राहुल गांधी की भोपाल में आयोजित रोड शो करीब चार घंटे तक चली। इसे कांग्रेस ने संकल्प यात्रा का नाम दिया था। इस रोड शो के बाद प्रदेश भर से आए कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ राहुल गांधी ने संवाद किया। यद्यपि यह एक आम सभा के रूप में ही दिखाई दिया। लेकिन इस यात्रा और संवाद कार्यक्रम ने प्रदेश के कांग्रेसियों में उत्साह भर दिया। राहुल गांधी ने अपने भाषण में प्रदेश सरकार के साथ-साथ केन्द्र सरकार को भी घेरने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि यहां पर आपके मुख्यमंत्री ने 20,000 अलग-अलग वायदे किए हैं, लेकिन मध्यप्रदेश में रोजगार नहीं दे पा रहे हैं। मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार आएगी तो चाहे व्यापम के चोर हों या ई-टेंडरिंग के चोर हों, उनको हम विजय माल्या की तरह भागने नहीं देंगे। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि मध्यप्रदेश सबसे आगे निकल गया है - बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, बलात्कार, शोषण में नंबर वन बन गया है। उधर प्रधानमंत्री जी घोषणा करते हैं, खोखले वायदे करते हैं। वो वहां कहते हैं और यहां रिपीट होता है। उन्होंने काले धन, माल्या के लंदन भागने, राफेल डील सहित कई मुद्दों पर केन्द्र सरकार को घेरा। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस एक होकर लड़ेगी और बीजेपी को हराकर रहेगी।

प्रदेश में बदलाव के लिए अनुकूल समय है। कई मोर्चे पर राज्य सरकार फेल है, तो कई मोर्चे पर केन्द्र सरकार। ऐसे में कांग्रेस का एक गंभीर प्रयास प्रदेश में बदलाव ला सकता है। ऐसा नहीं है कि मध्यप्रदेश में 2008 या 2013 के विधान सभा चुनावों में सियासी बदलाव के मुद्दे नहीं थे, लेकिन कांग्रेस ने कभी भी मुद्दों को न तो सही तरीके से उठाया और न ही एकजुट हो कर भाजपा के खिलाफ चुनावी जंग छेड़ा। 2008 में जब भाजपा चुनावी मैदान में थी, तब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह डंपर मामले को लेकर निशाने पर थे। लेकिन तब तक उन्होंने जनता के बीच अपनी लोकप्रियता कायम कर ली थी। ऐसे में बिखरी-बिखरी सी कांग्रेस भाजपा के रणनीतिकारों और शिवराज की लोकप्रियता के आगे टिक नहीं पाई। फिर आया 2013 का चुनाव। तब एक बार फिर ऐसा लगा था कि जनता परिवर्तन चाहती है। लेकिन भाजपा की ग्रासरूट तक की सक्रियता और कार्यकर्ताओं के मनोबल के आगे फिर कांग्रेस बिखरी हुई नजर आई। तब भी भाजपा में एकछत्र रूप से शिवराज ही आगे रहे और उस दरम्यान प्रदेश व्यापी निकाली गई उनकी यात्रा ने नाराज कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर कर दिया था।

साल 2004 से 2013 तक केन्द्र में कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए की सरकार थी। ऐसे में प्रदेश के सभी दिग्गज कांग्रेसी केन्द्र में मंत्री पर संभाल रहे थे, तब उन्होंने प्रदेश पर कभी गंभीरता से ध्यान ही नहीं दिया। उनकी चुप्पी ने प्रदेश में गुटबाजी को तेज कर दिया। सारे नेताओं के अपने-अपने इलाके और अपने-अपने समर्थकों के गुट बन गए। अपने बीच सामंजस्य की बात तो दूर, एक-दूसरे के साथ मंच साझा करने से भी वे कतराने लगे। ऐसे में भाजपा के लिए अक्सर राह आसान रही। लेकिन अब मामला इसके उलट है। केन्द्र में कांग्रेस की सरकार नहीं है। देश भर में कांग्रेस सिमटती जा रही है। और अगले साल लोक सभा के चुनाव भी होने हैं। ऐसे में कांग्रेस के लिए मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मिजोरम के विधान सभा चुनाव बहुत मायने रखते हैं। प्रदेश कांग्रेस के साथ-साथ राष्ट्रीय नेतृत्व भी इन राज्यों के चुनाव को बहुत गंभीरता से ले रहा है। तभी तो राहुल गांधी को कहना पड़ता है कि कांग्रेस एक होकर लड़ेगी और बीजेपी को हराकर रहेगी। लेकिन तमाम प्रयासों के बाद भी कांग्रेस से कहीं न कहीं चूक हो ही जाती है। राहुल गांधी के इस संकल्प यात्रा में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के कटआउट नहीं लगे थे, जबकि सारे वरिष्ठ नेताओं के कटआउट लगे हुए थे। इस पर दिग्विजय सिंह नाराज भी नजर आए। फिर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने इस मामले में दिग्विजय सिंह से माफी भी मांगी।

अपनी कमजोरियों के बीच भी कांग्रेस उत्साहित है। क्योंकि प्रदेश में भाजपा के खिलाफ असंतोष दिखाई दे रहा है। प्रदेश के किसान नाराज हैं। संविदा कर्मी भी सरकार से नाराज है। मुख्यमंत्री की जन आशीर्वाद यात्रा को पिछली बार की तरह रिस्पाॅन्स नहीं मिल रहा है। बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी ने जनता को केन्द्र से नाराज कर दिया है। ऐसे में भाजपा पिछले चुनावों की तरह कांग्रेस को हल्के में नहीं ले रही है। खासतौर से तब, जब हाल के कई उप चुनावों में कांग्रेस ने जीत हासिल की है। (संवाद)