देना चाहते। क्या यह सच नहीं कि ब्याज के बोझ में छोटे व्यवसायी और उद्योगपतियों से लेकर गरीब किसान और कारीगर तक बड़ी संख्या में इस देश में आत्महत्याएं कर रहे हैं? क्या यह सच नहीं कि धीरे - धीरे सुविधाएं कम कर स्थितियां जटिल कर देने के कारण लाखों छोटे उद्योग धंधे बंद हो गये और करोड़ो लोगों की रोजी - रोटी खत्म हो गयी?
आखिर अत्यंत धनवानो के पक्ष में और अन्य की कीमत पर बनायी गयी विकास की योजनाओं को क्यों नहीं रद्द किया जाना चाहिए। बहुस्तरीय अन्याय और शोषण पर आधारित विकास की योजनाओं के बदले देश में न्यायपूर्ण योजनाएं क्यों नहीं लागू की जानी चाहिए?
मायावती की सरकार ने ऐसी योजनाओं को रद्द कर ठीक ही किया। इस देश में ऐसी अन्यायपूर्ण विकास योजनाएं नहीं चाहिए।
लेकिन तब मायावती को और भी कदम उठाने होंगे ताकि उत्तर प्रदेश की जनता को नुकसान नहीं हो। केन्द्र सरकार अपनी नीतियों के माध्यम से अति धनवान लोगों से साठगांठ कर राज्य में निवेश का भट्ठा बैठाने की भरपूर कोशिण करेगी। ये अति धनी उद्योगपति राज्य में निवेश से परहेज भी कर सकते हैं। इसलिए मायावती को वैकल्पिक विकास की योजनाएं बनानी होंगी जिसमें 100 करोड़ से कम निवेश को प्रोत्साहन देकर उत्तर प्रदेश के चप्पे - चप्पे में छोटे - छोटे व्यवसायों और औद्योगिक इकाइयों का जाल बिछाया जा सकता है। इसमें रोजगार के अवसर भी ज्यादा होंगे और जनता खुशहाल हो जायेगी। यह चुनौतीपूर्ण कार्य करना समय की मांग है।
लेकिन एक आशंका भी है। मायावती एकाधिक बार कह चुकी हैं कि वह मुलायम सिंह का राजनीतिक भविष्य खत्म कर ही दम लेंगी। यदि उन्होंने राजनीति प्रतिशोध के कारण ही उनकी सभी योजनाओं को रद्द करने का बीड़ा उठाया है तो यह बहुत गलत बात होगी। इससे ऊपर उठकर उन्हें राज्य की जनता के लिए काम करना होगा जिन्होंने काफी मुद्दत के बात उनपर भरोसा कर उन्हें बहुमत से सत्ता मे बिठाया है।
मायावती को यह ध्यान में रखना ही होगा कि बहुस्तरीय अन्याय और शोषण पर आधारित देश की नीतियों, राजनीतिक और आर्थिक ही नहीं बल्कि सामाजिक भी, के परिणाम स्वरुप ही करोड़ों लोग भारी पीड़ा से गुजर रहे हैं। मायावती को खुद अपने जीवन से यह अनुभूति और विवेक हासिल करनी चाहिए और आगे जीवन में बेहतर कर दिखाना चाहिए उन नीतियों के तहत जो न्यायपूर्ण और शोषण तथा अत्याचार मुक्त हो।
जीवन के इस मोड़ पर मायावती जो राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक विवेक की झलक दे रही हैं वह सही अर्थों में हो न कि किसी 'ठग की रणनीति वाली राजनीति के तहत'।
उन्हें यह याद रखना होगा कि आज वह दो विकट स्थितियों के बीच में हैं। पहला यह कि अत्यंत धनवान और केन्द्र की सत्ता में बैठे लोगों के गिरोह के बीच में से उसे बचकर निकलना है और दूसरा यह कि कुख्यात राजनीति - अधिकारी - नेता गिरोह से उसे निपटना भी है। यदि वह दोनों गिरोहों का हिस्सा न बनकर जनता की हो जायें तभी उत्तर प्रदेश और इस देश का कल्याण होगा। सबको मालूम है कि दोनों गिरोहों के तत्व अतीत में उनके साथ उनकी बहुजन समाजवादी पार्टी में भी रहे हैं और आज भी हैं। इनसे भी बचकर उन्हें जनता का काम करना होगा, बत्तीस दांतों के बीच रहकर भी।
मायावती यदि व्यक्तिगत जीवन में कांसीराम जैसा हो सकीं तो सोने में सुहागा होगा। उनका धनी वर्ग की जीवन शैली का अनुकरण संकेत देता है कि वह कभी भी अत्यंत पतन के रास्ते का भी अनुगमन कर सकती हैं। यहीं जनता में शक पैदा होता है।#