राष्ट्रीय अध्यक्ष अमीत शाह द्वारा प्रस्तावित 14 राज्यों में राजस्थान , मध्यप्रदेश, छŸाीसगढ़ एवं मिजोरम राज्य के विधानसभा चुनाव इसी वर्ष के अंतराल में नवम्बर- दिसम्बर माह में होने वाले है, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिसा, अरूणाचल प्रदेश एवं सिक्किम के चुनाव आगामी वर्ष 2019 में लोकसभा के साथ तथा हरियाणा, महाराष्ट्र व जम्मू - कश्मीर के चुनाव लोकसभा चुनाव के 6 माह बाद होने वाले है। इन राज्यों में राजस्थान , मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, महाराष्ट्र में भाजपा की ही सरकार वर्तमान में है एवं बिहार में जदयू के साथ मिलकर भाजपा की सरकार फिलहाल कार्यरत है। जहां विधानसभा पहले ही भंग कर लोकसभा के साथ चुनाव कराये जाने संभावना की जा रही है। लोकसभा चुनाव के साथ राज्यों के विधानसभा चुनाव कराये जाने के पक्ष में विपक्ष के अधिकांश राजनीतिक दल भी नहीं है। इस तरह के परिवेश के पीछे निश्चित तौर पर सŸाा पक्ष की राजनीतिक चाल समाहित हो सकती है। जहां लोकसभा से पूर्व हो रहे विशेष रूप से भाजपा शासित राजस्थान, मध्यप्रदेश, छŸाीसगढ़ राज्यों के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक परिवर्तन की हो रही चर्चा से मन में कहीं न कहीं सŸाा से दूर होने का भय बना हुआ है। लोकसभा से पूर्व हो रहे विधानसभा के चुनाव आगामी चुनावों की दृृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माने जा रहा है। यदि इन चुनावों में भाजपा सŸाा से दूर हो जाती है तो इसके प्रतिकूल प्रभाव आगामी चुनावों पर भी पड़ सकते है। जिसमें इस वर्ष के अंतराल में होने वाले विधानसभा चुनाव के तुरन्त बाद ही आगामी वर्ष 2019 के प्रारम्भ में ही लोकसभा चुनाव होने वाले है जहां फिर से नरेन्द्र मोदी के नेतृृत्व में भाजपा केन्द्र की सŸाा में वापिस आने की पूरी उम्मीद लगाये बैठी है।

इस तरह के परिवेश में वर्तमान में हो रहे राज्यों के विधानसभा चुनाव में हिन्दी भाषित राजस्थान, मध्यप्रदेश, छŸाीसगढ़ राज्यों के विधानसभा चुनाव काफी महत्व रखते है। पर्दे में रहने दो, पर्दा न उठाओं वरना भेद खुल जायेगा ! यह प्रसंग बदलते वर्तमान राजनीतिक परिवेश एवं सŸाा पक्ष भाजपा की रणनीति का प्रमुख भाग बना दिखाई देता है जहां वह लोकसभा से पूर्व होने वाले विधान सभा चुनावों के परिणाम को लेकर सर्वाधिक रूप से सशंकित है। अभी हाल ही में इन राज्यों में सर्वाधिक चर्चित दैनिक समाचार पत्र भास्कर ने अपने सर्वे में लोकसभा चुनाव से पूर्व वर्तमान में हो रहे विधानसभा चुनावों में सŸाा परिवर्तन की झलक दिखाते हुए कांग्रेस की बढ़त बताई है। इस तरह के सर्वे सतही धरातल पर सही तो नहीं माने जा सकते पर वर्तमान सŸाा पक्ष के लिये चिंता का विषय अवश्य बन सकते है। वैसे भी इन राज्यों के सरकार के हालात जनमत के खिलाफ ही नजर आ रहे है। अंतिम समय में इन राज्यों की सरकारें आम जनमानस को अपनी ओर आकर्षित करने की भरपूर कोशिश कर तो रही है पर इस प्रयास में वह कहां तक सफल हो पायेगी , यह कह पाना फिलहाल मुश्किल है। इधर देशभर में विपक्ष सŸाा पक्ष के खिलाफ एकजुट होकर आमचुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है। विपक्ष की इस एकजुटता को आमचुनाव में कितना जनसमर्थन मिल पाता है, यह तो एक अलग बात है पर विगत हुए उपचुनावों में विपक्ष की एकता को जो सफलता मिली , उससे भी सŸाा पक्ष चिंतित अवश्य है। मोदी लहर को जो आम जनसमर्थन पूर्व के लोकसभा चुनाव एवं विधानसभा चुनाव के दौरान मिला, उसका ग्राफ कम होता नजर आ रहा है। इस तरह के बदलते परिवेश आगामी चुनावों को प्रभावित कर सकते है, जहां वर्तमान में लोकसभा चुनाव से पूर्व भाजपा शासित राजस्थान, मध्यप्रदेश एवं छŸाीसगढ़ राज्यों के विधानसभा के चुनाव होने जा रहे है जिसके परिणाम लोकसभा चुनाव एवं विधानसभा चुनावों को प्रभावित कर सकते है। इधर सŸाा पक्ष से तेलंगाना का राजनीतिक दल एवं उड़ीसा का बिजू जनता दल, महाराष्ट्र का प्रमुख राजनीतिक दल शिव सेना भी नराज चल रहा है, जहां चुनाव लोकसभा के साथ होने है। इस तरह के परिवेश लोकसभा चुनाव को प्रभावित कर सकते है।

अभी हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त ओ पी रावत ने भी लोकसभा के चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव एक साथ कराये जाने के परिवेश को नकारते हुए कहा कि संविधान में संशोधन के बिना यह संभव नही। जहां विपक्ष इस मुद््दे पर सहमत नहीं , संविधान में संशोधन कर पाना भी संभव नहीं दिखता। फिलहाल लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव कराने जाने की प्रासंगिकता कहीं से भी नजर नहीं आ रही है। (संवाद)