केन्द्र में वर्तमान में भाजपा शासित सरकार है , जो फिर से आगामी आम चुनाव 2019 में सत्ता में वापसी की उम्मीद लगायें बैठी है। इस तरह की उम्मीद के संदर्भ में विशेष रूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश , छत्तीसगढ़ तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव काफी महत्वपुर्ण है ,जहां से भाजपा की वापसी जरूरी है। पर इन तीनों राज्यों में जनादेश वर्तमान सरकार के खिलाफ नजर आ रहा है। विशेष रूप से राजस्थान में अभी हाल ही में राजस्थान राज्य परिवहन निगम के कर्मचारियों के साथ राज्य कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर सरकार के खिलाफ आंदोलनरत रहे जिसका चुनाव घोषणा के पूर्व तक कोई समाधान नहीं निकल पाया, अब तो आचार संहिता भी लागू हो चुकी है।

इस तरह के जनाक्रोश का चुनाव पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। दूसरी ओर अभी हाल ही में राजस्थान राज्य में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष चुनाव को लेकर पार्टी में मची आंतरिक हलचल से उभरी जातीय समीकरण भी भापजा को प्रदेश में नुकसान पहुंचा सकेेंगे। भाजपा के ही वरिष्ठ चर्चित राजनेता घनश्याम तिवारी के पूरे कार्यकाल तक रहे विरोधी तेवर से भी चुनाव में भाजपा को नुकसान पहुंच सकता है।

मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ राज्यों में लगातर भाजपा के सरकार में बने रहने के कारण उपजे असंतोष परिवर्तन के कारण हो सकते है। मिजोरम एवं तेलांगना में भाजपा की सरकार गठित हो सके, इसकी दूर - दूर तक संभावना नहीं। इस तरह के हालात का आभास भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को पूर्व में ही हो गया था, जिसे ढ़ंकने के लिये चुनाव में कम खर्च किये जाने के आड़ में राज्यों के विधानसभा का चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ कराने के लिये विधि आयोग के पास भरपूर कोशिश की पर मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा इस तरह की कार्यवाही को वर्तमान परिवेश में नहीं हो पाने के निर्णय के साथ प्रयास को धक्का लगा ।

इस प्रयास के विफल होने के बाद भी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने प्रयास नहीं छोड़ा और भाजपा शासित तीन राज्यों के सरकारों को विधानसभा चुनाव में बहुमत लाने की दिशा में आमजन का विश्वास जितने के लिये अपने कार्यकाल में किये गये विकास कार्यो को जन - जन तक पंहुचाये जाने की प्रकिया लागू किये जाने दिशा निर्देश दिया । इन तीनों राज्यों की भाजपा सरकार चुनाव में आमजन का विश्वास पाने के लिये अनेक लाभदायी घोषणाओं का पिटारा भी खोल दी है पर चुनाव में उसे इसका लाभ कितना मिल पायेगा, चुनाव उपरान्त ही पता चल पायेगा। फिलहाल इन राज्यों में जनादेश भाजपा के खिलाफ ही नजर आ रहा है, जहां पूर्व की तरह मोदी लहर के भी आसार नहीं। अपने काम के बल पर नहीं मोदी के नाम पर आज भी भाजपा सŸाा में अपनी वापसी की उम्मीद कर रही है, पर ऐसा कहीे दूर - दूर तक नजर नहीं आ रहा है।

इन पांच राज्यों में से विशेष रूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश , छत्तीसगढ़, मिजोरम में कांग्रेस की सरकार बनती तो दिखाई दे रही है पर कांग्रेस के लिये भी इन राज्यों में सत्ता में आना इतना आसान नहीं है । जहां के चुनाव में गठबंधन वाले राजनीतिक दलों के आपसी तालमेल नहीं मिल पाने के कारण विरोधी तेवर बने हुए है। जिसका प्रतिकूल प्रभाव कांग्रेस पर पड़ सकता है। वैसे राजस्थान , मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में मुख्य मुकाबला कांग्रेस एवं भाजपा के बीच ही है। जहां राजस्थान में सरकार बदलती रही है वहीं मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार लगातार तीन वर्षो से बनी हुई है।

इन राज्यों में कांग्रेस के साथ खड़े होने वाले प्रमुख दो राजनीतिक दल बसपा एवं सपा का कोई खास प्रभाव नहीं है। ये दोनों दल ऊ.प्र. के चुनाव के लिये महत्वपूर्ण भूमिका निभा तो सकते पर अन्य राज्यों के लिये उतने प्रभावी नहीं बन सकते । यहीं कारण है कि राजस्थान , मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के साथ इनका तालमेल नहीं बैठ पा रहा है। इस तरह के हालात में इनके विरोधी तेवर कांग्रेस को नुकसान तो पहुंचा सकते है पर ज्यादा नहीं ।

मघ्यप्रदेश में बसपा का कांग्रेस कार्यकाल में मुख्यमंत्री रह चुके अजीत जेागी के साथ हुये तालमेल से कांग्रेस को नुकसान पहुंच सकता है। मिजोरम में कांग्रेस को वहां के क्षेत्रीय दल मिजोरम फ्रांट से खतरा हो सकता है। तेलंगाना में क्षेत्रीय दल टी आर एस का प्रभाव बना रह सकता है। फिर भी इस राज्य में टी डी पी से खतरा बना हुआ है। इस तरह के हालात के बीच पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने जा रहे है, जहां सभी राजनीतिक दल अपने - अपने तरीके से सŸाा तक पहुंचने की भरपूर कोशिश में लगे हुये है।

इन पांच राज्यों की राजनीतिक सरगर्मिया तेज हो चली है जहां रूठे को मनाने के साथ - साथ घोषणा पत्रों के माध्यम से आमजन को लुभाने का क्रम जारी है। इस बार चुनाव में भी दागी जनप्रतिनिधि आमने -सामने होंगे। टिकट बटवारे को लेकर राजनीतिक दलों के प्रत्याशी भी आमने - सामने होंगे। इस तरह के ध्रुवीकरण के बीच पंाच राज्यों चुनाव काफी रोचक हो सकते है जहां किसी भी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत आने की स्थिति उभरती दिखाई नहीं दे रही है। इस तरह के उभरते हालात में किस राज्य में किसकी सरकार बन जाय अभी से कह पाना मुश्किल है। (संवाद)