संसद में भावनात्मक परिवेश से ग्रसित विपक्षी नेता कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के भाव भंगिमा से संसद की मर्यादा भंग होने का जहां तक प्रश्न है तो इस परिवेश के घेरे में अपनी नाटकीय भाव भंगिमा के कारण प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी की पृृष्ठिभूमि अग्रणी मानी जा सकती है। वे आज के समय में भाजपा नेता नरेन्द्र मोदी नहीं बल्कि देश के प्रधानमंत्री है। संसद में उनकी अभिव्यक्ति राजनीतिक दल के नेता के रूप में नहीं बल्कि प्रधानमंत्री के रूप में थी। इस वास्तविक तथ्य को सभी को समझना चाहिए कि पद की गरिमा के साथ अभिव्यक्ति का प्रसंग जुडा हुआ है।

इस तरह के उभरे परिवेश से संसद की मर्यादा भंग हुई हो या नहीं एक अलग बात है, विपक्षी नेता के रूप में राष्टीªय अध्यक्ष की छवि अवश्य घूमिल हुई है। राहुल गांधी को इस दिशा में अपनी सोच बदलनी होगी कि अब वे पप्पू नहीं , एक ऐसे राष्ट्रीय राजनीतिक दल कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर विराजमान है जिसकी वर्षो तक विरासत देश में कायम रही और आज भी इस पार्टी से देश के तमाम लोग जुड़े है , जिनकी आशाएं इस पार्टी से जुड़ी हुई है। राजनीतिक क्षेत्र में उतार - चढ़ाव तो आते ही रहते है। इतिहास इस बात का गवाह है कि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है, जिसके पैमाने में अपने आप को सर्वशक्तिमान समझने वाली ताकत को सŸाा विहीन होते देखा गया और संसद में मात्र दो सीट पाने वाले राजनीतिक दल को सŸाा के करीब आते देखा गया। वर्तमान परिवेश में नरेन्द्र मोदी को इस पद तक पहुंचाने में इस देश की जनता जनार्दन का ही हाथ है जिसने हर - हर मोदी , घर -घर मोदी का परिवेश उजागर किया । जिसकी वजह से एक बार फिर से देश का राजनीतिक परिवेश बदल गया। जिस श्रीमती सोनिया गांधी को देश की जनता द्वारा जनमत देने के वावजूद भी विपक्ष द्वारा विदेशी नागरिकता की प्रासंगिकता उभार कर सŸाा से दूर रखने का प्रयास किया गया, उसी श्रीमती सोनियां गांधी के नेतृृत्व में कांग्रेस पार्टी ने एक दशक लगातार शासन किया। इस दौरान श्रीमती सोनिया गांधी सर्वशक्तिमान कांग्रेस नेता के रूप में उभर कर सामने भी आई। राहुल गांधी उसी कांग्रेस के अध्यक्ष पद को सुशोभित कर रहे है जिस पद पर कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता विराजमान रहे, जिनके नेतृृत्व में कांग्रेस ने वर्षो शासन किया । आज देश के विकास में कांग्रेस पार्टी का जो योगदान है उसे नकारा नहीं जा सकता । यह कहना आसान है कि कांग्रेस ने 6 दशकों के शासनकाल में क्या किया ? इस तरह के विचार विपक्षीय पृृष्ठिभूमि में आम जनमानस को भ्रमित करने के लिये अवश्य घूम सकते है पर वास्तविकता को नहीं नकार सकते।

वर्ष के अंत में देश के चार राज्यों में विधान सभा चुनाव होने वाले है जिनमें तीन हिन्दी प्रदेश राज्य राजस्थान, मध्यप्रदेश एवं छŸाीसगढ़ काफी महत्वपूर्ण है, जहां वर्तमान में भाजपा सŸाा है। इन तीन राज्यों के चुनाव पर विशेष रूप से आगामी लोकसभा का भविष्य टिका हुआ है जिसे प्रायः सभी राजनीतिक दल अच्छी तरह से जानते है। भाजपा अभी से इन तीनों राज्यों में अपने वर्चस्व को बनाये रखने की प्रक्रिया में सक्रिय हो चली है। कांग्रेस के लिये इन तीनो राज्यों पर अपने वजूद को कायम करने की सबसे बड़ी चुनौती है। यदि कांग्रेस इन तीनों राज्यों में अपना परचम लहरा पाई तो आगामी लोकसभा की तस्बीर कुछ और हो सकती है । कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में इन तीनो राज्यों में अपने तेज तर्रार अभिव्यक्ति से सत्ता पक्ष पर वार करते हुए कांग्रेस का परचम लहराने की दिशा में राहुल गांधी के लिये सबसे बड़ी चुनौती है। वर्तमान तेवर एवं अभिव्यक्ति की दिशा में बदलाव लाकर इस दिशा में सफलता पाई जा सकती है। जिसके लिये अपने पूर्वजों से सीख लेना लाभप्रद हो सकता है। वर्तमान में कांग्रेस के परिवेश में काफी बदलाव आ चुका है। कांग्रेस के वोट बैंक पर आज देश के क्षेत्रीय दलों का कब्जा हो चुका है जिसे अलग कर पाना मुश्किल है। वर्तमान सत्ता पक्ष हर मोड़ पर अपने तरीके से प्रहार कर कांग्रेस को कमजोर करने में सक्रिय दिखाई दे रहा है। इस तरह से उभरे परिवेश में युवा अध्यक्ष के प्रति जहां आतंरिक विरोध भी पनप रहा हो, सामने सत्ता पक्ष का प्रहार हो रहा हो कांग्रेस के ववजूद को कायम करने की सबसे बड़ी चुनौती वर्तमान में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के कंधे पर है। जिसे वे अपने भावनात्मक हरकतों को छोड़ ,चाटुकारिता से अपने दुर कर, पूर्व नेताओं को संग रखते हुए गंभीर, तेज तर्रार प्रहार से सफलता पा सकते है। गुजरात चुनाव के दौरान राहुल गांधी की पृृष्ठिभूमि एक बेहतर नेता के रूप में उभरी थी जहां वे कांग्रेस को पहले से बेहतर परिणाम देने में सफल साबित हो सके थे। अब वे किसी के पप्पू नहीं , देश के सबसे बडे राष्ट्रीय राजनीतिक दल कांग्रेस के राष्टीªय अध्यक्ष है। इस तथ्य को राहुल गांधी को समझना होगा तभी कांग्रेस को उबारने में सफल सिद्ध हो सकेंगे। (संवाद)