एक ओर जहां कांग्रेस व तृणमूल कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने इसी बहाने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, वहीं भाजपा इस मामले में फूंक-फूंककर कदम रख रही है क्योंकि इसके राजनीतिक प्रभाव के साथ-साथ भारत-बांग्लादेश के आपसी रिश्तों पर भी इसकी आंच आ सकती है। संभवतः यही कारण है कि सरकार द्वारा स्पष्ट किया जा रहा है कि जिन 40 लाख लोगों के नाम एनआरसी मेें नहीं हैं, उन्हें अपनी नागरिकता साबित करने के पर्याप्त अवसर दिए जाएंगे और पुष्ट प्रमाण न मिलने पर ऐसे लोग भारत के नागरिक नहीं माने जाएंगे लेकिन सरकार उनके खिलाफ बलपूर्वक कोई कार्रवाई नहीं करेगी और न ही उन्हें विदेशी घोषित किया जाएगा।

उल्लेखनीय है कि असम में एनआरसी का मसौदा उच्चतम न्यायालय की निगरानी में तैयार हो रहा है। अदालत ने 17 दिसम्बर 2014 को इसे अपडेट तथा प्रकाशित करने की समय सीमा तय की थी, जिसकी अंतिम सूची एनआरसी से बाहर रह गए 40 लाख लोगों के दावों और आपत्तियों के निपटान के बाद इस साल के अंत तक आने की संभावना है। बता दें कि एनआरसी एक ऐसी सूची है, जिसमें असम में रहने वाले उन लोगों के नाम दर्ज हैं, जिनके पास 24 मार्च 1971 तक अपने परिवार के असम में होने के प्रमाण हैं, ऐसे लोगों को ही भारत का नागरिक माना गया है। 1951 में कांग्रेस सरकार ने नागरिकों का डाटा रखने के लिए एनआरसी बनाया था। वैसे देश की आजादी के इतने सालों बाद तक असम ही देश का एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां नागरिक रजिस्टर की व्यवस्था है।

1979 में असम में अवैध प्रवासियों के खिलाफ हिंसक आन्दोलन शुरू हो गए थे और कई वर्षों के संघर्ष के बाद 1985 में राजीव गांधी के शासनकाल के दौरान सरकार और आॅल असम स्टूडेंट्स यूनियन के बीच असम समझौते पर सहमति बनी थी, जिसमें राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण अद्यतन किए जाने का उल्लेख था। असम समझौते के तहत 24 मार्च 1971 तक भारत आए लोगों को ही यहां का नागरिक माना गया, 1951 से 1961 के बीच प्रदेश में आए लोगों को पूर्ण नागािरकता तथा वोट देने का अधिकार मिला जबकि 1961 से 1971 के बीच आए लोगों को नागरिकता के साथ अन्य अधिकार तो मिले किन्तु वोट देने का अधिकार नहीं दिया गया।

2005 में केन्द्र और असम सरकार के बीच भी समझौता हुआ, जिसके बाद सरकार ने असम के कुछ जिलों में एनआरसी को अपडेट करने का कार्य शुरू किया किन्तु प्रदेश में हिंसा का दौर शुरू होने के बाद यह प्रक्रिया रोक दी गई थी। अंततः 2009 में एक एनजीओ ‘असम पब्लिक वर्क’ ने इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की, जिसके बाद अब कोर्ट कीं निगरानी में ही एनआरसी अपडेट का कार्य हो रहा है।

एनआरसी में 40 लाख लोगों के नाम न होने के बाद बहुत से लोगों के मन में अब यह प्रश्न उमड़ रहा है कि आखिर असम में एनआरसी अपडेट करने की जरूरत क्यों पड़ी? दरअसल असम में पिछले कुछ दशकों में मुस्लिमों और मतदाताओं की संख्या जिस प्रकार अप्रत्याशित रूप से बड़ी तेजी से बढ़ी, उसे लेकर लंबे समय से विवाद खड़ा होता रहा है। आंकड़ों पर नजर डालें तो चैंकाने वाली तस्वीर सामने आती है। 1971 से 1991 के बीच ही प्रदेश में मतदाताओं की संख्या में 89 फीसदी और 1991 से 2011 के बीच 53 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। 1951 से लेकर अब तक असम की जनसंख्या में 4 गुना से भी अधिक की बढ़ोतरी हो चुकी है। 1951 में प्रदेश की आबादी 80.3 लाख थी, जो अब करीब 3.30 करोड़ हो चुकी है और आबादी बढ़ने की यह रफ्तार 1971 के बाद से ही काफी तेज है।

1971 तक प्रदेश में कुल 6268273 मतदाता थे किन्तु 1971 से 2011 के बीच करीब सवा करोड़ मतदाता और जुड़ गए और 2011 तक मतदाताओं की संख्या 18188269 हो गई। ढुबरी, मोरीगांव, गोलपाड़ा, दर्रांग, नोगोंग, करीमगंज, हैलाकंडी, बरपेटा, बोगलगांव, कछार, धेमाजी, कामरूप, कर्बी अंगलांग, लखीमपुर इत्यादि राज्य के 14 जिले तो ऐसे हैं, जहां जनसंख्या में वृद्धि का औसत राज्य की औसत वृद्धि दर से काफी ज्यादा है। प्रदेश में मतदाताओं तथा आबादी के तेजी से बढ़ने का एक बड़ा कारण अवैध रूप से भारत आए बांग्लादेशी नागरिक माने जा रहे हैं। राज्य के दर्जनभर जिलो में मुस्लिम आबादी 20 फीसदी से भी अधिक है। 126 विधानसभा सीटों में से 40 पर बांग्ला भाषी मुस्लिम मतदाताओं की तादाद बहुत ज्यादा है और दो दर्जन से अधिक सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। धुबरी, बरपेटा, करीमगंज, मंगलदोई, नोगोंग, सिलचर इत्यादि 14 में से 6 लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम तथा अप्रवासी मतदाताओं का वर्चस्व है।

कुछ माह पूर्व सेना प्रमुख बिपिन रावत ने एक सेमिनार में असम में बांग्लादेशी घुसपैठ और एक राजनीतिक पार्टी के चंद वर्षों में तेजी से हुए उभार को लेकर बयान दिया था, जिसे लेकर बवाल मच गया था। असम के कुछ जिलों में मुस्लिम जनसंख्या में वृद्धि की खबरों का हवाला देते हुए बदरूद्दीन अजमल की पार्टी ‘आॅल इंडिया यूनाइटेड डेमोेटिक फ्रंट’ (एआईयूडीएफ) की चर्चा करते हुए सेना प्रमुख ने कहा था कि राज्य में इस पार्टी का उभार देश में भाजपा के विकास से भी अधिक तेज गति से हो रहा है। उन्होंने कहा था कि 1984 में भाजपा को सिर्फ दो सीटें मिली थी और उसे उभरने में वर्षों लग गए लेकिन असम में ‘एआईयूडीएफ’ एक ऐसी पार्टी है, जो बहुत ही कम समय में उभर गई और उसकी ताकत बढ़ने की रफ्तार भाजपा से भी ज्यादा है। दरअसल बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है, ऐसे में सेना प्रमुख की चिंता वाजिब थी।

वर्ष 2005 में असम में मौलाना बदरूद्दीन अजमल ने एक क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी ‘एआईयूडीएफ’ का गठन किया था, जिसकी प्राथमिकता ही राज्य में मुस्लिमों की आवाज बनना रहा है। महज 12 वर्षों में यह पार्टी असम की प्रमुख विपक्षी पार्टी बन गई, जिसने 2016 में 126 सदस्यीय विधानसभा में 13 विधानसभा सीटें जीतने के अलावा 2014 के लोकसभा चुनाव में भी 3 सीटें जीतने में सफलता पाई लेकिन यह तस्वीर का सिर्फ एक पहलू है। तस्वीर का दूसरा बदरंग पहलू यह है कि बदरूद्दीन अजमल पर बांग्लादेशी घुसपैठियों को संरक्षण और पनाह देने के तथा असम में रोहिंग्या मुसलमानों को बसाने के आरोप अक्सर लगते रहे हैं और उन्हीं की बदौलत पार्टी ने असम में इतने कम समय में इतनी ताकत हासिल कर ली।

बदरूद्दीन आज असम की राजनीति में महत्वपूर्ण किरदार है तो सिर्फ इन घुसपैठियों की ही बदौलत। आज असम में आबादी के समीकरण तेजी से बदल रहे हैं, वहां के 9 जिलों में बांग्लादेशी घुसपैठियों का वर्चस्व है, जिनके आधार कार्ड व मतदाता पहचानपत्र बनाकर उन्हें बाकायदा वहां का नागरिक बनाने की कोशिशें की गई हैं। बहुत ही कम समय में असम में मुस्लिम आबादी 31 प्रतिशत से बढ़कर 42 प्रतिशत हो गई है। क्या ऐसे में यह जानने की आवश्यकता महसूस नहीं की जानी चाहिए कि यह सब किस षड्यंत्र के जरिये संभव हो रहा है?

बहरहाल, जिन 40 लाख लोगों के नाम एनआरसी में नहीं हैं, उनमें से बहुत सारे ऐसे ही बांग्लादेशी घुसपैठिये और रोहिंग्या हैं, जो कि देश की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन रहे हैं लेकिन इनमें कुछ ऐसे लोग भी शामिल हैं, जो बीते कुछ दशकों में मजदूरी या खेती-बाड़ी के कार्यों के लिए भारत के ही दूसरे राज्यों से आकर यहां बस गए, जिनके पास यहां का पहचान का कोई दस्तावेज नहीं है। दरअसल कटु सत्य यही है कि कुछ वर्ष पूर्व तक आम आदमी पहचान के लिए ऐसे किसी दस्तावेज की जरूरत ही महसूस नहीं करता था। हालांकि ऐसे लोगों को यह विकल्प दिया गया है कि ऐसे दस्तावेज प्रस्तुत करें, जिससे यह साबित हो सके कि उनके पूर्वज देश के किसी अन्य राज्य के निवासी थे लेकिन यह कार्य इतना आसान नहीं क्योंकि लोग भले ही इस प्रकार के दस्तावेज जमा करा दें किन्तु अन्य राज्य सरकारें ऐसे तमाम लोगों के दस्तावेजों की त्वरित जांच कर उनकी रिपोर्ट भेज देंगी, इसकी संभावना कम ही है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में एनआरसी के जरिये बांग्लादेशी घुसपैठियों और अप्रवासियों की पहचान करना बहुत जरूरी हो गया है लेकिन केन्द्र को सुप्रीम कोर्ट की सहमति से कोई ऐसी व्यवस्था भी करनी चाहिए, जिससे जो व्यक्ति वास्तव में भारतीय नागरिक हैं, वे आसानी से अपनी पहचान साबित करने में सफल हो सकें। (संवाद)