अब इसी गठबंधन मे उपेन्द्र कुशवाहा को शामिल करने के लिए भी राजद नेता लालायित हैं। उन्हें लगता है कि कुशवाहा के आने से उनकी जाति के लोग भी राजद के समर्थक बन जाएंगे, हालांकि बिहार का इतिहास कुछ और ही कहता है। उपेन्द्र कुशवाहा नीतीश से अलग होने के बाद एक बार राजद में भी शामिल हुए थे, लेकिन उनके कारण उनकी कोयरी जाति के लोग राजद के साथ नहीं गए। दरअसल, बिहार के कोयरियों और यादवों के बीच सामाजिक संबंध खराब हो चुके हैं और उन दोनों के बीच यादव नेतृत्व में एकता लगभग असंभव है। यही कारण है कि उपेन्द्र कुशवाहा ने जब राजद का दामन थामा, तो कुशवाहा की अपना राजनैतिक कैरियर ही समाप्त होने लगा था। फिर बाद मे झख मारकर उन्हें नीतीश की शरण में आना पड़ा। नीतीश ने उन्हे राज्यसभा मे भेजकर उनकी समाप्त होती राजनीति को नया जीवन दिया।
नीतीश का दुबारा साथ छोड़कर उपेन्द्र कुशवाहा ने एक अलग पार्टी बना ली। नीतीश से पहली बार अलग होकर भी कुछ दिनो तक उन्होंने अलग पार्टी बना रखी थी और उसके चुनाव चिन्ह पर चुनाव भी लड़ा था, लेकिन उनकी पार्टी के उम्मीदवारों की कहीं भी जमानत बचाने लायक वोट नहीं मिले। खुद उनकी अपनी जमानत भी जब्त हो गई थी। चैतरफा विफलता के बाद वे बिहार के राजनीति के हाशिए पर से भी बाहर हो गए थे, लेकिन इस बीच भारतीय जनता पार्टी ने उनको गोद ले लिया। 2014 के चुनाव में उनकी पार्टी को तीन लोकसभा क्षेत्र दे दिए, जहां से उनके तीनों उम्मीदवार जीत गए। नरेन्द्र मोदी की आंधी मे वे खुद भी जीत गए और मंत्री भी बन गए। उसके बाद उनकी अपनी जाति में लोकप्रियता भी बढ़ गई।
लेकिन उपेन्द्र कुशवाहा की लोकप्रियता का भाजपा को 2015 की बिहार विधानसभा मे कोई फायदा नहीं हुआ। उनकी जाति के लोगों ने भाजपा गठबंघन को नहीं, बल्कि नीतीश-लालू के महागठबंधन को ही ज्यादातर वोट दिए। उसका कारण ऐन चुनाव के समय मोहन भागवत द्वारा आरक्षण की समीक्षा करने को लेकर दिया गया बयान था। 2015 के विधानसभा चुनाव ने यह साबित कर दिया कि उपेन्द्र कुशवाहा भले ही अपनी जाति के लोगों में लोकप्रिय हों, लेकिन वे अपनी जाति का वोट न तो अपनी पार्टी के उम्मीदवारों को दिलवा सकते हैं और न ही अपने सहयोगी दलों को। यही कारण है कि बिहार विधानसभा के चुनाव में उनकी पार्टी के मात्र दो उम्मीदवार ही जीत पाए थे। संयोग से उनकी पार्टी के तीन लोकसभा सदस्यों मे से एक अब उनकी पार्टी से अलग हो चुके हैं और लोकसभा में भी उनके साथ दो ही सांसद रह गए हैं।
उपेन्द्र कुशवाहा के दो ही विधायक बिहार विधानसभा मंे हैं, लेकिन वे मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पालते हैं। उनकी इस महत्वाकांक्षा के रास्ते में नीतीश कुमार रोड़ा बने हुए हैं। वे भाजपा के मोर्चे मंे शामिल हैं और यही बात कुशवाहा को खटक रही है। विधानसभा का चुनाव तो बाद में होगा, पहले चुनाव लोकसभा का होगा और लोकसभा में ज्यादा से ज्यादा सीटें पाने के लिए नीतीश भारतीय जनता पार्टी पर दबाव बना रहे हैं। मंत्री बनने के बाद उपेन्द्र कुशवाहा अपनी जाति के मतदाताओं में ज्यादा लोकप्रिय हुए हैं। उनसे राजनैतिक रूप से भी ज्यादा लोग अब जुड़ गए हैं। इसलिए उनको लगता है कि 2014 में मिली तीन सीटों से ज्यादा सीटें इस बार मिलनी चाहिए, पर उन्हें यह डर है कि उन्हें मात्र दो सीटें ही भाजपा की ओर से आॅफर किए जाएं। तीसरी जहानाबाद सीट से उनकी पार्टी पर चुनाव जीते अरुण कुमार अब उनके राजनैतिक दुश्मन बन गए हैं और अगले चुनाव में उनकी पार्टी के चिन्ह पर नहीं लड़ेंगे।
जाहिर है, उपेन्द्र कुशवाहा को दो से ज्यादा सीटें भाजपा नहीं देंगी और नीतीश कुमार को दो से तो ज्यादा ही सीटें मिलेंगी, हालांकि नीतीश अपनी पार्टी के लिए अभी 25 सीटें मांग रहे हैं, जो हास्यास्पद है, लेकिन 12 से 15 सीटें भी नीतीश कुमार के लिए सम्मानजनक मानी जाएगी। दूसरी तरफ भाजपा के लोग नीतीश कुमार को 8 से ज्यादा सीटें देने को तैयार नहीं हैं। लेकिन यदि नीतीश की पार्टी को 8 सीटें भी मिल जाती हैं, तो यह उपेन्द्र कुशवाहा को नागवार गुजरेगा। इसके कारण बाद में होने वाले विधानसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे के दौरान उनकी मोलतोल की ताकत बहुत ही घट जाएगी और हो सकता है नीतीश कुमार उनको राजग से बाहर करने का ही दबाव न बना दें।
यही कारण है कि उपेन्द्र कुशवाहा भाजपा को धमकी दे रहे हैं कि वे उसका साथ छोड़कर राजद के साथ जा सकते हैं। यदि वे चाहें, तो जा भी सकते हैं, लेकिन वे वैसा करने से डरते भी हैं, क्योंकि उनकी जाति के मतों को राजद के उम्मीदवारों को ट्रांसफर करवाने की क्षमता उनमें नहीं है। हां, वे ऐसा करवा सकते हैं, लेकिन इसके लिए राजद को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार उपेन्द्र कुशवाहा को प्रोजेक्ट करना पड़ेगा, लेकिन इसके लिए लालू कतई तैयार नहीं हैं।
दूसरी बात यह है कि राजनीति का यह सारा प्रपंच सत्ता के लिए ही होता है और वे केन्द्र सरकार में मंत्री पद छोड़कर विपक्षी के खेमे में क्यों शामिल होेगे। जाहिर है कि न तो कहीं खीर पक रही है और न ही कहीं खिचड़ी। कुशवाहा के लिए भाजपा के आंचल मंे छिपे रहना ही सबसे बेहतर विकल्प है। (संवाद)
बिहार राजनीति
कुशवाहा के पास भाजपा से बेहतर विकल्प नहीं
उपेन्द्र प्रसाद - 2018-08-28 11:40
बिहार में राजनैतिक गठजोड़ आने वाले दिनों मे कौन सा रूप लेगा, इसके बारे में तरह तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। राजनैतिक पर्यवेक्षक राजनेतओं के बयाने मे उस गठजोड़ की झलक देखना चाहते हैं और अपने अपने तरीके से उनका विश्लेषण करते हैं। इस समय उपेन्द्र कुशवाहा की राजनीति को लेकर तरह तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। वैसे बहुत पहले से यह चर्चा चल रही है कि वे भारतीय जनता पार्टी का साथ छोड़कर राष्ट्रीय जनता दल में शामिल हो सकते हैं। राजद भी यही चाहता है कि कुशवाहा उनके नेतृत्व वाले कथित महागठबंधन में शामिल हो जाए। वैसे वह तथाकथित महागठबंधन तीन पार्टियों का गठबंधन है, जिसमें राजद ही बड़े जनाधार वाला एक दल है। कांग्रेस के पास बिहार में अब अपना कोई जनाधार नहीं है। जीतन राम मांझी का कथित महादलित आधार पूरी आबादी का एक फीसदी भी नहीं होगा।